चीन ने युरिया उत्पादन में आत्मनिर्भरता कायम रखी, इरान युद्ध का प्रभाव नहीं पड़ा

चीन ने अपने विशाल कोयला भंडार का उपयोग करते हुए विश्वव्यापी युरिया उत्पादन में ७८ प्रतिशत हिस्सा कोयला आधारित कर लिया है। सन् २०२६ की शुरुआत में पश्चिम एशिया में हुए युद्ध ने होर्मुज स्ट्रेट के व्यापारिक मार्ग को अवरुद्ध कर दिया, जिसके कारण युरिया की कीमत में ७० प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। चीन ने अपनी ५० से ८० प्रतिशत तक की मल निर्यात पर प्रतिबंध लगा कर आंतरिक खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता दी है, जिससे विश्व बाजार में मल की कमी और बढ़ गई है।
दुनियाभर युरिया उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस को प्रमुख स्रोत माना जाता है, जबकि चीन ने अपने विशाल कोयला संसाधनों का सदुपयोग कर इस क्षेत्र में अभूतपूर्व आत्मनिर्भरता प्राप्त की है। चीन के कुल युरिया उत्पादन का लगभग ७८ प्रतिशत कोयले से होता है। इसने कतार, रूस और सऊदी अरब जैसे प्राकृतिक गैस पर निर्भर देशों की तुलना में चीन के उत्पादन मॉडल को भिन्न और काफी सुरक्षित बना दिया है।
सन् २०२६ की शुरुआत में पश्चिम एशिया में शुरू हुए युद्ध ने होर्मुज स्ट्रेट को, जो विश्व के उर्वरक व्यापार का ३० प्रतिशत हिस्सा संभालता है, बंद कर दिया। इसके परिणामस्वरूप युरिया की कीमतों में ७० प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई। लेकिन चीन की कोयला आधारित उत्पादन प्रणाली और आंतरिक ऊर्जा स्रोतों के कारण वह बाजार में पर्याप्त सुरक्षित भंडारण बनाए रखने में सफल रहा। रॉयटर्स के अनुसार, चीन में युरिया की कीमतें इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में लगभग एक तिहाई हैं।
चीन ने पिछले वर्ष १३ अरब डॉलर से अधिक मूल्य का उर्वरक निर्यात किया था, जिसका अधिकांश हिस्सा मलेशिया, वियतनाम, इंडोनेशिया और न्यूजीलैंड जाता था। मलेशिया अपने कुल उर्वरक आयात का ६७ प्रतिशत और इंडोनेशिया ४४ प्रतिशत हिस्सा चीन से प्राप्त करता था। लेकिन युद्ध के कारण उत्पन्न कमी और आंतरिक खाद्य सुरक्षा की प्राथमिकता की वजह से चीन ने अपनी ५० से ८० प्रतिशत तक की मल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसने विश्व बाजार में मल की कमी को और बढ़ा दिया है।




