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किसानों के लिए पेंशन और भूमि प्रबंधन बैंक की मांग

खाद्य सुरक्षा के लिए कृषि अभियान ने जैविक कृषि की ओर संक्रमणकालीन कार्ययोजना बनाकर रासायनिक खेती से परिवर्तित करने हेतु सरकार को सुझाव दिया है। अभियान ने किसानों को पेंशन, किसान क्रेडिट कार्ड, कृषि बीमा और सुलभ ऋण व्यवस्था प्रदान कर सामाजिक सुरक्षा देने की मांग की है। संविधान द्वारा सुनिश्चित खाद्य संप्रभुता के कार्यान्वयन के लिए तत्काल राष्ट्रीय सहमति कर संघीय कृषि अधिनियम बनाने का भी आग्रह किया गया है। ९ वैशाख, काठमाडौं। हाल ही में सरकार द्वारा जारी ‘राष्ट्रीय प्रतिबद्धतापत्र’ में कृषि के समग्र विकास की सीमाओं को दर्शाते हुए ‘खाद्य के लिए कृषि अभियान’ ने नीतिगत एवं संरचनात्मक सुधारों का विस्तृत खाका प्रस्तुत किया है। वर्तमान में रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों पर आधारित कृषि प्रणाली से मिट्टी की उर्वरता और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है, जिसे देखते हुए अभियान ने तत्काल ‘जैविक अर्थात पर्यावरणीय कृषि’ की ओर रूपांतरण की मांग की है। अभियान के संयोजक उद्धव अधिकारी ने अपने सुझाव पत्र में कोविड-१९ जैसी महामारियों और वैश्विक भू-राजनीतिक संघर्षों से मिली सीख के आधार पर कृषि में आत्मनिर्भरता पर बल दिया है। इसके लिए आयात प्रतिस्थापन के उद्देश्य से स्थानीय उत्पादन, रैथाने फसलों, वस्तु-मूल्य निर्धारण तथा चक्रीय आपूर्ति प्रणाली को मजबूत करने की आवश्यकता जताई गई है। रासायनिक खेती से संक्रमणकालीन रूपांतरण और जैविक उर्वरकों के प्रवर्धन हेतु सरकार को स्पष्ट संक्रमणकालीन योजना बनाकर क्रमशः जैविक कृषि की दिशा में जाने का प्रस्ताव दिया गया है। कृत्रिम उर्वरकों के विकल्प के रूप में देश में ही जैविक उर्वरक, कम्पोस्ट एवं हरित उर्वरक के स्थानीय उद्योग स्थापित कर उनके उपयोग हेतु किसानों को अनुदान देने का आग्रह किया गया है। साथ ही, कृषि उद्यम एवं उद्योगों को दिए जाने वाले कर छूट और आयात शुल्क में सहूलियत को पर्यावरण-सम्मत उत्पादन की दिशा में केन्द्रित करने की भी आवश्यकता बताई गई है। ‘भूमि प्रबंधन बैंक’ और जमीन के खंडीकरण पर रोक के संदर्भ में तेजी से घटती कृषि योग्य जमीन को देखते हुए अभियान ने कठोर भू-उपयोग नीति की मांग की है। कृषि योग्य भूमि के संरक्षण और बांझी भूमि का सदुपयोग सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय सरकारों के समन्वय में ‘भूमि प्रबंधन बैंक’ के माध्यम से काम करने की सलाह दी गई है। जमीन के खंडीकरण को रोकते हुए चक्लाबंदी और एकीकरण को प्राथमिकता देते हुए किसी भी हालत में कृषि योग्य भूमि को गैर-कृषि उपयोग से रोकने की भी आवश्यकता जताई गई है। भूमि की उत्पादनशीलता के अनुसार आवश्यक खेती योग्य जमीन का आकार निर्धारित कर उससे कम जमीन पर खेती करने वाले किसानों को स्वैच्छिक कृषक मान्यता व सहूलियत प्राथमिकता न देने की भी सिफारिश की गई है। किसानों के लिए पेंशन योजनाओं से लेकर युवाओं को कृषि से जोड़ने वाले कार्यक्रम तैयार कर कृषि को केवल आजीविका न मानते हुए ‘सम्मानित सामाजिक उद्यम’ के रूप में विकसित करने पर जोर दिया गया है। इसके लिए वास्तविक किसान पहचान और वर्गीकरण कर ‘किसान पेंशन’, ‘किसान क्रेडिट कार्ड’, कृषि बीमा और सुलभ ऋण व्यवस्था की मांग की गई है। सरकार द्वारा प्रदत्त अनुदान और बाजार पहुंच में छोटे, भूमिहीन, सीमांत एवं महिला किसानों को विशेष प्राथमिकता देनी चाहिए, यह भी अभियान ने कहा है। जैविक नक्शांकन और बीज संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिए देश के पूरे क्षेत्र में कृषि जैविक विविधता, रैथाने बीज-फसलों और मिट्टी की स्थिति की जानकारी हेतु जीआईएस और अन्य डिजिटल तकनीकों का उपयोग कर वैज्ञानिक ‘जैविक नक्शांकन’ करने का सुझाव दिया गया है। इसी डेटा के आधार पर कृषि क्षेत्र की प्राथमिकताओं और अनुदानों का लक्ष्य निर्धारण किया जाना चाहिए। प्रत्येक स्थानीय तह में ‘सामुदायिक बीज बैंक’ स्थापित कर किसानों के बीज संबंधी अधिकारों की रक्षा करना, रैथाने बीज का संरक्षण एवं प्रजनन विस्तार की भी मांग की गई है। कृषि शिक्षा में प्रारंभिक कक्षाओं से लेकर विद्यालय स्तर तक खाद्य उत्पादन और कृषि को अनिवार्य विषय बनाकर विद्यार्थियों को मिट्टी और श्रम से जोड़ने का प्रस्ताव है। उच्च शिक्षा भी जैविक एवं रैथाने कृषि अनुसंधान केंद्रित होनी चाहिए, यह भी अभियान ने कहा है। प्रभावहीन पुरानी कृषि संरचनाओं को समाप्त या संशोधित कर प्रभावशाली संस्थान बनाने, और अप्रयुक्त मानव संसाधन को पुनः प्रशिक्षण देकर स्थानीय स्तर पर तैनात करने की भी जरूरत बताई गई है। कृषि विकास के सरकारी, गैर सरकारी और दातृ संस्थानों के कार्यक्रमों में दोहराव व असंगति को दूर करने के लिए ‘एक-द्वार प्रणाली’ अपनाने पर जोर दिया गया है। संघीय कृषि अधिनियम की मांग के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के जोखिम कम करने के लिए छोटे सिंचाई, वर्षा जल संचयन और बहुवर्षीय फसलों को प्राथमिकता देने का सुझाव भी दिया गया है। भौगोलिक और जैविक क्षेत्रीय उत्पादन सूचक विकसित कर कृषि उपज के मूल्य श्रृंखला का निर्माण किया जाए, यह भी मांग में शामिल है। १५ वर्षों से स्थायी कृषि और खाद्य प्रणाली को बढ़ावा देते आ रहे इस अभियान ने अल्पकाल में उत्पादन वृद्धि, मध्यकाल में स्थायी पूर्वाधार विकास और दीर्घकाल में चक्रीय उद्योगों के संवर्द्धन हेतु चरणबद्ध योजना प्रस्तुत की है। संविधान द्वारा सुनिश्चित खाद्य संप्रभुता के कार्यान्वयन के लिए तत्काल राष्ट्रीय सहमति बनाकर ‘संघीय कृषि अधिनियम’ के निर्माण हेतु सरकार और सम्बंधित पक्षों का गंभीर ध्यानाकर्षण करवाया गया है।