Skip to main content

अमेरिका में नेपाली मम मास्टर के रूप में पहचान बनाने वाले खोटाङ के रमेश दाहाल

खोटाङ के रमेश दाहाल ने अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना राज्य के चापलहिल में ममज मास्टर नामक नेपाली रेस्तरां स्थापित कर मम मास्टर के रूप में अपनी पहचान बनाई है। नेपाल के मम को अमेरिका के शहर में प्रसिद्ध बनाने वाले खोटाङ के रमेश दाहाल ने अमेरिका में मम मास्टर की छवि स्थापित की है। अमेरिकी दक्षिणपूर्वी राज्य नॉर्थ कैरोलिना की राजधानी रले नज़दीक चापलहिल में 34 हजार छात्रों वाला यूएनसी चापलहिल (यूनिवर्सिटी ऑफ चापलहिल) है। 1789 में स्थापित यह अमेरिका का सबसे पुराना सार्वजनिक विश्वविद्यालय है। इसी विश्वविद्यालय के पास एक प्रसिद्ध नेपाली रेस्तरां है – ममज मास्टर। कम नेपाली संख्या होने के बावजूद चापलहिल में ममज मास्टर में अच्छी खासी भीड़ लगती है। ‘कभी-कभी लाइन में लगकर भी खाना पड़ता है,’ यूएनसी चापलहिल में कार्यरत डा. मुकेश अधिकारी कहते हैं, ‘अमेरिकन लोगों के बीच बैठकर मम खाने का अनुभव वास्तव में गर्व का विषय है।’

अमेरिका में अधिकांश नेपाली लोग अपने रेस्तरां पर इंडियन नाम लगाकर भारतीय भोजन बेचते हैं, क्योंकि भारतीय भोजन यहाँ बहुत लोकप्रिय है और इंडियन नाम से ग्राहक आसानी से आकर्षित होते हैं। बहुत से लोग नेपाली भोजन को पहचान भी नहीं पाते। लेकिन खोटाङ माकपा के रमेश दाहाल ने पाँच साल पहले अमेरिका में नेपाली मम के नाम से रेस्तरां खोलने का साहस दिखाया। ‘नेपाली भोजन को यहाँ पहचान दिलाने के लिए मैं नेपाली रेस्तरां चला रहा हूँ,’ रमेश बताते हैं, ‘शुरुआती दिन संघर्षपूर्ण थे, लेकिन अब यही रेस्तरां मुझे अलग पहचान देता है।’ उनका ममज मास्टर हिमालयन बिस्टरो के रूप में नेपाली स्वाद का प्रतिनिधि स्थल बन चुका है और स्थानीय समुदाय के लिए प्रमुख आकर्षण केंद्र भी बन गया है। इसलिए कई लोग उन्हें ममता मम मास्टर के नाम से प्यार से संबोधित करते हैं।

चापलहिल के नेपाली, बर्गर, टैको, पिज्जा, हॉट डॉग जैसे व्यंजनों में माहिर अमेरिकन लोग मम के स्वाद का आनंद लेते हैं। रमेश कहते हैं, ‘पैसा जरूर महत्वपूर्ण है, लेकिन सबसे बड़ी उपलब्धि अमेरिकन लोगों को नेपाली स्वाद से परिचित कराना है।’ चापलहिल शहर के लोकप्रिय रेस्तरां में ममज मास्टर की भी गिनती होती है। पिछले कुछ वर्षों में यह नेपाली मम को पहचान दिलाने का प्रमुख केंद्र बन गया है। ‘इस शहर में मम परिकार का चलन होना हम नेपाली के लिए गर्व की बात है,’ ड्यूक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एवं पर्यावरणविद् डा. चन्द्र गिरि कहते हैं, ‘यहाँ की भीड़ देख कर गर्व महसूस होता है और इसका श्रेय रमेश दाहाल को जाता है।’