
‘इथा’ उपन्यास इतिहास और कथा को अनुपम संयोजन प्रस्तुत करते हुए २४०० साल पहले के सामाजिक, राजनीतिक और लैंगिक मुद्दों को उजागर करता है। इस उपन्यास की तीन महिला पात्र नयनतारा, सैरन्द्री और वसुधा स्त्री अस्तित्व, शक्ति और विद्रोह के प्रतीक के रूप में अपनी भूमिका निभाती हैं। ‘इथा’ धार्मिक अंधविश्वास, पितृसत्तात्मक संरचना और सत्ता-धर्म संबंधों पर तीव्र आलोचना करते हुए वर्तमान सामाजिक प्रश्नों को भी सामने लाता है।
यदि आपको केवल कथा में रुचि है तो केशव दाहाल की नई पुस्तक ‘इथा’ आपकी पसंद हो सकती है; और यदि आप केवल इतिहास में रुचि रखते हैं तो भी यह उपन्यास आपको आकर्षित करेगा। दोनों रुचियां हो तो यह और भी आनंददायक होगा। क्योंकि ‘इथा’ में आपको इतिहास और कथा का अनोखा मिश्रण मिलेगा। जब मैंने ‘इथा’ पढ़ी तो मुझे यही अनुभव हुआ कि इतिहास जैसा कथा और कथा जैसा इतिहास है।
उपन्यास की शुरुआत वसुधा के विद्रोह से होती है। शरीर पर लगे दाग के कारण विवाह से अस्वीकृत वसुधा का आत्मदाह केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं है, बल्कि यह पितृसत्तात्मक मूल्यों और सामाजिक संरचना के खिलाफ एक मौन लेकिन तीव्र विरोध है। यहीं से उपन्यास का केंद्रीय स्वर निर्धारित होता है – पुरुषप्रधान अहंकार और स्त्री विरोधी अन्याय का पर्दाफाश।
नयनतारा इस उपन्यास की मुख्य पात्र हैं और उनका विद्रोह उपन्यास की रीढ़ है। राजा प्रमाति के अहंकार और नयनतारा के प्रतिरोध से यह दिखता है कि स्त्री केवल पीड़ित नहीं बल्कि संघर्ष करने वाली शक्तिशाली पात्र भी है। उपन्यास धार्मिक अंधविश्वास का कठोर आलोचना करता है और यहां धर्म सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि सत्ता और शक्ति प्राप्ति का माध्यम भी है।
‘इथा’ पढ़ना केवल कथा पढ़ना नहीं, बल्कि एक युग, चेतना और विद्रोह को महसूस करना है। यह मनोरंजन के साथ-साथ सवाल उठाने और वर्तमान मान्यताओं के पुनर्विचार के लिए प्रेरित करता है।





