
पंडित दीनबन्धु पोखरेलले १२ भन्दा बढी यूरोपीय देशों में ३४ दिन की आध्यात्मिक यात्रा कर प्रवासी नेपाली समुदाय से संवाद स्थापित किया है। पोखरेल ने प्रवास में रहने वाले नेपाली लोगों की जीवनशैली, भावनात्मक स्थिति और नई पीढ़ी में नेपाली पहचान बनाए रखने की चुनौतियों का गहराई से विश्लेषण किया है। वे काठमांडू के नागार्जुन नगरपालिका–७ रामकोट में आध्यात्मिक केंद्र का निर्माण कर नेपाल को विश्व के आध्यात्मिक गुरुराष्ट्र के रूप में स्थापित करने की योजना भी आगे बढ़ा रहे हैं।
एक महीने लंबी यूरोप यात्रा पूरी करके पंडित दीनबन्धु पोखरेल हाल ही में नेपाल लौटे हैं। बेल्जियम से स्पेन, नॉर्वे, पुर्तगाल, फ्रांस, डेनमार्क, फिनलैंड सहित १२ से अधिक देशों में आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित करते हुए उन्होंने प्रवासी नेपाली समुदाय से सीधा संवाद किया। तीन बार यूरोप यात्रा कर चुके पोखरेल के अनुसार अब तक उन्होंने ४४ देशों का भ्रमण किया है और लगभग ३३ देशों में आध्यात्मिक कार्यक्रम सम्पन्न कर चुके हैं। इस बार की यात्रा में उन्होंने प्रवासी नेपाली की जीवनशैली, भावनात्मक स्थिति, पीढ़ी परिवर्तन की चुनौती और आध्यात्मिक आवश्यकताओं को करीब से देखा है।
‘काम और दाम’ की खोज में विदेश गए नेपाली के भीतर छिपी शांति और आत्मसंतोष के अभाव से लेकर नई पीढ़ी में नेपाली पहचान को बनाए रखने की चुनौती तक विभिन्न पहलुओं पर पोखरेल ने गहरा विश्लेषण किया है। प्रवास में नेपाली एकता, संस्कार के प्रति प्रेम और आध्यात्मिक चेतना की आवश्यकता जैसे विषयों पर आधारित ऑनलाइन संवाददाता वसन्त रानाभाट के साथ उनके वार्तालाप का संपादित अंश प्रस्तुत है।
यूरोप की इस आध्यात्मिक यात्रा को आप कैसे आंकते हैं? यह मेरी तीसरी यूरोप यात्रा है—सन् २०११, २०२२ और अब २०२६। इस बार ३४ दिनों की यात्रा रही, जो मेरे लिए ऐतिहासिक रही। जहां भी गया, भक्तों की उत्साहजनक उपस्थिति देखी। इस यात्रा के मुख्य उद्देश्य तीन थे—पहला, प्रवास में रहने वाले नेपाली मन को जोड़ना। दूसरा, आध्यात्मिक चेतना को जागृत करना। तीसरा, नेपाली सांस्कृतिक केंद्र निर्माण की नींव रखना। कुल मिलाकर यह यात्रा अनुकरणीय, अभूतपूर्व और अत्यंत सफल रही, यह मेरा अनुभव है।
आपके अनुभव में विदेश में रहने वाले नेपाली लोगों का वास्तविक जीवन कैसा है? बाहर दिखने और अंदर की हकीकत में कितना अंतर मिला? मैंने प्रवचन के दौरान भी कहा है—बाहर से देखने पर काम और दाम दोनों अच्छे लगते हैं। लेकिन ‘आराम, नाम और राम’ अपेक्षित कम दिखाई देता है। भौतिक रूप से कई नेपाली सशक्त और स्थापित हैं, लेकिन अंदर कहीं न कहीं खालीपन, थकान या पीड़ा का एहसास होता है। इसलिए मेरी यह आध्यात्मिक यात्रा केवल ‘काम और दाम’ तक सीमित नहीं थी, बल्कि लोगों को ‘आराम, नाम और राम’ के महत्व को समझाना भी था।
आध्यात्मिक कार्यक्रम केवल तात्कालिक उत्साह में सीमित नहीं रहते; ये दीर्घकालिक रूप से व्यक्ति की चेतना और सोच पर असर डालते हैं। हमें लगता है कि हम कुछ हद तक वह संदेश पहुंचाने में सफल रहे हैं। आध्यात्मिक कार्यक्रमों में भाग लेते वक्त लोगों में उत्साह, ऊर्जा और मानसिक शांति देखी जाती थी। इससे स्पष्ट होता है कि भले ही वे बाहर से सफल दिखते हैं, लेकिन कई के जीवन में ‘राम और आराम’ यानी शांति और आनंद की कमी है। इसी कमी को कुछ हद तक पूरा करने का काम इस आध्यात्मिक यात्रा ने किया है, ऐसा मैंने महसूस किया है।





