
२१ वैशाख, काठमाडौं । पश्चिम बंगाल में सम्पन्न विधानसभा चुनाव की मतगणना जारी है। अब तक के रुझान से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जीत के क़रीब दिख रही है। भाजपा ने जीत का जश्न मनाने की तैयारी भी शुरू कर दी है। २०११ से लगातार सत्ता में बनी ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को पीछे छोड़ते हुए भाजपा पहली बार पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने की स्थिति में पहुंची है। २९४ सदस्यीय विधानसभा में भाजपा स्पष्ट बहुमत से आगे चल रही है जबकि टीएमसी सौ सीटों से भी कम पर सीमित दिख रही है। नवीनतम रुझान के अनुसार भाजपा २०५ सीटों पर आगे है, वहीं टीएमसी ८२ सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। अन्य दलों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस आई), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और अखिल भारतीय धर्मनिरपेक्ष मोर्चा दो-दो सीटों पर अग्रसर हैं। इसके अलावा दो सीटों पर आम जनता उन्नयन पार्टी बढ़त में है।
मतदान के बाद हुए एक्जिट पोल ने भी भाजपा की जीत की भविष्यवाणी की थी। कुछ सवाल उठे थे, ‘बंगाल में भाजपा जीत पाएगी?’ लेकिन परिणाम ने इन एक्जिट पोलों को सही साबित किया है। इसके पहले २०२१ के विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने २१३ सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया था। भाजपा ७७ सीटों पर सीमित रही और दूसरे स्थान पर रही। उस समय टीएमसी का मत प्रतिशत ४८.०२ था जबकि भाजपा का ३८.१५ प्रतिशत था। कांग्रेस आई और वाम मोर्चा को केवल एक-एक सीट मिली थी। अब के परिणाम ने न केवल समग्र समीकरण बल्कि चुनावी तस्वीर पूरी तरह से पलट दी है। पिछली बार दो-तिहाई बहुमत पाने वाली टीएमसी करीब १३१ सीटें खोने के कगार पर दिख रही है।
मत प्रतिशत के हिसाब से यह बदलाव ऐतिहासिक है। भाजपा का मत प्रतिशत बढ़कर ४५.५६ प्रतिशत हो गया है, जो २०२१ की तुलना में ७.४१ प्रतिशत अधिक है। टीएमसी का मत प्रतिशत ४८.०२ से गिरकर ४०.८१ प्रतिशत पर आ गया है। इस मत परिवर्तन से पश्चिम बंगाल की राजनीति में संरचनात्मक बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। मतदान प्रतिशत भी रिकॉर्ड स्तर पर है। २०२१ में ८१.८ प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि इस बार यह बढ़कर ९२.४७ प्रतिशत हो गया है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इसे स्वतंत्रता के बाद से सबसे उच्च मतदान बताया है।
प्रेसिडेंसी क्षेत्र में भाजपा का प्रभाव महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पश्चिम बंगाल के राजनीतिक दृष्टिकोण से १११ सीटों वाले प्रेसिडेंसी क्षेत्र में इस बार भाजपा को भव्य सफलता मिली है। २०२१ में इस क्षेत्र की ९६ सीटें जीतने वाली टीएमसी अब मात्र ५१ सीटों पर सीमित हो गई है, जबकि भाजपा ५५ सीटों पर बढ़त बना रही है। विशेष रूप से कोलकाता के श्यामपुकुर, एन्टाली और माणिकतला जैसे टीएमसी के पुराने गढ़ों में भाजपा आगे है। सबसे बड़ा उलटफेर अभिषेक बनर्जी के प्रभाव क्षेत्र डायमंड हार्बर में हुआ है, जहां भाजपा प्रत्याशी दीपककुमार हल्दार बढ़त में हैं। ग्रामीण और आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में व्यापक जनसमर्थन से भाजपा का बहुमत सुनिश्चित होता दिख रहा है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भबानीपुर निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रही हैं। वह भाजपा के सुभेंदु अधिकारी से कुछ मतों की बढ़त के साथ आगे दिख रही हैं। शुरुआती रुझान में अधिकारी ही आगे थे। सुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम में अपनी बढ़त बनाए रखने का दावा करते हुए भाजपा की जीत सुनिश्चित की है। परिणाम ने टीएमसी की मंत्रिमंडल प्रणाली पर भी बड़ा असर डाला है। २० से अधिक मंत्री चुनाव में पराजित हो रहे हैं। दिनहटा से उदयन गुहा, नवदा से साहिना मोमताज खान और श्यामपुकुर से शशी पांजा अपने प्रतिस्पर्धियों से पिछड़ गए हैं, जो टीएमसी में नेतृत्व और संगठन की कमजोरियों को उजागर करता है।
निर्वाचन आयोग पर गंभीर आरोप भी लगे हैं। प्रारंभिक रुझान में भाजपा की बढ़त देखने के बाद मुख्यमंत्री बनर्जी ने चुनाव आयोग की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा, “प्रारंभिक नतीजे अपनी तरफ दिखाना उनकी रणनीति है।” मतगणना प्रक्रिया में अनियमितताओं, कुछ स्थानों पर जानबूझकर देरी या रोक लगाने का आरोप भी उन्होंने लगाया है। बनर्जी ने टीएमसी कार्यकर्ताओं को मतगणना केंद्र नहीं छोड़ने और धैर्य रखने का निर्देश दिया है।
वाम मोर्चा और कांग्रेस की स्थिति कमजोर है। ३४ साल से बंगाल पर शासन करने वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) इस चुनाव में भी कमजोर नजर आ रही है। वह केवल दो सीटों पर आगे है। वाम मोर्चा का पतन लगातार जारी है। वहीं, अखिल भारतीय धर्मनिरपेक्ष मोर्चा (आईएसएफ) ने २९ क्षेत्रों में उम्मीदवार दिए, लेकिन केवल एक सीट पर ही बढ़त हासिल की है। कांग्रेस आई की भी स्थिति ऐसी ही है, पार्टी केवल दो सीटों पर बढ़त बनाकर सीमित है।
ये परिणाम पश्चिम बंगाल की राजनीति में गहरा संरचनात्मक बदलाव साबित करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भाजपा की यह जीत केवल चुनावी सफलता नहीं बल्कि वैचारिक बड़ी छलांग है। यह नतीजा २०२९ के लोकसभा चुनावों के लिए भी भाजपा को मजबूती प्रदान करता है। १५ साल बाद, ममता बनर्जी जो २०११ में ३४ साल के वाम राज को समाप्त कर सत्ता में आई थीं, सत्ता से बाहर होने की कगार पर हैं। असम के बाद यह सफलता भाजपा की पूर्वी भारत विस्तार रणनीति को निर्णायक ऊंचाई पर पहुंचाती है। लेकिन मुख्यमंत्री बनर्जी द्वारा चुनाव आयोग पर उठाए गए गंभीर सवाल भविष्य में राजनीतिक तनाव बढ़ा सकते हैं। विपक्षी दल लंबे समय से चुनाव आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। बनर्जी के आरोप इससे राजनीतिक तनाव और तीव्र कर सकते हैं।





