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भारत विपक्षहीन होता जा रहा है

समाचार सारांश

संपादकीय समीक्षा पूर्ण।

  • पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई और भाजपा ने बहुमत हासिल किया।
  • ममता बनर्जी की हार से भारत के विपक्षी दल दुर्बल हुए हैं और भाजपा का मनोबल बढ़ा है।
  • विपक्षी दलों में एकता की कमी और कमजोर रणनीति के कारण भाजपा ने कई राज्यों में सरकार बनाई है।

22 वैशाख, काठमांडू। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के नतीजे ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए बड़ा झटका हैं। पूर्व में 215 सीटें जीतने वाली पार्टी इस बार सौ सीट भी नहीं जीत सकी।

इससे भी बड़ी बात यह है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के कड़े विरोधी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने चुनाव जीत लिया।

ममता बनर्जी केंद्रीय सरकार में सत्तारूढ़ भाजपा के विरोधी दलों के बीच इतनी बड़ी प्रतिष्ठा रखती थीं कि उनसे समर्थन में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव तथा बिहार में आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव भी खड़े थे।

फिर भी, इतने विपक्षी नेताओं के समर्थन के बावजूद ममता बनर्जी अपनी सत्ता बचाने में असफल रहीं। यह न केवल विपक्षी दलों के लिए बड़ा झटका है बल्कि भारतीय राष्ट्रीय राजनीति में विपक्षी दलों की स्थिति और कमजोर होने का संकेत भी है।

2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार और भाजपा के खिलाफ बने इंडिया ब्लॉक के मुखिया के रूप में भी ममता बनर्जी की उम्मीद की जाती थी। उन्होंने लालू प्रसाद यादव और विपक्षी गुट के नीतिश कुमार को विपक्षी गठबंधन की पहली बैठक पटना में आयोजित करने का सुझाव दिया था।

यह सुझाव मानते हुए इंडिया ब्लॉक की पहली बैठक पटना में आयोजित भी हुई। इस रिपोर्ट में हम विधानसभा चुनाव में पराजय के कारण ममता बनर्जी की राजनीतिक स्थिति पर और राष्ट्रीय तथा विपक्षी दलों के भविष्य पर पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा करेंगे।

‘विपक्ष कमजोर हुआ है’

तृणमूल कांग्रेस केंद्र में तीसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। 2024 में विपक्षी दलों में केवल कांग्रेस (99 सीट) और समाजवादी पार्टी (37 सीट) ने ज्यादा सीटें जीती थीं।

टीएमसी ने पश्चिम बंगाल की 42 में से 29 सीटें जीती थीं। वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई का कहना है, ‘इस जीत के साथ भाजपा अब पश्चिम बंगाल के सभी 42 सीटों पर दबदबे की कोशिश करेगी। ममता बनर्जी बड़ी नेता हैं, लेकिन उनकी पार्टी की हार से विपक्ष कमजोर हुआ और भाजपा और मजबूत हुई।’

उन्होंने आगे कहा, ‘विपक्षी दलों में एकता की कमी स्पष्ट हुई। विपक्षी दल ममता बनर्जी को सिर्फ परेशानी के तौर पर देखते रहे। ये सभी दल वैचारिक रूप से अलग हैं, जबकि दक्षिणपंथी राजनीति करने वाली भाजपा के लिए कोई विकल्प नहीं बचा।’

विपक्षी दलों की स्थिति को देखें तो केरल में कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन UDF को पुनः सत्ता मिली लेकिन असम में हार का सामना करना पड़ा।

तमिलनाडु में भाजपा के विरोध में खड़े DMK नेता एम के स्टालिन की भी हार हुई है। वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘कुल मिलाकर विपक्ष कमजोर है। सभी बड़े विपक्षी नेता हार गए हैं। इसका असर ये हो सकता है कि जब विपक्ष के विरोध में विवाद उत्पन्न होंगे तो उनकी किरकिरी होगी। इसमें ममता बनर्जी और एम के स्टालिन दोनों शामिल होंगे।’

भाजपा नेताओं ने पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी और उनकी पार्टी पर बांग्लादेशी नागरिकों को शरण देने और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। तमिलनाडु में भी भाजपा और DMK के बीच हिंदी और सनातन धर्म के नाम पर विवाद चलता रहा है।

विपक्षहीन राजनीति

अमित शाह

पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों में सत्ता गंवाने के बाद विपक्षी दल राष्ट्रीय राजनीति में कमजोर हुए हैं। हाल के वर्षों में भाजपा लगभग तीन दशक बाद दिल्ली में फिर से सत्ता में आई है। कुछ दिन पहले ही बिहार में भाजपा ने पहली बार सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाया।

भाजपा के पास उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, असम जैसे कई राज्यों में सरकारें हैं। साथ ही कुछ राज्यों में उसकी गठबंधन सरकारें बहुमत में हैं।

पश्चिम बंगाल में मिली जीत ने भाजपा के लिए नए अवसर खोल दिए हैं। अब भाजपा कमजोर माने जाने वाले राज्यों में भी सरकार बनाने के लिए उच्च मनोबल के साथ आगे बढ़ सकती है।

एएन सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज (पटना) के पूर्व निदेशक और राजनीतिक विश्लेषक डीएम दिवाकर कहते हैं, ‘भाजपा विपक्षहीन राजनीति चाहती है। इस जीत से उन्हें मनोबल मिलेगा। विपक्ष को इस हार के बाद अपनी कमजोरियों पर पुनर्विचार करना होगा। संसदीय राजनीति अवसरवादी है, इसलिए सभी केवल अपने लाभ के लिए काम करते हैं।’

दिवाकर आगे कहते हैं, ‘विपक्ष या क्षेत्रीय दल टूटे-फूटे हैं। जैसे पश्चिम बंगाल में भाजपा ने विजय प्राप्त की, वैसे उत्तर प्रदेश में भी ऐसा हो सकता है। राजनीति में अब केवल छोटे दल भाजपा के खिलाफ बचे हैं, जो लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।’

रशीद किदवई कहते हैं, ‘पश्चिम बंगाल में वामपंथी दल, AIMIM, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस हैं जो धर्मनिरपेक्ष वोट साझा करते हैं, जबकि भाजपा बहुसंख्यक राजनीति करती है जिसके वोट बंटते नहीं।’

वे आगे कहते हैं, ‘विपक्ष की एक और समस्या ये है कि उनकी एकता और रणनीति अक्सर कागजों तक ही सीमित होती है। अगर कांग्रेस तमिलनाडु में विजय पार्टी के साथ समझौता करती तो बहुत फायदा होता, लेकिन पी चिदंबरम ने इनकार कर दिया और कांग्रेस अकेली रह गई।’

विपक्ष के सामने बची राह

विपक्षी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और तेजस्वी यादव (फाइल फोटो)

23 जून 2023 को पटना में 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का सामना करने के लिए विपक्षी दलों की बैठक हुई। इस बैठक में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतिश कुमार, आरजेडी के लालू प्रसाद यादव, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, शरद पवार, उद्धव ठाकरे, हेमंत सोरेन, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, फारुक अब्दुल्लाह और महबूबा मुफ्ती सहित कई नेता शामिल थे।

कुछ महीनों बाद नीतिश कुमार ने लोकसभा चुनाव से पहले ही विपक्षी गठबंधन छोड़कर भाजपा से हाथ मिला लिया, जो विपक्षी गठबंधन के लिए पहला बड़ा झटका था।

इसके बाद बाकी विपक्षी दलों में भी लोकसभा चुनाव में पूर्ण एकता नजर नहीं आई। दिल्ली से पंजाब, पश्चिम बंगाल से बिहार तक इस एकता में दरार आ गई।

दिवाकर कहते हैं, ‘पश्चिम बंगाल की हार विपक्ष के मनोबल को तोड़ देगी लेकिन अगर विपक्ष सक्रिय रहेगा और हार के बाद निष्क्रिय नहीं होगा तो यह अच्छा होगा।’

वे आगे कहते हैं, ‘ममता बनर्जी के मामले में एन्टी-इन्कम्बेन्सी (सत्ताविरोधी लहर) थी, जनभावना थी, भाजपा आक्रामक थी जिसने उन्हें हराया। चुनाव आयोग का काम चुनाव में जनभागीदारी बढ़ाना है, लेकिन यह घट रही है, जो लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।’

विपक्ष के सामने बड़ी चुनौती यह है कि जब राहुल गांधी और तेजस्वी यादव बिहार में ‘मत अधिकार रैली’ कर रहे थे, तब ममता बनर्जी शामिल नहीं थीं। पश्चिम बंगाल में SIR जैसी घटनाएँ चल रही थीं लेकिन विपक्षी दलों ने पूरी तरह उनका समर्थन नहीं किया।

नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘ममता बनर्जी की हार के बाद विपक्ष के सामने एकमात्र राह कांग्रेस नेतृत्व को स्वीकार करना है और कांग्रेस को भी बड़ी उदारता दिखानी होगी। यदि ऐसा हुआ तो विपक्ष आगे बढ़ सकता है। यह समय न केवल विपक्षी दलों के लिए बल्कि भाजपा के लिए भी महत्वपूर्ण है कि वे आगे कैसी रणनीति अपनाते हैं।’

रशीद किदवई कहते हैं, ‘जब भाजपा हारती है तो वह तुरंत दूसरी तैयारी में लग जाती है, लेकिन विपक्ष हारने के बाद उदासीन हो जाता है, जैसे बिहार में हार के बाद विपक्ष निःसक्रिय हो गया और जनता की समस्याओं से दूर हो गया।’

(बीबीसी हिन्दी के लिए चंदन कुमार जजवाड़े की रिपोर्ट)