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नेपाल में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 50 प्रतिशत तक बढ़ाने पर जोर

काठमांडू। जेने-जी आंदोलन के माध्यम से स्थापित मजबूत सरकार को महिलाओं के प्रतिनिधित्व को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने की मांग उठाई गई है। शुक्रवार को संचारिका समूह के आयोजन में और युएनएफपीए के सहयोग से ‘लैंगिक समानता प्रवर्द्धन तथा लैंगिक हिंसा समाप्ति के लिए आगामी रणनीतिक विषयों पर संवाद’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में युवा नेतृत्व ने महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाकर विश्व में एक उदाहरण प्रस्तुत करने की मांग की।

महिलाओं के खिलाफ होने वाले सभी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करने वाली संयुक्त राष्ट्र की ‘‘महिलाओं के खिलाफ भेदभाव उन्मूलन समिति (सीड)’’ की सदस्य वन्दना राणा ने नेपाल के जेने-जी आंदोलन को विश्व का ध्यानाकर्षित करने वाला बताया। उन्होंने कहा, ‘अन्य देशों में जेने-जी आंदोलन असफल रहा, पर नेपाल में यह न केवल सफल रहा बल्कि सरकार ने नेतृत्व भी संभाला और मजबूत भूमिका निभाई। इतना मजबूत नेतृत्व महिलाओं के प्रतिनिधित्व को 33 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक ले जाना चाहिए।’ राणा ने नेपाल को ‘ग्लोबल रिकॉर्ड’ बनाने पर बल दिया।

कार्यक्रम में महिला, कानून और विकास मंच के अध्यक्ष तथा अधिवक्ता सविन श्रेष्ठ ने लैंगिक हिंसा में मुख्यतः यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के विषय पर जोर देने की बात कही। उन्होंने कहा, ‘कितने बच्चे होने चाहिए यह महिलाओं की इच्छा है, लेकिन सरकार जनसंख्या की आवश्यकता पर या उसके अभाव में महिलाओं पर विभिन्न नीतियां लागू करती दिख रही है। महिलाओं पर राज्य की ओर से भी हिंसा हो रही है।’ नेपाल पुलिस के आंकड़ों के अनुसार 91 प्रतिशत हिंसा परिचित व्यक्तियों से होती है।

नेपाल में होने वाली कुल हिंसा में 29 प्रतिशत लैंगिक हिंसा है। सविन श्रेष्ठ ने यह भी खुलासा किया कि नेपाल में गोपनीय रूप से ‘सरोगेट’ गर्भपात भी करवाए जाते हैं। उन्होंने कहा, ‘लिविंग टूगेदर संबंधों में भी महिलाएं अत्यधिक शोषण का शिकार हैं, इसलिए कानूनी जटिलताओं को सुलझाने की मांग है।’ वरिष्ठ अधिवक्ता मीरा ढुंगाना ने कहा कि नेपाल में महिलाओं के हित में पर्याप्त कानून हैं, फिर भी न्याय पीड़ित तक नहीं पहुंच पा रहा है। उन्होंने कहा, ‘कानून की जटिलताओं के कारण महिलाएं अदालत तक पहुंचना तो दूर, पुलिस में शिकायत दर्ज कराने में भी असमर्थ हैं। बड़े अपराधों में भी महिलाएं मेल-मिलाप करने को मजबूर होती हैं। यह सभी कानूनी साक्षरता के अभाव की वजह है।’