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अदालत प्रक्रिया से परियोजना कार्यान्वयन में देरी रोकने के लिए तेज़ पूर्वाधार इजलास गठित करने की सिफारिश

समाचार सारांश

संपादकीय समीक्षा कर तैयार।

  • मंत्रिमंडल ने अदालत प्रक्रियाओं के कारण पूर्वाधार निर्माण में हो रही देरी को रोकने के लिए समर्पित फास्ट ट्रैक पूर्वाधार इजलास गठित करने की सिफारिश की है।
  • समिति ने सरकार को पूर्वाधार से जुड़ी पेंडिंग मामलों को 60 दिनों के भीतर सुनवाई और निर्णय, तथा 3 महीनों के अंदर परिणाम निकालने का सुझाव दिया है।
  • समिति ने सार्वजनिक खरीद, मध्यस्थता अधिनियम और दंड संहिता में संशोधन कर पूर्वाधार विकास को तेज और प्रभावी बनाने के सुझाव दिए हैं।

1 जेठ, काठमांडू। अदालत प्रक्रिया के कारण परियोजना कार्यान्वयन में हो रही देरी को रोकने के लिए ‘समर्पित फास्ट ट्रैक पूर्वाधार इजलास और न्यायाधीकरण’ गठित करने की सिफारिश की गई है।

मंत्रिमंडल ने १३ चैत २०८२ को स्वीकृत शासकीय सुधार के तहत १०० कार्यसूची विषयों के कार्यान्वयन के दौरान पूर्वाधार निर्माण और विकास परियोजनाओं से संबंधित अदालतों में आने वाले मामलों का त्वरित एवं प्रभावशाली समाधान करने के उद्देश्य से कानून, न्याय और संसदीय मामले मंत्रालय ने एक समिति गठित की थी।

मंत्री स्तर के निर्णय के अनुसार इस मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में गठित उच्च स्तरीय समिति ने अपना प्रतिवेदन सरकार को सौंपा है।

प्रतिवेदन में समिति ने पूर्वाधार निर्माण और विकास परियोजनाओं में भूमि अधिग्रहण, मुआवजा निर्धारण और ठेका प्रक्रियाओं से जुड़े रिट याचिकाओं की सुनवाई के लिए नेपाल के सर्वोच्च एवं उच्च अदालतों में विशेषज्ञ न्यायाधीशों की मौजूदगी वाली समर्पित फास्ट ट्रैक पूर्वाधार इजलास गठित करने की सिफारिश की है।

समिति ने सिफारिश की है कि उस इजलास में रिट याचिका दर्ज करने की तारीख से 60 दिनों के भीतर सुनवाई और कार्यवाही पूरी की जानी चाहिए।

सर्वोच्च अदालत पर यह जिम्मेदारी रहेगी कि प्रधान न्यायाधीश और उच्च अदालत के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश और मुख्य न्यायाधीश निरंतर अध्ययन एवं निगरानी करें कि क्या उक्त इजलास में मामलों की सुनवाई व कार्यवाही 60 दिनों के भीतर पूरी हो रही है या नहीं। पूर्वाधार इजलास विशेषज्ञ न्यायाधीशों से गठित हो।

पूर्वाधार मामलों का निपटारा 3 महीनों के भीतर करने के लिए न्यायाधीकरण की सिफारिश

समिति ने निष्कर्ष निकाला है कि देश में पूर्वाधार विकास परियोजनाओं में अनिश्चितकालीन रुकावट और अरबों की हानि एक गंभीर समस्या है।

समिति के अनुसार देशभर में सैकड़ों परियोजनाएं वर्षों तक अधर में लटकी होती हैं, जिससे आम जनता को सेवा लाभ मिलने में लंबा समय लगता है।

वर्तमान न्यायिक संरचना में तकनीकी और जटिल निर्माण संबंधी मामलों का देर तक निपटारा न होना विकास परियोजनाओं के ठप्प होने, लागत वृद्धि और जनता को निराशा की स्थिति पैदा करता है।

इसलिए परियोजनाओं को कानूनी प्रक्रियाओं में उलझाए बिना सार्वजनिक हित सर्वोपरि रखते हुए शीघ्र, प्रभावी और विशेषज्ञ न्यायिक प्रणाली स्थापित करने के लिए पूर्वाधार न्यायाधीकरण गठित करने की सिफारिश की गई है।

यह न्यायाधीकरण तकनीकी ज्ञान वाले विशेषज्ञ न्यायाधीशों से बनेगा और तीन महीने के भीतर मामलों का निपटारा करने के उद्देश्य से गठित होगा। इसमें साझेदारों के बीच विवाद, बैंक गारंटी, मध्यस्थता अधिनियम के तहत अदालत की अधिकारिता शामिल करनी होगी।

सार्वजनिक खरीद, पूर्वाधार विकास और निर्माण से जुड़े ठेकों, सार्वजनिक-निजी भागीदारी परियोजनाओं में व्यवसायी, सलाहकार, जनशक्ति, आपूर्तिकर्ता और स्थानीय समुदाय के बीच विवादों का निवारण भी इस न्यायाधीकरण के दायरे में होगा।

निर्माण सामग्री के उत्खनन, मरम्मत, संचालन की जिम्मेदारी, राइट ऑफ वे, रॉयल्टी वितरण, परियोजना संचालन की स्थिति जैसी विवादों को भी यह निकाय सुलझाएगा।

पूर्वाधार न्यायाधीकरण में उच्च अदालत के न्यायाधीश की अध्यक्षता में अनुभवी विशेषज्ञ सदस्य और इंजीनियरिंग क्षेत्र के विशेषज्ञ सदस्य भी होंगे।

समिति ने यह भी सिफारिश की कि पूर्वाधार से जुड़े मामलों का फैसला दो महीने के भीतर हो, जिसके लिए कानूनी और संस्थागत जल्दबाजी की व्यवस्था की जानी चाहिए।

भूमि अधिग्रहण, संपत्ति का मूल्यांकन और मुआवजा निर्धारण में प्रारंभिक अदालत को समर्पित फास्ट ट्रैक प्रणाली तय करते हुए, दो महीने के भीतर दंडात्मक और पुनरावेदन चरणों में भी फैसला सही समय में लेने की व्यवस्था की सिफारिश की गई है।

न्यायाधीशों को परियोजना से संबंधित प्रशिक्षण देना आवश्यक

समिति ने परियोजना विवादों से संबंधित न्यायाधीशों को विविध पहलुओं की जानकारी देने और अभिमुखीकरण आवश्यक बताया है ताकि वे परियोजना के हर पक्ष को समझ सकें और समय पर न्यायिक सेवा सुनिश्चित कर सकें।

सार्वजनिक खरीद, दंड संहिता और मध्यस्थता अधिनियम में संशोधन की सिफारिश समिति ने की है।

न्याय प्रशासन अधिनियम, संक्षिप्त कार्यविधि अधिनियम, दंड कार्यविधि और अदालत नियमावली में भी संशोधन कर उन्हें प्रभावी बनाने की अपील की गई है।

मामले चलते रहने पर भी परियोजना का काम जारी रहेगा

समिति ने सुझाव दिया है कि विवाद जारी रहते हुए भी परियोजना कार्य बाधित न हो, विवादित राशि को एस्क्रो खाते में रखा जाए, नो क्लियरेंस–नो टेंडर नीति लागू हो, परियोजना स्तर पर विवाद निवारण बोर्ड गठित किया जाए और समय पर मध्यस्थता की व्यवस्था की जाए।

इसके साथ ही सार्वजनिक हित परीक्षण को कानूनी मान्यता देकर लंबे समय से रुकी परियोजनाओं पर पुनः ठेका लगाने, जवाबदेही सुनिश्चित करने, डिजिटल निगरानी और पारदर्शिता बढ़ाने के सुझाव भी दिए गए हैं।

सर्वोच्च अदालत नियमावली २०७४ में संशोधन कर निर्णय की पूर्ण प्रति २१ दिनों के भीतर उपलब्ध कराने, न्यायाधीश एवं पक्षकारों द्वारा पेशी स्थगित न करने की व्यवस्था, और बहस में वास्तविक हितधारकों को ही विपक्षी बनाए जाने की व्यवस्था की सिफारिश की गई है।

समिति द्वारा चिन्हित सुधार के विषय

·       मामलों के कारण परियोजना प्रारंभ में देरी

·       अस्थायी आदेशों से उत्पन्न समस्याएं

·       परियोजना संबंधित मामलों के त्वरित निपटान में देरी

·       परियोजना अनुबंधों में विवाद समाधान के उपायों का अभाव और रिट क्षेत्राधिकार में उपचार की छुट

·       सामान्य जनता के प्रति दायित्व की कमी