
३ जेठ, काठमाडौँ। बाँके के कोहलपुर नगरपालिका ने वार्ड नंबर ११ के आसपास क्रिकेट मैदान की जमीन खाली करने के लिए वैशाख १६ को १० दिन का नोटिस जारी किया था।
उस समय सीमा के खत्म होने से एक दिन पहले ही सर्वोच्च न्यायालय ने चरणबद्ध प्रक्रिया और उचित प्रबंधन के बिना सुकुमवासी और असंगठित निवासियों को जबरन विस्थापित न करने का आदेश दिया था।
वैशाख के दूसरे सप्ताह में काठमांडू की नदी किनारे की बस्तियों को धमाकेधमी हटाने के बाद दायर रिट में सुनवाई करते हुए न्यायाधीश कुमार रेग्मी और नित्यानंद पांडेय की पीठ ने २५ वैशाख को यह आदेश जारी किया था। इसके अगले दिन कोहलपुर नगरपालिका ने एक और नोटिस जारी किया।
प्रमुख प्रशासकीय अधिकारी मानबहादुर गिरी द्वारा हस्ताक्षरित नोटिस में कहा गया कि ‘वैशाख २५ को सर्वोच्च अदालत द्वारा जारी सुकुमवासी बस्तियों से संबंधित अंतरिम आदेश नगर विकास समिति की अतिक्रमित जमीन पर लागू नहीं होगा।’

अपनी पूर्व सूचना के अनुसार, नगरपालिका ने वहाँ से ३७० परिवारों को हटाया। इनमें से ११० परिवारों को होल्डिंग सेंटर में रखा गया, जैसा कि कोहलपुर नगरपालिका की उपमेयर संगिता सुवेदी ने बताया।
नगर विकास की जमीन पर बसे इलाकों को हटाने में सर्वोच्च अदालत का आदेश बाधा नहीं है, सुवेदी ने कहा। उन्होंने स्पष्ट किया, ‘‘अदालत ने ऐलानी जमीन की बस्तियों को हटाने से मना किया है, नगर विकास की जमीन पर मौजूद बस्तियों को हटाने का मतलब नहीं।’’
बाँके के साथ जुड़े बर्दिया जिले के विभिन्न पालिकाओं में भी बस्ती हटाने का सिलसिला जारी है, सरोकार रखने वाले बताते हैं। बर्दिया के मधुवन नगरपालिका के मेयर तेजबहादुर भाट ने कहा कि अदालत के आदेश के बावजूद डिविजन वन कार्यालय बस्तियाँ हटाने के लिए डोजर चला रहा है।
लुम्बिनी प्रदेश के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अधीन सड़क डिविजन कार्यालय ने वैशाख १४ को ‘अतिक्रमित वन क्षेत्र खाली करने’ का नोटिस जारी किया था। उसके बाद जिले के सभी नगरपालिका एवं ग्रामपालिकाओं ने एकजुट होकर इसका विरोध किया। साथ ही सेना और पुलिस द्वारा लगत (मुआवजा) वसूली पर भी विरोध जताया।
इसी बीच सर्वोच्च अदालत का आदेश आया, पर डोजर लेकर बस्तियाँ हटाने का काम नहीं रुका। मधुवन के मेयर भाट ने बताया, ‘‘सेना द्वारा लगत वसूलने से हम पहले ही विरोध कर रहे थे। हम कहते हैं कि सर्वोच्च अदालत का आदेश लागू होना चाहिए, मगर आदेश के विपरीत ध्वस्त करने का कार्य जारी है।’’
लुम्बिनी प्रदेश के पूर्वी रुकुम जिले में भी बस्ती हटाने का अभियान जारी है। सिस्ने गाउँपालिका ने मध्यपहाड़ी (पुष्पलाल) लोकमार्ग के आसपास की संरचनाओं को हटाया। गाउँपालिका अध्यक्ष कृष्ण रेग्मी ने बताया कि सड़क के किनारे बनाए गए ढल, गेराज, होटल जैसी संरचनाओं के निर्माताओं को विकल्प देकर हटाया गया है।
अध्यक्ष रेग्मी ने कहा, ‘‘सड़क के १७ मीटर के भीतर कोई भी संरचना बनाने की अनुमति कानूनन नहीं है। इसलिए वहां की संरचनाएं हटाई गईं। हमने विकल्प दी, जिससे उन्हें खाली करने का मौका मिला। सरकार को अभिभावक की भूमिका निभानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर दंडात्मक कार्रवाई भी करनी चाहिए।’’
पश्चिमी पहाड़ों में ही नहीं, मधेश प्रदेश में भी सड़क के किनारे की संरचनाओं को हटाने का क्रम नहीं रुका है। पथलैया-ढल्केबर सड़कखंड के बारा के 3 नंबर पुल के पास गत शुक्रवार को डोजर चलाया गया था।

सड़क के पास रहने वाले ३५ परिवारों के लगभग ७० मकान-टहरा डिविजन वन कार्यालय बार ने हटाए हैं। वन कार्यालय, बारा, पर्सा राष्ट्रीय निकुञ्ज और स्थानीय सरकार ने संयुक्त रूप से यह बस्ती खाली कराई।
बार के डिविजन वन कार्यालय प्रमुख सुजितकुमार झा ने बताया कि वन एवं निकुञ्ज क्षेत्रों में हुए अतिक्रमण हटाने के लिए अदालत ने रोक नहीं लगाई है। वन अधिनियम और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत यह कार्रवाई हुई है।
झा के अनुसार, बार में लगभग १७ हजार घर परिवार अतिक्रमित क्षेत्र में रहते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘कानून के अनुसार काम कर रहे हैं, अदालत ने रोक नहीं लगाई है। बाकी अतिक्रमित बस्तियाँ भी खाली की जाएंगी।’’
3 नंबर पुल क्षेत्र से विस्थापित व्यापारियों ने सरकार पर आरोप लगाया कि अदालत के आदेशों के विपरीत उन्हें जबरन उठा-बसा कर दुविधाग्रस्त स्थिति में रखा गया है। उन्होंने कहा कि सरकार न्यायालय और मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रही है।
उद्योग वाणिज्य संघ, जितपुरसिमरा की अध्यक्ष मोहन शर्मा ने बताया कि सरकार ने व्यापारियों को सामान हटाने के लिए न्यूनतम समय भी नहीं दिया। वे खुद डोजर चलाए गए क्षेत्र में गए थे, और व्यापारियों को सामान निकालने के लिए आधे घंटे से भी कम वक्त मिला। उन्होंने कहा, ‘‘अधिकारिक जमीन के बदले मुआवजा मिलना चाहिए। धमाधम बस्ती खाली करने के दौरान भी जनता के पक्ष में कोई आवाज नहीं उठी।’’
अदालत ने जनता के पक्ष में आदेश दिए, लेकिन उनका पालन नहीं हो पा रहा है, सरोकार रखने वाले बताते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी, गोपाल रन पहेली, माजिद अन्सारी आदि ने गैरकानूनी तरीके से बस्ती हटाने के खिलाफ सर्वोच्च अदालत में अलग-अलग रिट दायर की थीं।

रिट की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा, ‘‘सुकुमवासी और असंगठित बसोवासियों को उनके निवास स्थान से विस्थापित कर अन्यत्र प्रबंध करने के संबंध में कानून और उचित प्रक्रिया अपनाए बिना, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास जैसे मूलभूत अधिकारों को होने वाली अपूरणीय क्षति और मानवीय संकट को ध्यान में रखते हुए, नेपाल सरकार को निर्देश दिया है कि वह शासकीय सुधार कार्यसूची के बिंदु ९१ के अनुसार चरणबद्ध प्रक्रिया अपनाए तथा जबरन बस्ती हटाने या विस्थापनकर्ताओं को उनके स्थान से हटाने से रोके।’’
शासकीय सुधार कार्यसूची के बिंदु ९१ के तहत ६० दिनों के भीतर लगत संकलन एवं प्रमाणीकरण और १००० दिनों के भीतर वास्तविक भूमिहीनों को जमीन उपलब्ध कराने का प्रावधान है। संघीय मामिला तथा सामान्य प्रशासन मंत्रालय ने वैशाख १७ को सभी पालिकाओं को पत्र जारी कर सुकुमवासी की पहचान करने, प्रबंधन करने, अतिक्रमण हटाने के लिए शिक्षण संस्थानों के प्रशासन से सहयोग मांगने का आदेश भी दिया।
उसी दिन गृह मंत्रालय ने भी वैशाख १६ को जिला प्रशासन कार्यालयों को पत्र जारी कर अतिक्रमित संरचनाएं हटाने की योजना बनाने और मंत्रालय की अनुमति मिलने के बाद उचित सुरक्षा इंतजाम के साथ ऐसी संरचनाएं हटाने के निर्देश दिए थे।
रिट के आवेदक वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी कहते हैं कि अदालत ने वैकल्पिक पुनर्वास की व्यवस्था किए बिना किसी भी संरचना को न तोड़ने का निर्देश दिया था।
सिर्फ अदालत ही नहीं, सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी की सचिवालय बैठक ने भी थापाथली, मनोहरा, बालाजु, स्वयम्भु जैसे सुकुमवासी बस्तियों को हटाने के बाद अन्य भूमिहीन सुकुमवासियों का असुरक्षित होने का हवाला देते हुए सरकार को डोजर नहीं चलाने का सुझाव दिया था, जब तक प्राधिकरण का गठन होकर रिपोर्ट न आ जाए।
शहरी विकास मंत्री सुनील लम्साल ने भी कहा था कि सुकुमवासियों की पहचान और उचित प्रबंधन योजना बनने तक बस्ती खाली करने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ेगी।
सरकार की प्रतिबद्धता न के बराबर है और साथ ही अदालत के आदेशों का भी उल्लंघन हो रहा है, सरोकार रखने वाले बताते हैं।
