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संविधान संशोधन में प्रत्यक्ष निर्वाचित प्रधानमंत्री और गैरदलीय स्थानीय तह को प्राथमिकता

समाचार संक्षेप संपादकीय समीक्षा के बाद। बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार ने संविधान संशोधन पर बहस पत्र तैयार करने हेतु गठित कार्यदल विभिन्न दलों, संविधानविदों और नागरिक नेताओं के साथ बातचीत कर रहा है। संविधान संशोधन कार्यदल शासकीय स्वरूप, निर्वाचन प्रणाली, संघीयता, न्यायपालिका और संवैधानिक निकायों से संबंधित ४६ बिंदुओं पर विचार-विमर्श कर रहा है। सरकार न्यायपालिका सुधार, संवैधानिक निकायों की स्वायत्तता, गैरआवासीय नेपाली नागरिकता तथा संसद अधिवेशन को स्वचालित करने के विषयों पर भी राय मांग रही है। ३ जेठ, काठमांडू। बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार ने संविधान संशोधन बहस पत्र तैयार करने के लिए गठित कार्यदल विभिन्न हितधारकों के साथ संवाद कर रहा है। १६ चैत को हुई मंत्रिपरिषद् बैठक में गठित इस कार्यदल ने विभिन्न दलों, संविधान विशेषज्ञों, नागरिक नेताओं तथा जनजाती प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की है। प्रधानमंत्री के राजनीतिक सलाहकार असिम शाह को संयोजक बनाने पर विभिन्न टिप्पणियां सामने आई हैं। प्रधानमंत्री बालेन ने दूसरे बैठक में संविधान संशोधन जैसे गंभीर विषय पर जल्दबाजी में कार्यदल बनाये जाने की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि इस विषय पर संसद में मौजूद अन्य दलों से कोई चर्चा नहीं की गई थी। संसद की बैठक भी उस समय निर्धारित नहीं थी जब यह निर्णय लिया गया था। संशोधन कार्यदल बनाने और बजट अधिवेशन कॉल करने के निर्णय एक साथ ही लिए गए थे। इस पर कई लोग आपत्ति जता चुके हैं। फिर भी कार्यदल विभिन्न दलों, संविधानविदों तथा अन्य संबंधित पक्षों के साथ चर्चा जारी रखे हुए है। संविधान संशोधन को लेकर निरंतर जारी इन चर्चाओं के बीच यह स्पष्ट हो रहा है कि किन विषयों को प्राथमिकता दी जा रही है। सूत्रों के अनुसार यह पांच विषय–शासकीय स्वरूप, निर्वाचन प्रणाली, संघीयता, न्यायपालिका और संवैधानिक निकायों को प्रमुखता दे रहा है। इसके अलावा कई अन्य विषय भी शामिल हैं। इन सभी शीर्षकों में कुल ४६ बिंदु शामिल किए गए हैं।

शासकीय स्वरूप
शासकीय स्वरूप में बदलाव को सरकार ने प्राथमिकता देते हुए चर्चा आरंभ की है। वर्तमान व्यवस्था कितनी प्रभावी है या पूर्ण संसदीय या संशोधित संसदीय व्यवस्था की आवश्यकता है? क्या सीधे निर्वाचित कार्यकारी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री होना चाहिए या नहीं, इस पर राय मांगी गई है। साथ ही, विशेषज्ञ मंत्रियों की नियुक्ति या सांसद मंत्री व्यवस्था के उपयुक्त होने पर भी सरकार का विशेष ध्यान है। इसमें मंत्रिपरिषद गठन, मंत्रियों की जवाबदेही जैसे विषयों पर भी विचार चल रहा है।

निर्वाचन प्रणाली
हाल ही में निर्वाचन प्रणाली पर बढ़े बहसों को सरकार ने प्राथमिकता दी है। सरकार की ओर से प्रस्तावित संविधान संशोधन में प्रत्यक्ष निर्वाचित, पूर्ण समानुपातिक या मिश्रित निर्वाचन प्रणाली आवश्यक है या नहीं, इस पर सवाल उठाए गए हैं। ‘कैसे निर्वाचन प्रणाली को और अधिक लोकतांत्रिक और समावेशी बनाया जाए’ इस विषय पर प्रस्ताव रखे गए हैं, जिनमें नोटा/राइट टू रिकॉल तथा विदेश में रहने वाले नेपाली मताधिकार से जुड़ी बातें भी शामिल हैं। इसके साथ ही संघ, प्रदेश तथा स्थानीय तह की व्यवस्था में सुधार और राष्ट्रीय सभा अध्यक्ष/उपाध्यक्ष की भूमिका पर भी चर्चा प्रस्तावित है। संविधान संशोधन में निर्वाचन गठबंधन संस्कृति को व्यवस्थित बनाने का सरकार प्रस्ताव है।

संघीयता बहस
संविधान निर्माण के दौरान सबसे जटिल बने संघीयता के विषय को अब संविधान संशोधन में उठा लिया गया है। सरकार प्रशासनिक और वित्तीय संघीयता को प्रभावी बनाने पर जोर दे रही है। जैसे प्रदेशों की संख्या और प्रादेशिक संरचना में सुधार की संभावनाओं पर विशेषज्ञों से राय मांगी गई है। प्रदेश में प्रत्यक्ष निर्वाचित मुख्यमंत्री होने का विषय सरकार की चर्चा में है। इसके अलावा मंत्री या जनप्रतिनिधि संख्या निर्धारण, प्रदेश मंत्रालय की चुस्तता, प्रदेश प्रमुख की भूमिका तथा अनुपस्थिति में कार्य प्रणाली, विधेयक प्रमाणीकरण न होने पर उठने वाले प्रभाव जैसे विषय प्रस्तावित हैं। स्थानीय तह के लिए तीन विषय भी शामिल हैं। वर्तमान पार्टी-आधारित व्यवस्था सही है या दलविहीन व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा आधारित स्थानीय तह आवश्यक है, इस पर सरकार विचार कर रही है। ‘स्थानीय तह को कैसे जवाबदेय बनाया जाए?’ और ‘न्यायिक समिति में सुधार कैसे हो?’ जैसे विषय भी शामिल हैं।

न्यायपालिका सुधार
सरकार ने न्यायपालिका सुधार के संवैधानिक विषयों को भी चर्चा में शामिल किया है। स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं सक्षम न्यायपालिका बनाने के आवश्यक सुधारों को प्राथमिकता मिली है। ‘प्रधान न्यायाधीश, सर्वोच्च, उच्च और जिला अदालत के न्यायाधीशों की नियुक्ति, योग्यता, पदावधि, उम्र सीमा, नैतिक चरित्र, आचरण, अनुशासन आदि विषयों पर क्या कदम उठाने चाहिए’ पर कार्यदल ने चर्चा का प्रस्ताव रखा है। अदालत से आए रिपोर्टों में उठी विसंगतियों और दोषों को नियंत्रित करने के उपायों पर भी राय मांगी गई है। न्यायपालिका में राजनीतिक हस्तक्षेप को समाप्त करने तथा सभी न्यायाधीशों की पुनर्नियुक्ति पर भी विचार चल रहा है। न्याय परिषद के संरचनात्मक सुधार, कानून मंत्री की सिफारिश पर नियुक्त कानूनविद और नेपाल बार एसोसिएशन प्रतिनिधि की उपस्थिति जैसे विषयों पर सुझाव मांगे गए हैं। संवैधानिक परिषद में प्रधान न्यायाधीश के सदस्य होने या न होने, न्यायाधीश नियुक्ति का प्रतिस्पर्धात्मक विधि, न्याय सेवा कर्मचारी और कानूनी पेशेवरों के बीच संतुलन बनाए रखने के उपायों पर भी चर्चा हो रही है। संवैधानिक पीठ की आवश्यकता एवं औचित्य विषय भी ध्यान में हैं। सर्वोच्च अदालत में मुकदमा दबाव कम करने के लिए उच्च अदालतों को अधिक अधिकार देने की सलाह विशेषज्ञों ने दी है।

संवैधानिक निकाय
संवैधानिक निकायों में आवश्यक परिवर्तनों के विषय भी कार्यदल द्वारा उठाए गए हैं। यह निकायों की संख्या, पदाधिकारियों की संख्या, नियुक्ति विधि/प्रक्रिया, स्वायत्तता और जिम्मेदारी संतुलन के उपायों पर चर्चा कर रहा है। प्रदेश लोक सेवा आयोग की जरूरत और औचित्य पर भी ध्यान दिया गया है। संवैधानिक निकायों से जुड़ी महाभियोग/संसदीय सुनवाई के औचित्य, सिफारिशों के कार्यान्वयन तथा प्रदेश लोक सेवा आयोग की आवश्यकता पर राय ली जा रही है। संसद अधिवेशन को स्वचालित बनाने, गैरआवासीय नेपाली नागरिकता एवं अधिकार, जनप्रतिनिधि की योग्यता और आयु सीमा, एक व्यक्ति द्वारा प्रतिनिधि पद के कार्यकाल, धारा ५४ के नीति निर्देशक सिद्धांतों का प्रगतिशील कार्यान्वयन, धारा १११ की उपधारा ५ के तहत संघीय व्यवस्था में सुधार, सजाय माफी, स्थगन, परिवर्तन तथा सजाय में कमी, विधेयक प्रमाणीकरण, मालिकाना हक कार्यान्वयन, मुख्य न्यायाधिवक्ता हटाने या अभियोजन अधिकार देने जैसे विषयों पर भी राय ली जा रही है। इसके अलावा, जिम्मेदार विशेषज्ञों के अन्य सुझाव भी संविधान संशोधन के लिए संकलित किए गए हैं और लिखित सुझाव देने हेतु कार्यदल ने व्यवस्था की है।