प्रधानन्यायाधीश डॉ. मनोजकुमार शर्मा: न्याय कार्य में हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं

प्रधानन्यायाधीश डॉ. मनोजकुमार शर्मा ने न्याय प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप को अस्वीकार्य बताया है। उन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और जनविश्वास से युक्त न्यायपालिका के निर्माण को अपने कार्यकाल का सर्वोच्च लक्ष्य बताया। शर्मा ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लोकतंत्र की मेरुदण्ड बताते हुए इस पर कोई समझौता न होने की स्पष्ट बात कही है। ५ जेष्ठ, काठमांडू।
प्रधानन्यायाधीश डॉ. मनोजकुमार शर्मा ने न्याय प्रक्रिया की गरिमा में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप को अस्वीकार्य बताते हुए यह बात मंगलवार को सर्वोच्च अदालत पहुंच कर पदभार ग्रहण के बाद अपने संबोधन में कही। ‘न्यायपालिका की संस्थागत स्वतंत्रता, न्यायाधीशों की व्यावसायिक निष्पक्षता तथा न्याय प्रक्रिया की गरिमा में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा,’ प्रधानन्यायाधीश शर्मा ने कहा।
उन्होंने प्रधानन्यायाधीश के पद को केवल एक पद नहीं, बल्कि संविधान, विधि का शासन, न्यायिक स्वतंत्रता और नागरिकों के न्याय के प्रति विश्वास को और मजबूत करने की जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया है। ‘न्यायपालिका नेपाल के संविधान की संरक्षक, मौलिक अधिकारों की प्रतिज्ञाकर्ता तथा लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ है,’ शर्मा ने कहा, ‘इसलिए स्वतंत्र, निष्पक्ष, सक्षम और जनविश्वासयुक्त न्यायपालिका का निर्माण और संरक्षण मेरा कार्यकाल का मूल लक्ष्य होगा।’
उन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लोकतंत्र की मेरुदण्ड भी दोहराया। ‘मेरी पहली और सर्वोच्च प्राथमिकता स्वतंत्र न्यायपालिका को पूर्णतः अक्षुण्ण रखना है। इस मान्यता पर किसी भी परिस्थिति में कोई समझौता नहीं होगा। न्यायपालिका की संस्थागत स्वतंत्रता, न्यायाधीशों की व्यावसायिक निष्पक्षता और न्याय प्रक्रिया में किसी भी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया जाएगा,’ उन्होंने कहा, ‘इस विषय में किसी को कोई संदेह करने की स्थिति नहीं आने दी जाएगी और मैं स्वयं भी ऐसी कोई संदेहास्पद स्थिति पैदा नहीं करूँगा और नहीं होने दूँगा, यह मैं पूर्ण विश्वास के साथ भरोसा दिलाना चाहता हूँ।
