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पत्रकारों के सवालों से बचते हुए ‘विश्वगुरु’ मोदी

७ जेठ, काठमाडौं। नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में एक भव्य सभाहल में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनस गहर स्टोरे अपनी-अपनी तैयार बयान पढ़ रहे थे। वहां उपस्थित सभी को पहले से पता था कि कोई प्रश्नोत्तर सत्र नहीं होगा। दोनों नेताओं ने अपने-अपने बयान समाप्त करने के बाद हाथ मिलाया और बाहर निकलने लगे तभी अचानक एक पत्रकार के तीव्र प्रश्न ने सभाहल की मौनता को तोड़ दिया। नॉर्वे की दैनिक ‘दागसाभिसेन’ की पत्रकार हेले लिंग स्वेंसन ने प्रधानमंत्री मोदी से यह प्रश्न किया कि विश्व की सबसे स्वतंत्र प्रेस वाले देश में कुछ सवाल क्यों नहीं किए जाते। सुरक्षा गार्डों के घेरे में सभाहल से बाहर निकले मोदी ने उस प्रश्न का कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन यह घटना अब विश्व की मीडिया में बड़ी बहस का विषय बन चुकी है। १२ वर्षों से लगातार सत्ता में बने, विभिन्न विदेशी संसदों को संबोधित करने और विशाल जनसभाओं को मंत्रमुग्ध करने वाले एक शक्तिशाली प्रधानमंत्री पत्रकारों के सवालों का सामना करने से बार-बार क्यों बचते हैं, इसे लेकर आलोचना बढ़ रही है।

मोदी ने १२ वर्षों में एक भी पूर्ण पत्रकार सम्मेलन नहीं किया है। २०१४ में भारत के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने कोई पारंपरिक एकल पत्रकार सम्मेलन आयोजित नहीं किया। यह तथ्य अब अंतरराष्ट्रीय मीडिया में कड़ी आलोचना का विषय बना हुआ है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ‘मोदी-०, राहुल-१२९’ नामक हालिया दावे से यह भेद राजनीतिक सन्दर्भ में स्पष्ट होता है। कांग्रेस के अनुसार, २०१४ से २०२६ तक लोकसभा में विपक्षी नेता राहुल गांधी ने १२९ पत्रकार सम्मेलन किए लेकिन मोदी ने इस अवधि में कोई पूर्ण पत्रकार सम्मेलन नहीं किया।

हालांकि कुछ कूटनीतिक अपवाद भी दिखाई दिए हैं। जून २०२३ में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथ संयुक्त पत्रकार सम्मेलन में मोदी ने सीमित ही प्रश्नों के जवाब दिए, जो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और मीडिया के क्षेत्र में अत्यधिक दुर्लभ माना गया। रॉयटर्स ने इसे ‘दुर्लभ पत्रकार सम्मेलन’ कहा था। उसी दौरान अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा प्रवक्ता जॉन कर्बी ने भी मोदी के प्रेस सम्मेलन में भाग लेने पर आभार जताया।

प्रधानमंत्री मोदी का पत्रकारों के सवालों का सामना करना स्वयं एक अंतरराष्ट्रीय समाचार बन गया है। यह प्रवृत्ति केवल भारत की आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि विदेश यात्रा के दौरान भी देखा जाता है। बीबीसी के अनुसार, मोदी ने पदभार ग्रहण के बाद कभी एकल पत्रकार सम्मेलन नहीं किया और विदेश यात्राओं के दौरान भी वह सीधे सवालों का सामना करना पसंद नहीं करते।

नॉर्वे के इस हालिया पत्रकार सम्मेलन की घटना बहुत चर्चा में है। तीव्र प्रश्न विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में शीर्ष स्थान पर स्थित देश की पत्रकार द्वारा किया गया था। रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) के २०२६ के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में नॉर्वे प्रथम स्थान पर है जबकि भारत १८० देशों में १५७वें स्थान पर है, जो पिछले वर्ष की तुलना में ६ स्थान नीचे गिरा है।

प्रश्नकर्ता पत्रकार हेले लिंग ने बाद में सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया कि वह कोई जासूस या विदेशी सरकार की एजेंट नहीं हैं। उन्होंने कहा कि नॉर्वे शीर्ष स्थान पर और भारत १५७वें स्थान पर है, इसलिए सहयोगी पक्षों से सवाल पूछना उनका कर्तव्य है। उनके प्रश्न के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए इसे गैरसरकारी संगठन की अफवाह बताया। लेकिन सीधे सवाल पूछने वाली नॉर्वे की उस पत्रकार को ऑनलाइन ट्रोलिंग की भारी लहर का सामना करना पड़ा। इतना तीव्र साइबर हमला हुआ कि उन्होंने अपने फेसबुक और इंस्टाग्राम खातों को मेटा कंपनी ने निलंबित कर दिया जाने का आरोप भी लगाया।

मोदी और इतिहास के साथ तुलना नॉर्वे में हुई इस हाल की घटना से ४३ वर्ष पुरानी एक ऐतिहासिक घटना याद आ गई। १५ जून १९८३ को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नॉर्वे का दौरा किया था और वहां के प्रधानमंत्री कारे व्हिलॉच के साथ संयुक्त पत्रकार सम्मेलन किया था। उसी वर्ष अक्टूबर में इंदिरा गांधी अमेरिकी टेलीविजन कार्यक्रम ‘मिट द प्रेस’ में शामिल हुईं और सवालों का सामना किया।

४३ वर्षों बाद भारत के प्रधानमंत्री का प्रेस से बचना देश के राजनीतिक और लोकतांत्रिक चरित्र में आए बदलाव को स्पष्ट करता है। नरेंद्र मोदी की पत्रकार सम्मेलन टालने की प्रवृत्ति अंतरराष्ट्रीय मंच पर कोई नई बात नहीं है। पिछले वर्षों में जर्मनी से लेकर अमेरिका तक उनकी आलोचना हुई है। २०१७ में वाशिंगटन डीसी में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ संयुक्त पत्रकार सम्मेलन में मोदी को कोई प्रश्न नहीं पूछे जाने की बात ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ने लिखी थी। २०२२ में बर्लिन में जर्मन चांसलर ओलाफ सोल्ज के साथ संयुक्त सम्मेलन में भी भारतीय पक्ष के आग्रह पर पत्रकारों को प्रश्न न भेजने की व्यवस्था की गई। २०२३ में नई दिल्ली में जी-२० सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथ द्विपक्षीय वार्ता में अमेरिकी पत्रकारों को प्रवेश निषेध किया गया, जिसे व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव ने ‘वियतनाम में पत्रकार सम्मेलन करना आसान होगा’ कहकर टिप्पणी की थी।

२०२६ में नीदरलैंड दौरे के दौरान वहां के प्रधानमंत्री रोब जैटेन ने भारत में मुसलमानों समेत अल्पसंख्यकों एवं प्रेस स्वतंत्रता पर दबाव की चिंता जताई थी। डच पत्रकार अश्वंत नंदाराम द्वारा विशेष प्रश्न पूछे जाने पर भारतीय पक्ष ने ‘बुझाई की कमी’ कहकर उसे टाल दिया।

अनलाइन ट्रोलिंग का जोखिम भारत के लिए नया नहीं है। विदेशी पत्रकारों द्वारा मोदी से कड़े सवाल पूछे जाने पर भारी ऑनलाइन ट्रोलिंग होती है। २०२३ में जून में वॉल स्ट्रीट जर्नल की पत्रकार सबरिना सिद्दीकी को भारत में अल्पसंख्यक मुसलमानों के अधिकारों पर सवाल पूछने पर धार्मिक एवं पृष्ठभूमि के आधार पर ऑनलाइन ट्रोल किया गया था, जिसका व्हाइट हाउस ने भी निंदा की थी। तीन वर्षों बाद नॉर्वे की हेले लिंग पर भी इसी तरह साइबर आक्रमण हुआ, जो डिजिटल मीडिया के जरिए पत्रकारों को सवाल पूछने से रोकने की कोशिश को दर्शाता है।

विश्लेषकों के अनुसार, मोदी पत्रकारों का सामना न करने के तीन मुख्य कारण हैं। पहला, भारत में मुसलमानों और अल्पसंख्यकों की स्थिति, सांप्रदायिक हिंसा और ‘बुलडोजर न्याय’ जैसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संवेदनशील मुद्दे हैं, जिन पर सरकार से सवाल पूछना कूटनीतिक चुनौती बनता है। दूसरा, प्रेस स्वतंत्रता और लोकतंत्र के घटते सूचकांक हैं। स्वीडन के ‘बी-डेम’ संस्थान ने भारत को चुनावी अधिनायकवाद की श्रेणी में रखते हुए २०१४ के ६५वें स्थान से २०२६ के दशक में १०५वें स्थान पर बताया है। तीसरा, ग़ौत्म अडानी और मुकेश अंबानी जैसे बड़े उद्योगपतियों के साथ सरकार के निकट संबंध और उन विषयों पर सवाल से बचना है। २०२५ फरवरी में एक अमेरिकी पत्रकार द्वारा अडानी मामले पर पूछे प्रश्न का जवाब मोदी ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उद्धरण देते हुए देने में असमर्थ दिखे।

नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग ने नॉर्वे में भारतीय राजदूत और भारत के विदेश मंत्रालय की पत्रकार सम्मेलन में भी सवाल उठाए, जहां तकरीबन १७ मिनट तक भारतीय कूटनीतिज्ञों ने जवाब देने का प्रयास किया लेकिन उनके उत्तर मुख्य रूप से पाँच हजार वर्ष पुरानी संस्कृति, कोविड प्रबंधन और योग जैसे विषयों तक सीमित रहे। ‘द वायर’ ने इसे स्वतंत्र प्रेस के मामले में ‘स्क्रिप्टेड पत्रकारिता’ के बराबर ‘कसकर नियंत्रित स्क्रिप्ट’ बताते हुए इसे कमजोर प्रतिक्रिया करार दिया है।

इसी बीच भारत में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और चुनाव आयोग की विशेष पुनरावलोकन मुहिम को लेकर कूटनीतिक और राजनीतिक विवाद बढ़ रहा है। चुनाव आयोग की मुहिम से लगभग ९१ लाख मतदाता नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, जिसमें कई अल्पसंख्यक क्षेत्र और तृणमूल कांग्रेस के मजबूत क्षेत्र शामिल हैं। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसका विरोध करते हुए शीर्ष अदालत में रिट याचिका दायर की है। इससे भारत में मताधिकार सुरक्षा के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चर्चा और सशक्त हुई है।

२०२३ में वाशिंगटन में आयोजित पत्रकार सम्मेलन में मोदी ने सबरिना सिद्दीकी के प्रश्न का जवाब देते हुए अपनी सरकार का उद्देश्य ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ बताया था। उन्होंने कहा था कि लोकतंत्र भारतीयों की रग-रग में बसा है। लेकिन १२ वर्षों के शासन के अंत में विश्व समुदाय यह सूक्ष्मता से देख रहा है कि यह नारा कितनी हद तक साकार हुआ है।