
रात के साढ़े 11 बज रहे थे। 5 जेठ की मध्यरात्रि थी, लेकिन काठमाडौं का माइतीघर अभी भी सोया नहीं था। न्याय की गुहार लगाते धरने पर बैठे लोगों की वजह से माइतीघर मण्डल जागरूक था। दिन भर जैसी जाम या भीड़ नहीं थी। कभी-कभी कुछ लोग बाइक लेकर अराजकता फैलाते थे, जिन्हें छोड़ दें तो माहौल शांत था। पास की सड़क पर चलने वाले वाहनों की आवाज़ भी ज्यादा तेज़ नहीं सुनाई देती थी। लेकिन कभी-कभी शराब पीकर आए लोगों की आवाज़ों से वहां मौजूद कुछ लोगों को डर लग सकता था। इसी शांत दिखने वाले माइतीघर मण्डल की सड़कों के किनारे कई टेंट लगे हुए थे। जब हम मध्यरात्रि वहां पहुंचे तो सात टेंट लगे थे। टेंट न होने वाली एक महिला खुली हवा के नीचे सो रही थी। बाकी कुछ समूह पतली चादर बिछाकर इसी तरह सो रहे थे और एक-दूसरे से बातचीत कर रहे थे। कुछ अपने टेंट में सोने की तैयारी कर रहे थे। पर खुला आसमान के नीचे सड़क पर रात बिताना धरने वाले लोगों का मन नहीं था। वहां के मच्छर काटने की वजह से उन्हें बहुत पीड़ा सहनी पड़ती थी। ऐसी परिस्थितियों में भी अपने मुद्दे को सरकार तक पहुंचाने के लिए उन्हें सड़क पर ही रहना पड़ता था। ‘मच्छर काटकर परेशान करते हैं, लेकिन फिर भी रहना पड़ता है, सरकार सुनती नहीं,’ वहां के एक व्यक्ति ने कहा।
उनकी सुरक्षा के लिए दो पुलिस कर्मी ड्यूटी पर थे। उनकी मांगें विभिन्न थीं। झापा की कृष्णमाया उप्रेती खुले आसमान के नीचे केवल एक ओढ़नी पहनें माइतीघर की सड़क पर सो रही थीं। जब हम वहां पहुंचे तो कुछ देर बाद 48 वर्षीय वह महिला उठीं। गोठाटार की रहने वाली वे अब रातभर माइतीघर में धरने पर हैं। उन्हें खाने-पीने की व्यवस्था आसान नहीं है। इसलिए सहयात्री संस्था महांकाल समूह द्वारा दिया गया भोजन खाने के बाद वे गोठाटार लौटने की योजना बना रही थीं। लेकिन रात की गाड़ी छूट जाने के कारण वे मजबूरन खुले आसमान के नीचे ही रुक गईं। उन्होंने कहा, ‘झापे में किसी ने मेरे साथ यौन दुराचार किया है। इसलिए मैं न्याय की तलाश में आई हूं। लेकिन अदालत और प्रशासन ने मेरा पक्ष नहीं लिया।’ न्याय की मांग को लेकर वे 13 वर्षों से संघर्षरत हैं। मौजूदा स्थिति के अनुसार वे 15 चैत से माइतीघर में धरने पर हैं। रात के गाड़ी छूट जाने के बाद वहां मौजूद लोगों ने उन्हें अपने टेंट के अंदर रखने का प्रस्ताव दिया, जिसके बाद उन्होंने अपने साथियों के साथ माइतीघर में ही रात बिताई।
टेंटों के बीच एक समूह बात-चीत कर रहा था। एक ट्रिपाल बिछाकर खुलकर बातचीत कर रहे समूह में जानकी विष्ट, रमिला कार्की, जमुना खत्री और पुष्पमाया कार्की थीं। उनकी बातचीत सुनकर ऐसा महसूस हुआ कि माइतीघर में रातभर धरने पर बैठने वाले उनका अलग सा गांव बस गया हो। वे एक-दूसरे के दुख-सुख साझा कर रही थीं। जानकी विष्ट ने अपना अनुभव साझा किया। दार्चुला, ब्यास गाउँपालिका की जानकी विष्ट कुछ दिन से माइतीघर मण्डला में हैं। वे भले मानव तस्करी के जाल से बच निकली हैं, लेकिन दिदीबहनों को बचाने के लिए सात दिन तक वहीं रहने का निर्णय लिया है। उन्होंने पुष्पमाया कार्की से कहा, ‘तुम टेंट मत खरीदो, मैं सात दिन बाद जाऊंगी, मेरा टेंट उपयोग कर लेना, छोड़ दूंगी।’ जानकी के अनुसार, उन्हें सुदूरपश्चिम के एक व्यक्ति ने वीरगंज जाकर बुनाई के प्रशिक्षण देने के लिए बुलाया। परिवार से चर्चा करके वे वीरगंज गईं। लेकिन वहां से उन्हें बिहार के एक स्थान पर रातों-रात ले जाया गया। मोबाइल इस्तेमाल करने नहीं दिया गया, बंधक बनाया गया। होस्टल शुल्क के तौर पर 18 हजार रुपए देने को कहा गया। ‘फिर दो लाख रुपए जमा करने को कहा गया। मना करने पर जबरदस्ती करने की कोशिश हुई,’ जानकी ने अपनी त्रासदी सबके सामने बताई।
इस पूर्ण मानव तस्करी के जाल में फँसने के बाद उन्हें मार-पीट और यातना सहनी पड़ी। अंत में उन्होंने ऑटो से कूदकर भागने की कोशिश की। मदद के लिए भारतीय पुलिस की सहायता मांगी। भारतीय पुलिस, रिश्तेदार और कुछ संगठनों की मदद से वे नेपाल लौट पाईं। भारत में जो दृश्य उन्होंने देखा, वह अत्यंत भयानक था, जानकी ने बताया। युवाओं को नौकरी के नाम पर वहां ले जाकर कुटपिट, यातना, किडनी बेचने, बालिकाओं को यौन शोषण और मुंबई की कच्ची बस्तियों में बेचने जैसी घटनाएं हो रही थीं। पहाड़ी सीधी लड़कियां बलात्कार के बाद डर की वजह से बोलने की स्थिति में नहीं रहतीं। मानव तस्करी करने वाले 2065 साल से सक्रिय हैं। खुद बचकर आने के बाद जानकी ने कई पीड़ितों को बचाने का दावा किया। उनके अनुसार, किंग इंडिया संस्था के साथ मिलकर 52 लोगों को बचाया गया था। उन्होंने तत्कालीन गृहमंत्री रमेश लेखक, आईपीजी दीपक थापा, श्रम मंत्री और मानव अधिकार आयोग तक पहुंचकर आवाज़ उठाई, विभिन्न मीडिया को इंटरव्यू दिया, मगर सरकारी संस्थानों से कोई खास कवायद नहीं हुई, उनकी शिकायत है। खुद पीड़ित होने के बावजूद जानकी ने कहा कि अभी भी कई नेपाली लड़कियां भारत में बंधक हैं। सरकार को तत्काल उन्हें बचाने और ठगी करने वाली कंपनियों को बंद करने पर ध्यान देना चाहिए। ‘अगर सरकार कुछ नहीं करेगी तो मैं भारत जाऊंगी और वहां के अधिकारियों से मिलूंगी,’ वे दृढ़ता से कहती हैं, ‘मुझे न्याय नहीं चाहिए, लेकिन दूसरों को बचाना है। कोई इस जाल में न फंसे, इसके लिए दबाव बनाना और दूसरों को चेतावनी देना मेरी मकसद से मैं माइतीघर आई हूं।’ जानकी की कहानी सुनते हुए नज़दीक ही पुष्पमाया कार्की की आंखें भी नम हो गई थीं। वे भी अपनी पीड़ा साझा करना चाहती थीं।
उदयपुर की पुष्पमाया कार्की (28 वर्ष) दिन-रात माइतीघर मण्डला की सड़क पर ही हैं। उनके पास कहीं जाने का ठिकाना नहीं है इसलिए दिन-रात धरना देकर माइतीघर में सोने के लिए मजबूर हैं। मलेशिया में मानव तस्करी का शिकार हुई वे नेपाल लौटने के बाद यहां पुलिस और स्थानीय लोगों से भी अतिरिक्त कष्ट झेल रही हैं। कुछ समय पहले नुवाकोट की प्रतिमा तामांग ने ‘मलेशिया में अच्छी नौकरी और वेतन मिलता है’ कहकर उन्हें फंसाया। परिवार से बात करके वे थाईलैंड होते हुए मलेशिया गई थीं। वहां उन्हें नेपाली होटल में नौकरी दी गई लेकिन वेतन नहीं मिला। ग्राहकों के साथ शारीरिक संबंध बनाने को मजबूर किया गया। ‘दो महीने तक काम किया, पैसे नहीं मिले। ग्राहक खुश नहीं होने की वजह से वेतन काटा गया,’ उन्होंने बताया। विभिन्न होटलों में उन्हें बेचा गया। 2025 दिसंबर 2 की रात होटल मालिक और दो ग्राहकों के द्वारा सामूहिक बलात्कार करने की कोशिश का आरोप है। दिन-रात तक दुरुपयोग झेलने के बाद वे अन्य सहयोग से वापस नेपाल आईं।
लेकिन वापस आने के बाद उनके लिए और भी बड़ी परेशानी शुरू हो गई। तारकेश्वर-10 स्थित केटीएम होमस्टे में वे दैनिक 500 रुपये किराया देकर रह रही थीं। कुछ महीनों बाद जबरदस्ती वहां से निकाल दिया गया। पुलिस की मदद से उनका मोबाइल, सोने की चेन, ब्रेसलेट और डिप्रेशन की दवा भी छीन ली गई। ’15 दिन से मैं डिप्रेशन की दवा नहीं खा पाई,’ पुष्पमाया भावुक होकर कहती हैं। ‘सड़क पर चादर बिछाकर सो रही हूं। पानी टंकी के पास भी रहना पड़ता है। मलेशिया में बलात्कार के मामले और मकान मालिक के उत्पीड़न की शिकायत दी, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। परिवार से भी कोई मदद नहीं है, इसलिए तब तक माइतीघर नहीं छोड़ूंगी जब तक मुझे न्याय नहीं मिलता। चाहे जितना भी दुख हो।’
जब वे अपनी शिकायतें सुना रही थीं, तो दूसरे टेंट के अंदर परिवार सो रहे थे। उनके टेंट के पीछे कई झंडे थे जिन पर विभिन्न मांगें की गई थीं। कोई वाहन दुर्घटना में चालक द्वारा इलाज न कराने के विरोध में धरने पर था। कोई सहकारी ठगी के विरोध में था। कोई फरार अभियुक्त जीबी राई की गिरफ्तारी की मांग कर रहा था। कुछ अस्पताल की लापरवाही के खिलाफ छोटे बच्चे के साथ माइतीघर में रात बिता रहे थे। टेंट के अंदर छोटे बच्चे भी थे। इस प्रकार दिन भर ही नहीं बल्कि रातभर भी धरना देकर माइतीघर लंबे समय से अन्याय के शिकार व्यक्तियों के न्याय की मांग करने का केंद्र बना हुआ है। यह साझा मंच बना है जहां सभी अपनी मांगें रख सकते हैं। माइतीघर का यह स्वाभाविक इतिहास ही ऐतिहासिक माना जाता है।
वि.सं. 2023 की बात है, उस समय प्रदर्शन में आई नेपाली फिल्म ‘माइतीघर’ के निर्माण दल का कार्यालय थापाथली इंजीनियरिंग कैंपस के बिल्कुल सामने एक तीन मंजिला इमारत में था। उस इमारत पर फिल्म के नाम का एक साइनबोर्ड लटका हुआ था। फिल्म के काम खत्म होने के बाद यह बोर्ड हटा दिया गया। लेकिन उस वक्त जनसाधारण उस जगह को ‘माइतीघर’ के नाम से जानने लगे थे। यह नाम बाद में स्थायी रूप से स्थापित हो गया। वि.सं. 2058 में काठमाडौं में हुए 11वें सार्क शिखर सम्मेलन के दौरान शहर को सुंदर बनाने के उद्देश्य से तत्कालीन मेयर केशव स्थापित ने यहां कलात्मक मंडल का निर्माण कराया और इसके बाद इसे ‘माइतीघर मण्डला’ नाम दिया गया। देश के सशस्त्र संघर्ष के समय यहां नागरिक स्तर पर शहीदों कांड की याद में मोमबत्ती जलाने का आयोजन भी हुआ।
यह स्थान नागरिक आंदोलन और राजनीतिक विरोध प्रदर्शन का प्रमुख केंद्र रहा है। देश के मुख्य प्रशासनिक केंद्र सिंहदरबार और सर्वोच्च न्यायालय के नजदीक होने के कारण पीड़ितों की शिकायतें सरकार तक पहुंचाने का प्रमुख माध्यम बना। कभी-कभी इस स्वत:स्फूर्त अधिकार पर राज्य ने नियंत्रण लगाने की कोशिश भी की गई। वि.सं. 2075 बैशाख में सरकार ने ट्रैफिक प्रबंधन और सड़क सफाई के नाम पर माइतीघर में प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। अन्य खुले स्थानों के चयन का प्रस्ताव आया लेकिन इसका व्यापक विरोध हुआ। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को स्वतंत्र प्रदर्शन का स्थान देने का कर्तव्य राज्य का है, इसे डॉ. गोविन्द केसी, डॉ. जीवन क्षेत्री जैसे नागरिक अभियंताओं ने कड़ा विरोध किया। इस प्रकार माइतीघर मण्डला ने सत्ता के अहंकार और आम जनता की पीड़ा दोनों के करीब से देखने का अवसर दिया।
काठमाडौं के खुले मैदान धीरे-धीरे घटते जा रहे हैं, ऐसे में सामाजिक मुद्दों को आवाज़ देने वाला यह ‘पहले से तैयार किया गया’ स्थान बन गया है। आज तक माइतीघर ने अनेक आवाज़ों और हस्तियों को देखा है। शीर्ष नेता पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’, माधवकुमार नेपाल, झलनाथ खनाल समेत कई यहां आए और प्रदर्शन किया। गुठी विधेयक आंदोलन, शिक्षक आंदोलन, मीटर शुल्क पीड़ित आंदोलन, सहकारी ठगी आंदोलन और जेनजी आंदोलन भी यहीं हुए। इस तरह सदन और सरकार जो अनसुनी पीड़ाएं हैं, उन्हें सड़क के माध्यम से पहुंचाने और कमजोरों की गुहार को सत्ता तक ले जाने में माइतीघर मण्डला साक्षी रहा है। आज भी जानकी विष्ट, रमिला कार्की, जमुना खत्री, पुष्पमाया कार्की, कृष्णमाया उप्रेती न्याय की मांग को लेकर दिन-रात जागरूक हैं।
