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‘न्यायाधीशों द्वारा नजीर और कानूनी सिद्धांतों के विपरीत निर्णय के बावजूद अवहेलना नहीं की जा सकती’

समाचार सारांश: सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि न्यायाधीशों द्वारा कानून और नजीर के सिद्धांतों के विपरीत निर्णय लिए जाने पर भी अदालत की अवहेलना में कार्रवाई नहीं की जा सकती। न्यायाधीश शारंगा सुवेदी और मेघराज पोखरेल की खंडपीठ ने उच्च अदालत पाटन के दो न्यायाधीशों के खिलाफ दर्ज अवहेलनापरक याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानूनी त्रुटि की स्थिति में उसके सुधार के लिए पुनर्विचार का प्रावधान है, इसलिए अवहेलनात्मक कार्रवाई उचित नहीं होगी। 11 जेठ, काठमांडू। सर्वोच्च अदालत ने यह व्याख्या दी है कि नजीर और कानून के सिद्धांतों के विपरीत दिये गए निर्णयों के आधार पर किसी न्यायाधीश के खिलाफ अवहेलनापरक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती। उच्च अदालत पाटन के न्यायाधीशों द्वारा विवादास्पद आदेश जारी करने के कारण अवहेलनापरक कार्रवाई के लिए याचिका दायर की गई थी। इसी याचिका पर न्यायाधीश शारंगा सुवेदी एवं मेघराज पोखरेल की पीठ ने कहा है कि अदालत के आदेश या फैसले के खिलाफ कानूनी उपाय उपलब्ध हैं, अतः अवहेलनापरक कार्रवाई उपयुक्त नहीं है।

नेपाल लॉ कैंपस के कानून छात्र विवेक चौधरी ने ट्रैफिक पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए उच्च अदालत पाटन में रिट याचिका दायर की थी। उन्होंने इस मामले में न्यायिक सिद्धांतों और नजीर के उल्लंघन का दावा करते हुए सर्वोच्च अदालत में अवहेलनापरक याचिका प्रस्तुत की। चौधरी ने उच्च अदालत पाटन के न्यायाधीश ऋषिराज भण्डारी और गोपालप्रसाद बास्तोला के खिलाफ अवहेलनापरक कार्रवाई की मांग की थी।

सर्वोच्च अदालत ने नजीर और कानूनी सिद्धांतों का पालन न किए जाने के कारण न्यायाधीशों द्वारा अदालत की अवहेलना के दावे को खारिज कर दिया। चौधरी ने वाहनों के प्रबंधन से संबंधित मामला उठाते हुए उच्च अदालत में रिट याचिका दायर की थी। सवारी तथा यातायात व्यवस्था ऐन, 2049 की धारा 164 (1)(ख) के अंतर्गत निर्धारित ऐसा क्षेत्र जहां वाहन रोकना निषिद्ध है, वहां ट्रैफिक पुलिस द्वारा दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। ट्रैफिक पुलिस द्वारा ऐसे वाहनों पर व्हील लॉक लगाने के कार्य को अवैध बताते हुए चौधरी ने अवैध प्रवृत्तियों को रोकने के लिए याचिका दायर की थी। उच्च अदालत ने नियमों के विपरीत रोके गए वाहनों पर व्हील लॉक लगाने को उचित बताते हुए याचिका खारिज कर दी।

उन्होंने तर्क दिया कि सरकारी अधिकारी कानून के दायरे में रहेंगे, सभी निकायों के कार्य कानूनी होंगे, और कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं जा सकता। इस आधार पर चौधरी ने नजीर उल्लंघन के दावे के साथ न्यायाधीशों के खिलाफ अवहेलनापरक कार्रवाई की मांग की। उन्होंने पांच नजीर प्रस्तुत कर उच्च अदालत के फैसले के खिलाफ न्यायाधीशों के खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता दिखाई।

सर्वोच्च अदालत ने पहले भी अंतर्राष्ट्रीय अभ्यास और न्यायिक मान्यताओं के आधार पर नजीर उल्लंघन को अवहेलनाको आधार नहीं माना है। अपनी संक्षिप्त आदेश में सर्वोच्च ने कहा, ‘न्यायाधीश द्वारा न्यायिक कार्य करते हुए व्याख्या में त्रुटि होने पर भी अवहेलनापरक कार्रवाई नहीं की जा सकती।’ निर्णय में उल्लिखित ब्रिटिश नजीर के मुताबिक, गलत फैसला अवहेलनाकरण कारण नहीं है, और पुनरावेदन ही उपयुक्त उपचार है। अवहेलनापरक कार्रवाई के लिए आदेश या फैसले के सम्बन्ध में स्पष्ट जानकारी और जानबूझकर उल्लंघन होना आवश्यक है।

न्यायाधीश द्वारा फैसले में नजीरों का पालन न करना बदनीयती या जानबूझकर उल्लंघन नहीं माना जाता, और इसे अवहेलनाकरण आधार ठहराया नहीं जा सकता है। विभिन्न परिस्थितियों में नजीर का अर्थ भिन्न होता है, इसीलिए केवल नजीर उल्लंघन के अधार पर अवहेलनाकरण कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। भारत में भी नजीर के गलत प्रयोग को अवहेलनापरक कार्रवाई के बजाय न्यायिक त्रुटि समझा जाता है। न्यायाधीश स्वतंत्र होते हैं, पर वे कानूनी व्याख्या और सिद्धांतों के दायरे में फैसले करते हैं, और सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक स्वतंत्रता को प्राथमिकता देना आवश्यक माना है।

संयुक्त राष्ट्र की घोषणापत्र भी न्यायपालिका की स्वतंत्रता के तहत न्यायाधीशों को फैसला या आदेशों के लिए जवाबदेह नहीं ठहराने की मान्यता देता है। उच्च अदालत पाटन ने गैरकानूनी स्थानों पर रोकिए गए वाहनों पर व्हील लॉक लगाने को वैध माना था। सर्वोच्च ने इसे कानून के उद्देश्य की व्याख्या बताते हुए पुनरावेदन के तहत उच्चतर अदालत में जाने की छूट दी।

‘अदालत की अवहेलनाकरण कार्रवाई का उद्देश्य आदेश या फैसलों के सम्मान और क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना है, कानूनी त्रुटि सुधारना नहीं,’ सर्वोच्च ने कहा, ‘अन्य कानूनी उपचार उपलब्ध होने पर अवहेलनाकरण कार्रवाई उचित नहीं है।’ कानून के सिद्धांतों में किसका चयन होगा, यह न्यायाधीश के विवेक पर निर्भर होता है, इसलिए इस आधार पर अवहेलनाकरण कार्रवाई उचित नहीं होती। संक्षेप में ब्रिटिश नजीर भी यह स्पष्ट करता है कि न्यायाधीश के फैसले के खिलाफ अवहेलनाकरण कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। सर्वोच्च ने 19 चैत, 2082 को दायर दो न्यायाधीशों के खिलाफ अवहेलनाकरण याचिकाओं को प्रक्रिया में न लेने का आदेश दिया था और हाल ही में इसका पूरा फैसला प्रकाशित हुआ है।