
समाचार सारांश
संपादकीय समीक्षा की गई।
- पूर्व राज्य मंत्री बिमला बिक ने बताया कि उन्हें दलित होने के कारण मंत्री और सांसद रहते हुए भी कोठा लेने में कठिनाई हुई।
- काठमांडू में मकान मालिक द्वारा जातीय भेदभाव झेलने वाली दीपा नेपाली का मामला चार वर्षों से सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन है।
- राष्ट्रीय दलित आयोग के अध्यक्ष देवराज विश्वकर्मा ने कहा कि कानूनी जटिलताओं और अविश्वास के कारण दलित समुदाय में थर संशोधन की प्रवृत्ति बढ़ी है।
साल २०७४ के चुनाव के बाद बर्दिया से समानुपातिक सांसद चुनी गईं बिमला बिक काठमांडू आईं। अब उन्हें रहने के लिए कोठा चाहिए था। संसद में बोलने का मौका मिला था, लेकिन राजधानी में सिर छिपाने के लिए कोई ठिकाना नहीं था। कई घरों में कोठा खोजने गईं, लेकिन शहर जितना बड़ा था, उतनी ही सोच संकीर्ण थी।
मकान मालिक जैसे ही दरवाज़ा खोलते, सवाल करते – “कौन हो? कहां से हो? जात क्या है?”
जात पता चलने पर अधिकांश मकान मालिकों का चेहरा बदल जाता था। सीधे कोठा नहीं देते और ‘सलाह करके बताएँगे’ कहकर टालते थे। सलाह के बाद भी कोई जवाब नहीं मिलता था। कई कोशिशों के बाद एक करीबी मित्र की मदद से अनामनगर में कोठा मिला।
कोठा मिलने के बाद कुछ समय वहीं रहीं। साल २०७७ में वे राज्य मंत्री बनीं। पद और जिम्मेदारी बढ़ने के बावजूद सामाजिक भेदभाव से मुक्त नहीं हो सकीं।
मंत्री बनने पर सरकारी नियम अनुसार पुलिस और सैनिक सुरक्षा के साथ रहने का इंतजाम होता है। लेकिन मकान मालिक ने सुरक्षाकर्मी लाने नहीं दिया। सरकार के पास भी राज्य मंत्री को आवास उपलब्ध कराने की व्यवस्था नहीं थी। सांसद रहते और मंत्री बनते भी बासस्थान खोजने में कठिनाई फिर से आई।
फ्लैट खोजते समय दलित होने की जानकारी मिलने पर मकान मालिक नाक सिकोड़ते और सीधे ‘नहीं देंगे’ कह देते।
लेकिन मकान मालिकों की शुरुआत की बातें और जाति जानने के बाद किए गए व्यवहार से बिमला ने आसानी से समझ लिया कि जाति के कारण कोठा देने से रोक रहे हैं।
‘शुरुआत में कोठा/फ्लैट है कहते, लेकिन थर पूछने पर ‘सलाह कर लेंगे’ कहकर टालते थे। व्यवहार ने ये सारी बातें स्पष्ट कर दीं,’ एमाले केन्द्रीय सदस्य बिमला ने अनुभव साझा किया।
मंत्री होते हुए भी जातीय भेदभाव झेलने के बाद वे मजबूरन पुल्चोक के मंत्री क्वार्टर में जबरदस्ती रहने को मजबूर हुईं। वहाँ एक अन्य व्यक्ति के नाम पर कोठा था, जो उस समय छुट्टी पर थे। बिमला को उस कोठे में ज़बरदस्ती रहना पड़ा।
इस तरह राजधानी काठमांडू में कोठा पाने की जंग लड़ती रह रहीं वे अब देश के तीसरे बड़े दल की केन्द्रीय सदस्य होते हुए भी भेदभाव से मुक्त नहीं हुईं।
कुछ हफ्ते पहले की ऐसी ही घटना उनका अनुभव है। घट्टेकुलो क्षेत्र में एक फ्लैट देखकर पसंद किया लेकिन किराया तय करते मकान मालिक ने फोन कर कह दिया – ‘किसी और ने पहले ही ले लिया, फ्लैट उपलब्ध नहीं है।’
भेदभाव के कारण कोठा न देने के फैसले को बिमला समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई।
बिमला के अनुसार ऐसी कई घटनाएं हैं।
साल २०७४ से संसद सदस्य रही आशा विक ने भी कोठा खोजते समय ऐसा अनुभव किया। पूर्व सांसद कल्लुदेवी विश्वकर्मा का भी अनुभव वैसा ही है, जिन्होंने कई बार अपना विश्वकर्मा थर होने से मकान मालिकों द्वारा टाले जाने की बात बताई।
‘सांसद और मंत्री होते हुए भी ऐसा सामना करना पड़ता है तो सामान्य दलितों का क्या होगा? जिनका नाम नहीं जाना जाता, पद नहीं होता और शिकायत सुनने वाला कोई नहीं होता – उनकी कहानियां कब सार्वजनिक होंगी?’ पूर्व सांसद बिमला बिक ने पूछा।
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कैलाली की दीपा नेपाली उच्च शिक्षा के लिए काठमांडू आईं। त्रिभुवन विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर करते हुए उनका सपना था – अच्छी पढ़ाई करके अधिकृत या वकील बनना और परिवार में खुशहाली लाना। शहर आने के बाद परिस्थितियाँ सहज नहीं रहीं। पहली चुनौती थी आवास खोजना। भेदभाव के कारण कोठा न मिलने से वे निराश हो गईं।
२०७६ मंसिर में तार्केश्वर नगरपालिकावडा नं. १० नेपालटार के हिल टोला में शोध अधिकृत श्रीकृष्ण बिडारी के घर दो कोठे किराए पर लिए। मंसिर १० को श्रीमती राधिकाने 500 रुपए अग्रिम शुल्क पर बुकिंग भी कराई। रंगाई में दो दिन लगे।
‘सुदूर पश्चिम के लोग सीधे होते हैं, आपको जैसी लगे वैसे कोठा दूंगी, 4-5 साल रहने वाला चाहिए,’ राधिकाने दीपा से कहा। रंगाई के बाद सामान रखने गए तभी मकान मालिक की बेटी शर्मिला ने अपना परिचय दिया। दीपा ने अपना नाम, थर और अन्य विवरण बताए।
परिचय खुलने के बाद घर का माहौल अचानक बदल गया। अगली सुबह मकान मालिक आई और दरवाज़ा खटखटाते हुए कहा, ‘तुम लोग तो तल्लो जात के हो। थर अनजान होने के कारण कोठा नहीं दे सकते। घर में पिता का निधन हुआ है, इसलिए घर साफ करना है। समाज पर भी असर पड़ता है। तुरंत कोठा छोड़ दो।’
दीपा का जीवन इसके बाद कठिन हो गया। मकान मालिक और नीचे रहने वालों ने पानी कटौती की, बिजली बिल बढ़ाया, धमकी दी और मारपीट की कोशिश की। अंत में जबरदस्ती कोठा खाली कराया गया।
इसके बाद भी आवास के लिए भारी संघर्ष करना पड़ा। कई दलित साथियों ने थर बदलकर रहने की सलाह दी। दीपा कहती हैं काठमांडू में स्थायी होने के लिए थर बदलने वाले बहुत हैं। लेकिन वे अपनी पहचान छिपाकर रहना नहीं चाहतीं।
पहली बार जब कोठे से निकाला गया तो दीपा चुप नहीं रहीं। बालाजु पुलिस थाने में भी आवेदन दिया लेकिन सुनवाई नहीं हुई। फिर प्रेस कांफ्रेंस कर जातीय भेदभाव सार्वजनिक किया, कुछ मीडिया ने खबर बनाई। गृह मंत्रालय और महान्यायालय के कार्यालय में जाकर ऑडियो सबूत भी प्रस्तुत किए।
आखिरकार २०७६ फाल्गुन २२ को श्रीकृष्ण बिडारी, राधिका बिडारी, जनकराज ढुंगाना और संतोष ढुंगाना के खिलाफ जातीय भेदभाव का मामला दर्ज हुआ। मामला लड़ने में दीपा की पढ़ाई बिगड़ी, किताब लेकर न्यायिक निकायों में दौड़ती रहीं। यह मामला अब तक सर्वोच्च में विचाराधीन है।

न्याय के द्वार पर दस्तक देते हुए उन्हे बार-बार आठ बार कोठा बदलना पड़ा। हर नए मकान मालिक को पुराने मामले का पता चलने पर कोठा छोड़ने का दबाव बढ़ता गया।
दीपा कैलाली से काठमांडू पढ़ने आईं और बार-बार सामान लेकर बसाई सरीलाई। पढ़ाई और माहौल दोनों बिगड़े, मास्टर की पढ़ाई और लोकसेवा की तैयारी पूरी नहीं हो सकी। उनके भाई-बहन भी मानसिक तनाव में आकर दो साल पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हुए।
‘सबको दलित जानने के बाद कोठा नहीं देते। अब भी भेदभाव वैसा ही है,’ लंबी सांकेतिक धरना देते हुए दीपा ने कहा, ‘आंदोलन में आने से भी कई डरते हैं क्योंकि मकान मालिक उनके फोटो और वीडियो देखकर पहचान सकते हैं। थर बदलकर रहने वाले साथी मैं जानती हूँ।’
सड़क प्रदर्शन में भी कुछ लोग ‘रुपा सुनार का नाम लेकर’ दलितों को चिह्नित करते हैं। रुपा सुनार भी कोठा न मिलने के कारण पीड़ित हैं और न्यायिक मामला लड़ चुकी हैं।
अपने खिलाफ हुई अपमान और अन्याय के विरोध में लड़ते हुए उन्हें ‘डलरे टॅग’ लगाई जाती है, इस समाज पर दीपा बेहद नाराज हैं।
काठमांडू में कोठा खोज रहे कई दलित साथियों के नाम ‘किरण बिक, निर्जन बिक, बिमला बिक, जौमती नेपाली, लक्ष्मी सेन्चुरी, कैलाश बिक, प्रकाश खाती’ हैं। वे कहती हैं, ‘हम अधिकांश दलित अभी भी इस शहर में भेदभाव झेल रहे हैं। गांवों में क्या हाल होगा?’
थर संशोधन की बढ़ती प्रवृत्ति

दलित होकर कितनी पीड़ा झेल रहे हैं और कितनी शिकायतें हैं, इस पर राष्ट्रीय दलित आयोग के पास ठोस आंकड़े नहीं हैं, ऐसा अध्यक्ष देवराज विश्वकर्मा ने बताया।
उनके अनुसार हाल के दिनों में शिकायत करने की बजाय थर ही बदलने की प्रवृत्ति बढ़ी है। कई लोग कानूनी झंझट से बचने के लिए नागरिकता में थर परिवर्तन की प्रक्रिया अपनाते हैं।
इसके पीछे कारण है कि कानूनी प्रक्रिया में साक्ष्य जुटाना जटिल है, पुलिस और न्यायालय पर अविश्वास बढ़ा है। इसलिए थर बदलकर आसान रास्ता खोजने वाले अधिक दिखाई देते हैं।
‘पुलिस और न्यायालय से दलितों को मदद मिलने का विश्वास ना होने के कारण दूसरा रास्ता अपनाया गया है। थर संशोधित करने वाले बढ़े हैं,’ अध्यक्ष विश्वकर्मा ने कहा, ‘आयोग के पास थर संशोधन संबंधी यकिन आंकड़े अभी नहीं हैं।’

थर संशोधन की बढ़ती प्रवृत्ति होने के बावजूद गृह मंत्रालय के पास इस पर कोई ठोस आंकड़ा नहीं है, ऐसा गृह मंत्रालय की सूचना अधिकारी रमा आचार्य ने बताया। जिलों के अपने हिसाब से आंकड़े रखने के बावजूद राजधानी में कोई समेकित आंकड़ा नहीं है।
‘जिले अपनी व्यवस्था से आंकड़े रखते हैं, लेकिन हमने सभी का संकलन नहीं किया है,’ उन्होंने कहा, ‘हाल ही में थर संशोधन की सुविधा मिलने के बाद संख्या बढ़ सकती है।’
‘रूम फाइंडर्स’ ने भेदभाव को और छिपाया
भक्तपुर स्थित एक ‘रूम फाइंडर्स’ अर्थात कोठा खोजने वाला मध्यस्थ ने बताया कि कोठा देने में जातीय भेदभाव अब भी बना हुआ है।
नाम न बताने की शर्त पर उन्होंने कहा कि मकान मालिकों को जातीय विषय में पहले से सूचित कर दिया जाता है और उसी अनुसार व्यक्ति को कोठा देने का निर्देश मिलता है।
‘आज सुबह एक व्यक्ति कोठा लेने आए, पर वे बोले दलित और महिला नहीं चाहिए,’ उन्होंने कहा, ‘ऐसी घटनाएं बहुत होती हैं, हमें भी पीड़ा होती है पर व्यवसाय की वजह से ऐसा करना पड़ता है।’
कुछ लोग अपना वास्तविक नाम न बताकर सुरलिपि देते हैं। नाम से कैसे पहचान करेंगे, इस पर उन्होंने कहा कि ‘क्यूआर कोड’ से वास्तविक नाम पता लग जाता है।
नागरिकता की फोटोकॉपी मांगते हैं इसलिए ग्राहक की शिकायत होती है कि फर्जी दस्तावेज हो सकते हैं। इसीलिए बहुत कुछ समझने की कोशिश करते हैं, नहीं तो खुद जाकर मिलना पड़ता है, उन्होंने बताया।
इस प्रकार मध्यस्थकार भेदभाव को छिपाकर कोठा देने की प्रक्रिया अपनाते हैं जो पहले से भी अधिक खतरनाक है, ऐसा पूर्व सांसद बिमला बिक ने बताया।
‘मध्यस्थ सीधे कह देते थे, “आप तो सब ठीक हो, लेकिन दलित हैं इसलिए मकान मालिक नहीं मानते।” अगर ये न बोलते तो हमें पता नहीं चलता। अब भेदभाव मध्यस्थकारों में छिप गया है, जो और भी खतरनाक है,’ पूर्व सांसद ने कहा।
दीपा नेपाली का अनुभव भी यही है। पहले मकान मालिकों की नियत पता चल जाती थी और लड़ना आसान होता था, अब मध्यस्थ छिपाते हैं। ‘काठमांडू में दलितों को कोठा मिलना अब भी कठिन है। रूम फाइंडर कहते हैं ‘तल्लो जात न लाओ’ और वे बिना बताए कोठा दिखाते हैं। इससे भेदभाव और बढ़ने का डर है,’ उन्होंने कहा।
इसलिए अब हर घर पर ‘विभेदरहित घर’ का स्टिकर लगाना आवश्यक है। घर के बाहर ‘कुत्ते से सावधान’ लिखा होता है, ऐसे ही ‘विभेदरहित घर’ लिखा होना चाहिए ताकि सभी की नियत साफ दिखाई दे, ऐसा दीपा मांगती हैं।
‘अन्य को कुत्ता काटेगा डर होता है, हमें डर रहता है कि मकान मालिक जात पूछेंगे। इसलिए हर घर के बाहर स्टिकर लगाना चाहिए, इससे पता चलेगा कौन कैसा है,’ उन्होंने जोड़ा।
