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मानवाधिकार आयोग ने जेनजी आंदोलन से जुड़े रिपोर्ट में उल्लेखित पश्चदर्शी कानून कब बनाया जा सकता है?

मंत्रिपरिषद

तस्वीर स्रोत, RSS

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पिछले भाद्र माह के ‘जेनजी आंदोलन’ से जुड़े रिपोर्ट में तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और मंत्रियों रमेश लेखक व पृथ्वी सुब्बा गुरुङ सहित पर “मानवाधिकार उल्लंघन की पुष्टि हुई” बताया है और उन्हें नए “पश्चदर्शी” कानून बनाकर दंडित करने के लिए सरकार को सिफारिश की है।

लेकिन आयोग द्वारा सुझाए अनुसार पुराने मामलों में कार्रवाई के लिए पश्चदर्शी कानून बनाने का संविधान में प्रावधान नहीं है तथा मानवाधिकार उल्लंघन संबंधी अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर भी इसे पर्याप्त आधार नहीं माना जाता है, विशेषज्ञों ने बताया है।

अपवाद के रूप में बनाए जाने वाले कानून के लिए आयोग ने ठोस आधार प्रस्तुत नहीं कर पाया है, इस वजह से एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने आयोग के सुझाव को ‘अधूरा अध्ययन’ बताया है।

आयोग ने पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली व तत्कालीन मंत्री रमेश लेखक व पृथ्वी सुब्बा गुरुङ द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन करने की पुष्टि होने पर कहा कि वर्तमान कानून में ऐसे उल्लंघनों के लिए दंड व्यवस्था स्पष्ट नहीं है, इसलिए दंड के लिए “पश्चदर्शी” कानून आवश्यक है।

लेकिन विशेषज्ञों ने कहा है कि पुराने मामलों में नए कानून बनाकर न्यायिक कार्यवाही नहीं हो सकती और ऐसे मुकदमों को संवैधानिक मान्यता नहीं मिलती।