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ठमेल में गूंजा गन्धर्व बाबा और उनकी पुत्री का संगीत

समाचार सारांश

संपादकीय समीक्षा की गई।

  • गोरखा के अमृत गान्धारी अपनी पुत्रियों के साथ मिलकर पारिवारिक बैंड के माध्यम से ठमेल में पारंपरिक गन्धर्व संगीत और सारंगी का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।
  • गान्धारी क्लिनिकल म्यूजिक थेरेपी द्वारा विकलांग बच्चों का उपचार करने के साथ-साथ अर्जित धन से गरीब बच्चों को शैक्षिक सहायता भी प्रदान करते हैं।
  • वे ठमेल में ‘अविरा म्यूजिक शॉप’ चलाते हैं जहां स्थानीय और विदेशी लोगों को सारंगी बजाना सिखाने के साथ-साथ इसकी बिक्री- वितरण भी करते हैं।

१६ जेठ, काठमांडू। काठमांडू गेस्ट हाउस के बगीचे में शाम की ठंडी हवा बह रही थी। हल्की बारिश ने गर्मी के मौसम में ठंडक घोल दी थी। पर्यटक गेस्ट हाउस के अंदर और आसपास अपने-अपने स्थानों पर घूमते नजर आ रहे थे। कोई चाय पी रहा था तो कोई कॉफी के कप के साथ आसमान की ओर देख रहा था। मौसम का अनुमान लगाया जा रहा था।

उसी पल अचानक मधुर और मनमोहक स्वर और सुरों से संगीत की गुंजन शुरू हुई—

‘क्या मैं नेपाली नहीं हूँ

क्या मुझमें प्यार नहीं है…

संगीतकार ने खामोशी थामे हुए

झोली खाली नहीं है…’

सारंगी, मादल, बांसुरी जैसे संगीत वाद्ययंत्रों से निकली यह मार्मिक धुन सभी का ध्यान खींचने लगी। मादल की ताल ने सारंगी को और भी मधुर बना दिया। गीत के हर शब्द में पुरानी पीढ़ी के संघर्ष, पहचान और अपने मिट्टी से जुड़ाव की झलक थी।

कुछ ही क्षणों में कुछ पर्यटक फ़ोन और कैमरे लेकर आगे आ गए और देखा कि यह प्रस्तुति बाबा अमृत गान्धारी और उनकी पुत्रियाँ अनु गान्धारी तथा दृष्टि गान्धारी की थी।

गायक और वादकों के चेहरे पर थकान के कोई संकेत नहीं थे। संगीत के प्रति उनकी गहरी समर्पण स्पष्ट दिखाई दे रही थी।

ये कलाकार गन्धर्व समुदाय से हैं। वे नेपाल आए पर्यटकों को मनोरंजन देने और अपनी पारंपरिक वाद्यों को विश्वभर में पहचान दिलाने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं। बाबा अमृत की दिनचर्या इसी से जुड़ी हुई है। बड़ी बेटी अनु सारंगी और स्वर में, जबकि छोटी बेटी दृष्टि मादल बजाकर अमृत का हमेशा साथ देती आई हैं।

अनु वर्तमान में स्नातक की चौथी वर्ष की छात्रा हैं जबकि दृष्टि ने हाल ही में माध्यमिक शिक्षा परीक्षा (एसईई) दी है। ये बाबा-पुत्री पारिवारिक बैंड चला रहे हैं। विशेष रूप से अनु और दृष्टि के हाथों में सारंगी और मादल देखकर कहा जा सकता है कि पिताजी की परंपरा अब बेटियों के कोमल हाथों में स्थानांतरित हो गई है।

‘हमने २०१२ में अपना बैंड बनाया था और तभी से ऐसे स्थानों पर प्रदर्शन करना शुरू किया है,’ अमृत कहते हैं, ‘पहले ठमेल के साथियों के साथ पांच-छह लोग थे। लॉकडाउन के बाद दोस्त पढ़ाई, काम और विदेश चले गए, इसलिए मैंने अपनी बेटियों को यह सीखाना शुरू किया।’

उसके बाद अनु ने सारंगी सीखी और दृष्टि ने मादल बजाने की कोशिश की। बेटियाँ भी उत्साह से सीख रही थीं।

‘अब हमारा परिवार यह परंपरा संभाले हुए है,’ अमृत ने बताया।

अमृत के अनुसार वे गोरखा जिले के एक छोटे गन्धर्व बस्ती में पले-बढ़े हैं। उस गांव में मात्र १०-१२ घर हैं। सदियों से गन्धर्व सारंगी लेकर गांव-गांव घूमते थे। किसी घटना पर गीत बनाकर दूसरे गांव में सुनाते थे। रेडियो और टेलीविजन न होने के कारण गन्धर्व ही खबर पहुचाने का माध्यम थे। उस गीत से कमाई कर वे परिवार चलाते थे।

‘मेरे पिता और दादा भी सारंगी बजाकर जीवन यापन करते थे,’ अमृत कहते हैं, ‘बचपन में मैंने अपने पिता को गांव-गांव सारंगी बजाते देखा। वे घर में कम ही रहते थे। यही देखकर मैं इस कला में रम गया। हमारे रगों में सारंगी की धड़कन है।’

समय के साथ वे बस गांव में नहीं, बल्कि पर्यटक क्षेत्रों में भी अपनी कला दिखाने लगे। इस तरह काठमांडू के ठमेल स्थित काठमांडू गेस्ट हाउस के लिए नई पीढ़ी को वहां लाया गया। अब वे हर शाम ६ से ८ बजे तक नियमित संगीत कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं, जो रेस्टोरेंट, होटल और विभिन्न आयोजनों तक पहुंचते हैं।

जब पर्यटक बड़े समूह में नेपाली संस्कृति और संगीत की तलाश करते हैं, तो इन्हें बुलाया जाता है। विदेशी पर्यटक गिटार, ड्रम और अपने देश के वाद्ययंत्र सुनकर आते हैं, लेकिन सारंगी और गन्धर्व गीत सुनकर वे मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। कई लोग अमृत, अनु और दृष्टि को कहते हैं — आपका संगीत बहुत अच्छा है, हम यही खोज रहे थे।

अपनी संस्कृति और परंपरा को संरक्षित रखने के लिए पर्यटक भी प्रसन्न दिखाई देते हैं। कुछ तो खोजतलाश के बाद प्रस्तुति स्थल तक आ जाते हैं। विदेशी पर्यटकों की लोकप्रियता और सम्मान से उन्हें और ऊर्जा मिलती है। पर्यटक खुशी मनाकर टिप्स भी देते हैं।

परंतु उनके लिए संगीत और समर्पण टिप्स कमाने का साधन मात्र नहीं है। उद्देश्य सिर्फ पैसे कमाना भी नहीं है। ‘जीवन में आमदनी जरूरी है, लेकिन सब कुछ नहीं,’ अमृत कहते हैं। पर्यटकों द्वारा दिया गया टिप्स दो हिस्सों में बंटता है — परिवार के खर्च के लिए और गरीब तथा असहाय बच्चों की सहायता के लिए।

वे साल में ६ महीने तक टिप्स जमा करते हैं और ८ से १० बच्चों को किताब, कॉपी, पेन, बैग और नकद मदद देते हैं। ‘जिनके परिवार बुनियादी सामग्री खरीदने में असमर्थ हैं, उन्हें प्राथमिकता दी जाती है,’ अमृत बताते हैं। ‘हमें जो मिलता है, हम दूसरों के साथ बाटते हैं तो मन को शांति मिलती है। यह कोई बड़ा काम नहीं, एक सामान्य मानवीय धर्म है।’

भारत से क्लिनिकल म्यूजिक थेरेपी में पोस्टग्रेजुएट डिप्लोमा करने के बाद अमृत ने व्यवस्थित तरीके से काम शुरू किया। इमाडोल स्थित कृपा काउंसलिंग एंड थेरेपी सेंटर के माध्यम से वे ऑटिज्म, डाउन सिंड्रोम और लर्निंग डिसएबिलिटी वाले बच्चों के साथ काम कर रहे हैं।

‘संगीत ने बोल न पाने वाले बच्चों को बोलना सिखाया, अकेले बच्चे को साथी बनाया, हाथ-पैर की चाल सुधारी,’ अमृत दावा करते हैं, ‘यह कोई मिथक या जादू नहीं, वर्षों की वैज्ञानिक शोध से प्रमाणित है। हमने इसे प्रत्यक्ष देखा है।’

अमृत ने अपने समुदाय के गौरवशाली इतिहास के बारे में भी बताया। गन्धर्व समुदाय का इतिहास बहुत पुराना है, जहां अप्सराएँ नृत्य करती थीं और गन्धर्व सारंगी बजाते थे। पृथ्वीनारायण शाह के नेपाल एकीकरण के दौरान मणिराम गायर सारंगी बजाकर बहादुर सेन को प्रोत्साहित करते थे। जनआंदोलन में रुबिन गन्धर्व ने गीतों के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विशेष आंदोलन में गीत परिवर्तन लाने का माध्यम बने।

घटनाओं और कथाओं को गीत में उकेर कर जनता तक पहुंचाने की परंपरा थी। आज भी यह परिवार इस उत्तरदायित्व को लेकर सक्रिय है। वे गोरखा के अपने गांव में बच्चों और महिलाओं को सारंगी और मादल सिखाने का कार्य नियमित रूप से कर रहे हैं। ठमेल में ‘अविरा म्यूजिक शॉप’ खोलकर सारंगी की बिक्री और प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। यूट्यूब चैनल पर बेसिक से एडवांस ट्यूटोरियल अपलोड किए हैं।

विदेशी पर्यटक भी इसे ‘नेपाल की पहचान’ मानकर खरीदते हैं। कुछ सीखकर भी अपने साथ ले जाते हैं। कई पर्यटक जिन्हें कौशल नहीं आता, वे घर पर सजाने के लिए इन सारंगियों को रखते हैं।

‘हम पूरी कोशिश कर रहे हैं,’ अमृत कहते हैं, ‘अन्य समुदायों को भी अपनी पारंपरिक वाद्यों को बचाना चाहिए। मिलकर ही हमारी सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रह सकती है।’

वे बातें करते हुए अपना पारिवारिक बैंड लगातार प्रस्तुति देते रहे। अमृत, अनु और दृष्टि बाजा बजाते हुए गा रहे थे—

‘सीता रानी वन में

आज मन में लहर आई है…।’