अस्पताल में भीड़ के कारण मरीजों को हो रही परेशानी, टिकट कटाने की लाइन में थकावट

समाचार सारांश
- चार दिनों की सार्वजनिक छुट्टियों के बाद महाराजगंज स्थित त्रिभुवन विश्वविद्यालय शिक्षण अस्पताल में सोमवार को ओपीडी सेवा लेने आए मरीजों को घंटों तक परेशान होना पड़ा।
- अस्पताल में कोटा प्रणाली और टिकट काउंटर की सुस्ती के कारण मरीजों को पीने का पानी और बैठने की जगह नहीं मिल पाई, जिससे वे टन्टलापुर की गर्मी में घंटों लाइन में खड़े रहने को मजबूर हुए।
- अस्पताल के प्रवक्ता डॉ. गोपाल सेढ़ाई ने मरीजों की संख्या में वृद्धि को गुणवत्तापूर्ण सेवा पर विश्वास का संकेत बताते हुए ऑनलाइन टिकट प्रणाली को सरल बनाने का काम जारी होने की जानकारी दी।
१८ जेठ, काठमांडू। 29 वर्षीय छोटू मोहम्मद अपनी पत्नी की गोद में सिर रखकर अस्पताल की बेंच पर सुस्ताए हुए हैं। उनका शरीर असामान्य रूप से सुन्न है। पेट सूजा हुआ है। आँखें पीली हो चुकी हैं। बोलने की कोशिश पर आवाज़ या तो नहीं निकलती या निकलते समय कांपती है।
सोमवार दोपहर 12 बजे महाराजगंज स्थित त्रिभुवन विश्वविद्यालय शिक्षण अस्पताल (टीचिंग) पहुंचे तो ओपीडी टिकट काउंटर के आसपास भारी भीड़ देखी गई। छोटू के चेहरे पर न केवल बीमारी का दर्द बल्कि उपचार न मिलने की असहायता भी स्पष्ट थी।
आँखों में आँसू भरकर उन्होंने कहा, ‘मैं खड़ा नहीं हो पा रहा हूँ। इतनी गंभीर हालत में भी अब तक डॉक्टर को नहीं दिखा पाया।’
सरलाही से उपचार की आशा लेकर काठमांडू आए छोटू और उनकी पत्नी नहिमा खातून के लिए राजधानी का बड़ा अस्पताल भरोसे का केंद्र होना था, लेकिन उनका पहला अनुभव सिर्फ उलझन और निराशा ही रहा।
रविवार की शाम वे टीचिंग गए थे। उनकी शारीरिक स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही थी। किसी ने आकस्मिक कक्ष जाने का सुझाव दिया, जहाँ वे पहुंचे।
लेकिन वहाँ से कोई अपेक्षित उपचार नहीं मिला।

छोटू के अनुसार, चिकित्सकों ने उन्हें अगले दिन ओपीडी में दिखाने के लिए कहा और वापस भेज दिया। अपरिचित शहर में कहाँ जाएँ, क्या करें उन्हें पता नहीं था।
‘पूरा शरीर दर्द में है। यूरिन भी पीला आता है। लगता है मौत आने वाली है,’ उन्होंने दर्द बयान किया। ‘आकस्मिक में भर्ती होने के लिए एम्बुलेंस जरूरी थी, हम पैदल आए थे इसलिए वह भी नहीं हो पाया।’
फिर उन्होंने अस्पताल के पास एक होटल में रात बिताई।
सुबह लगभग 7 बजे वे फिर अस्पताल पहुंचे और ओपीडी की कतार में खड़े हुए। छोटू कमजोर थे और लंबे समय तक खड़े नहीं रह पाए। उनकी पत्नी नहिमा अच्छी तरह नेपाली भाषा नहीं समझती थीं। काफी पूछताछ और खोजबीन के बाद सुबह 9 बजे टिकट कटाई, लेकिन इसके बाद लंबा इंतजार शुरू हुआ।
समय बीतता गया पर छोटू की बारी नहीं आई। 11 बजे ओपीडी सेवा बंद हो गई।
दोपहर 12 बजे तक उन्होंने खाना भी नहीं खाया था।
पत्नी की गोद में सिर रखकर सोते हुए छोटू बार-बार यही कहते रहे – काश पहले उन्हें डॉक्टर दिखाने का मौका मिल जाता।

वे अस्पताल में भीड़ की ओर देखते और फिर आंखें बंद कर लेते। उनके लिए बीमारी से बढ़कर इंतजार ही काफी दुखद था।
कुछ महीनों पहले तक छोटू का जीवन सामान्य था। वे भारत में कपड़ा सिलाई का काम करते थे और परिवार चलाते थे।
लेकिन दो महीने पहले अचानक स्वास्थ्य खराब हो गया। शरीर कमजोर होने लगा और आंखें पीली पड़ गईं। वे काम करने लायक भी नहीं रहे।
गांव लौटकर वीरगंज के अस्पताल में कुछ समय उपचार कराया पर कोई सुधार नहीं हुआ।
पड़ोसियों ने अंतिम आशा के तौर पर काठमांडू जाने की सलाह दी।
उसी उम्मीद के साथ छोटू रविवार सुबह अपने घर से काठमांडू चल पड़े, पर राजधानी पहुंचकर सहज उपचार प्रक्रिया नहीं मिली।
‘अच्छा उपचार होगा, यह सोचकर आए थे,’ वे भावुक होकर बोले, ‘लेकिन हमारे जैसे गरीबों की पीड़ा किसी को सुननी नहीं।’
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सोमवार सुबह लगभग 11 बजे अस्पताल पहुंचे तो ओपीडी टिकट काउंटर के आसपास लंबी लाइन लगी थी। अस्पताल के मुख्य भवन के बाहर तक लाइन फैली हुई थी। कई लोग पुराने रिपोर्ट्स लेकर खड़े थे।
घंटो लाइन में खड़े रहने से कई लोग थक कर ठंडे फर्श पर बैठ गए थे। कुछ दीवार से टिका कर बैठे थे।
उपचार लेने आए मरीजों के लिए टिकट लेना एक परीक्षा जैसा हो गया। अत्यधिक गर्मी से कष्ट और बढ़ गया।
लाइन में लगे अधिकांश मरीजों और परिजनों की शिकायत थी कि टोकन प्रणाली न होने के कारण लंबी लाइन में खड़े होना पड़ता है।
ओपीडी सेवा लेने आए मरीज टिकट काउंटर की सुस्ती, भीड़भाड़, बैठने की जगह न होने और सफाई की कमी के कारण गहरी परेशानी झेल रहे हैं।
अस्पताल में मरीजों की संख्या बढ़ने के साथ सेवा प्रबंध और अधिक अस्त-व्यस्त हो गया है।

‘मरीज बनकर अस्पताल आया, इलाज से पहले लाइन ने ही थका दिया,’ मरीज राधिका ढकाल ने गुस्सा जताया। ‘चार दिन अस्पताल बंद था। सुबह से लाइन में खड़े हैं, अभी तक इलाज नहीं मिला।’
14 से 17 जेठ तक सार्वजनिक छुट्टियों के कारण अस्पताल की ओपीडी सेवा बंद थी, जिसका बोझ सोमवार को एक साथ पड़ा।
नुवाकोट की ढकाल सुबह 9 बजे से लाइन में थीं लेकिन दोपहर 1 बजे तक इलाज प्रक्रिया न बढ़ पाने से वे कुपित थीं। उन्हें शरीर में दर्द की समस्या थी।
‘काउंटर खुलते ही हड्डी-जोड़े विभाग का कोटा खत्म हो गया कहा गया,’ उन्होंने कहा, ‘मरीज डॉक्टर को दिखाने आते हैं इसलिए उम्मीद रहती है, लेकिन टिकट न मिलने की बात सुनाई गई।’
सुबह के सत्र में डॉक्टर को नहीं दिखा पाने पर दोपहर की शिफ्ट में इलाज करने की कोशिश की। लेकिन बैठने की जगह न होने के कारण लाइन छोड़ने का डर था।

‘दो घंटे से ज्यादा लाइन में खड़ी रही। इलाज के लिए आई इंसान को पैर के रोग के साथ वापस जाना पड़ा,’ ढकाल ने शिकायत की।
चिकित्सा संवेदनशील विषय होने के नाते उन्होंने मांग की कि सरकार कर्मचारियों की संख्या बढ़ाए या सेवा खुली रखने के लिए प्रोत्साहन भत्ता दे।
‘चार दिन बंद रहने के कारण अधिक काउंटर खोलना चाहिए था, कर्मचारियों की संख्या बढ़ानी चाहिए थी। मरीजों का दबाव अनुमानित था, लेकिन तैयारी नहीं थी, चारों तरफ अव्यवस्था है,’ वे कहती हैं।
तभी गर्मी और भीड़ ने एक मरीज को थका दिया। पसीना बहते देखकर किसी ने पानी दिया और सिर के ऊपर से शरीर पर पानी छिड़का।
भीड़ और गर्मी के कारण वह मरीज बेहोश सा हो गया और बाहर निकल गया। ‘ऐसी भीड़ और गर्मी में बेहोश सा हो गया हूँ। सरकारी अस्पताल की स्वास्थ्य सेवा कब सुधरेगी?’ मरीज ने कहा।
उसी भीड़ में उदयपुर से इलाज के लिए आईं गंगामाया राई मिलीं, जिन्होंने अस्पताल की अव्यवस्था पर शिकायत की। उन्होंने कहा, ‘सुबह बिना खाना खाए जांच कराने आई, साढ़े 11 बजे तक लाइन में हूँ, लेकिन काउंटर नहीं खुला।’

टिकट लेने के लिए सेवाग्राही घंटों इंतजार करते हैं, फिर डॉक्टर से मिलने, एक्स-रे, रक्त परीक्षण आदि के लिए अलग लाइन में खड़े रहना पड़ता है।
‘सिर्फ लाइन ही हर जगह है। डॉक्टर को दिखाने में रात हो सकती है। रिपोर्ट कब आएगी?’ राई ने शिकायत की, ‘नई सरकार से स्वास्थ्य सेवा सुधार की उम्मीद थी, लेकिन परेशानी बढ़ गई।’
राई ने तत्काल टोकन प्रणाली लागू करने की मांग की। ‘टोकन प्रणाली से मरीजों को लंबी लाइन में नहीं खड़ा होना पड़ता, पता रहता है कि बारी कब आएगी,’ उन्होंने कहा।
ओपीडी टिकट लाइन में दो घंटे से अधिक खड़े कृष्णप्रसाद नेपाल की भी ऐसी ही शिकायत थी। वे सोमवार सुबह अपनी पत्नी के इलाज के लिए टीचिंग आए थे।
सरदर्द और ऊपर की ओर खिंचाव की समस्या वाली पत्नी को इलाज से पहले तीन घंटे से ज्यादा लाइन में खड़ा रहना पड़ा, उन्होंने शिकायत की।
‘तीन घंटे से खड़े हूँ। गर्मी बहुत है, बैठने की जगह नहीं है, पानी भी नहीं है,’ उन्होंने पूछा सरकार कब तक लोगों को परेशानी देती रहेगी?
सेवाग्राही के दबाव को ध्यान में रखते हुए टिकट वितरण प्रणाली सुधार की आवश्यकता बताई गई।

‘कर्मचारियों की संख्या बढ़ाकर भी सेवा देनी चाहिए। मरीज घंटों भूखे लाइन में रहते हैं,’ नेपाल ने कहा, ‘इलाज के लिए आए मरीजों को और कष्ट नहीं देना चाहिए, सहज सेवा का माहौल बनाना चाहिए।’
दैनिक तीन हजार से अधिक मरीज आने वाला टीचिंग अस्पताल गरीब और वंचित वर्ग के लिए आशा और भरोसे का केंद्र है।
लेकिन दूर-दराज के लोकसेवाग्राही अपेक्षित सेवा न पाकर परेशानी झेलते हैं।
सार्वजनिक रूप से बैठने की पर्याप्त जगह न होने के कारण अस्पताल में घंटों लाइन में खड़े रहना और रिपोर्ट लेने के लिए दौड़ना कष्ट और बढ़ा देता है।
अव्यवस्थित भीड़ के कारण त्वरित और सुगम सेवा न मिलने से कई सेवाग्राही असंतुष्ट दिखाई दे रहे हैं।
उनमें नवलपुर से उपचार के लिए आई संगीता पोखरेल भी थीं।

घुटने दर्द की समस्या लेकर आईं पोखरेल ने अस्पताल की अव्यवस्था और देरी की आलोचना की।
‘यह नियम है या अव्यवस्था, समझ नहीं आया। लाइन में खड़े कहा गया टिकट खत्म हो गया। मरीजों के साथ अन्याय है।’
उन्होंने अस्पताल के शौचालय की भी शिकायत की। ‘शौचालय जाने की अनुमति नहीं है, दरवाजे पर लॉक नहीं है, गंदगी वहीं पड़ी है। अस्पताल मरीज ठीक कराने की जगह अब और स्वास्थ्य समस्या बढ़ाने लगा है।’
दो दिनों की छुट्टियों से स्वास्थ्यकर्मियों को राहत मिली लेकिन सेवा लेने आए मरीजों की परेशानी बढ़ गई।
सोमवार दोपहर अस्पताल के ओपीडी के आसपास की स्थिति दिखा रही थी – स्वास्थ्य सेवा में दो दिन की छुट्टियों ने मरीजों की परेशानी को और बढ़ा दिया है।

अस्पताल प्रशासन की दलील – भीड़ नहीं, गुणवत्ता सेवा पर भरोसे की बढ़ती संख्या है
अस्पताल प्रवक्ता डॉ. गोपाल सेढ़ाई के अनुसार अस्पताल में दिख रही भीड़ समस्या नहीं बल्कि यह सेवा लेने वाले मरीजों के बढ़ रहे विश्वास का संकेत है।
‘अस्पताल का नाम और सेवा अच्छी होने के कारण मरीजों की संख्या बढ़ी है। हम इसे प्रबंधन दृष्टि से देखते हैं,’ उन्होंने कहा।
वर्तमान में टीचिंग में रोजाना तीन हजार से अधिक मरीज आते हैं। गैर-छुट्टी के दिन मरीजों की संख्या 2,300 से 2,500 के बीच होती है।
ओपीडी टिकट काउंटर, फार्मेसी और बिलिंग काउंटरों पर ज्यादा भीड़ रहती है। ओपीडी सुबह 7 बजे काउंटर खुलते हैं और 11 बजे बंद हो जाते हैं। फिर दोपहर 1 बजे खुलने वाला ओपीडी शाम 5 बजे बंद होता है।
सुबह एक साथ कई मरीज अस्पताल आते हैं इसलिए भीड़ लगती है। मरीजों की संख्या घटाने के लिए दो साल से ऑनलाइन टिकट प्रणाली शुरू हुई है, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिला।
‘ऑनलाइन टिकट शुल्क बढ़ा नहीं पाए। अस्पताल में 20 लाख रुपये का कारोबार क्यूआर कोड के माध्यम से होता है,’ उन्होंने बताया, ‘लेकिन मरीजों को ऑनलाइन टिकट प्रणाली समझाने में कमी है।’
ऑनलाइन प्रणाली को और सरल बनाने के लिए आईटी टीम के साथ सहयोग जारी है। साथ ही स्वयंसेवकों द्वारा मरीजों को ऑनलाइन टिकट कटवाने के लिए ओपीडी परिसर में बूथ लगाए जा रहे हैं।
अस्पताल ने कुछ विभागों में गुणवत्ता ध्यान में रखते हुए कोटा प्रणाली लागू की है। परंतु मरीजों को इसके बारे में स्पष्ट जानकारी न होने से असंतोष है। अब कोटा शेष संख्या को स्क्रीन पर दिखाने का प्रावधान तैयार है।
‘बढ़ते दबाव के कारण डॉक्टर सभी मरीजों को समय नहीं दे पाते। गुणवत्ता ध्यान में रखकर कुछ विभागों में कोटा प्रणाली लागू की गई है।’
पहले इस्तेमाल की गई टोकन प्रणाली प्रभावी नहीं पाई गई, इसके चलते हटा दी गई और कुछ समय के लिए मरीज कम आने की वजह से कोटा प्रबंधन बिगड़ा, जिस पर लाइन प्रणाली फिर से शुरू की गई।
अस्पताल ने कहा कि दोपहर के ओपीडी सेवा में सुबह की तुलना में भीड़ कम होती है इसलिए मरीजों से दोपहर की सेवा का उपयोग करने का आग्रह किया गया है। दोपहर 3 बजे के बाद अधिकांश ओपीडी में भीड़ कम होने का दावा किया गया है।

तस्वीर और वीडियो : चंद्रबहादुर आले।





