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निजी विद्यालयों को ‘शत्रु’ न मानें, राज्य की भूमिका महत्वपूर्ण है

नेपाल के शैक्षिक इतिहास में निजी क्षेत्र का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। पूर्व में निजी क्षेत्र की मजबूत उपस्थिति न होने के कारण नेपाल के बच्चे दार्जिलिंग, कालिंगपोंग सहित भारत के विभिन्न शहरों में शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाते थे, यह परिस्थिति हम भुला नहीं सकते। अब वह स्थिति नहीं है। इसलिए निजी विद्यालयों को राज्य द्वारा अनदेखा किया जा सकता है, लेकिन नजरअंदाज करना बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। आज शहर की गलियों से लेकर गांव के कोनों तक मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग के अभिभावक अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में शिक्षा दिलाने के लिए अपने आहार पर भी कटौती करते हैं। यह केवल इच्छा नहीं बल्कि राज्य की कमजोर शैक्षिक उपलब्धि के प्रति मौन विरोध और अपने बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए निवेश है। परन्तु हाल के समय में ‘नियमन’ के नाम पर निजी विद्यालयों पर अत्यधिक हस्तक्षेप से न केवल इस क्षेत्र बल्कि सम्पूर्ण शिक्षा की गुणवत्ता संकट में पड़ने का खतरा नज़र आता है।

हम निजी विद्यालय क्यों चुनते हैं? अभिभावकों द्वारा निजी विद्यालय चयन करना आवेग नहीं, बल्कि बाध्यता है। मुख्यतः गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रभावशाली प्रबंधन के कारण निजी विद्यालय चुने जाते हैं। सरकारी विद्यालयों में बड़ी रकम खर्च होती है, शिक्षक प्रशिक्षित होते हैं और सुविधाएं भी कम नहीं हैं, पर वहां ‘उत्तरदायित्व’ की कमी दिखती है। निजी विद्यालयों में अभिभावक शुल्क का भुगतान करते हैं, इसलिए उनमें स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं – मेरा बच्चा क्या सीख रहा है? शिक्षक कब आते हैं? अनुशासन कैसा है? निजी विद्यालय के संचालक और शिक्षक इन बातों को समझते हैं और अच्छे परिणाम तथा अनुशासित वातावरण बनाये रखने के लिए जिम्मेदार रहते हैं। यदि वे असफल होते हैं तो अभिभावकों के पास विकल्प बदलने का डर हमेशा बना रहता है। यह ‘प्रतिस्पर्धात्मक दबाव’ ही निजी विद्यालयों को गुणवत्तापूर्ण बनाता है। यहां पढ़ाई व्यवस्थित होती है, शिक्षक चौबीसों घंटे निगरानी करते हैं और अंग्रेज़ी माध्यम से बच्चे विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा करने का आत्मविश्वास प्राप्त करते हैं।

कुछ लोग सोचते हैं कि निजी विद्यालय अधिक मुनाफा कमाते हैं। हाल फिलहाल ‘कमाते हैं नहीं, लूटते हैं’ की धारणा भी प्रचलित है। लेकिन वास्तविकता का एक और पहलू भी है। निजी विद्यालयों को राज्य से कोई अनुदान प्राप्त नहीं होता। भवन का किराया, बिजली-पानी, तकनीकी उपकरण, यातायात तथा सबसे महत्वपूर्ण पक्ष- शिक्षकों और कर्मियों की तनख्वाह ये सब खर्च विद्यार्थी से लिए गए शुल्क से चलता है। शिक्षकों और कर्मचारियों को सेवा सुविधाएं देना आवश्यक है। जब सरकार शुल्क तय करती है, छुट्टियां निर्धारित करती है, और शिक्षकों की सुविधाओं को सीमित करने का प्रयास करती है, तो वह विद्यालय ‘निजी’ कैसे रह सकता है? निजी का अर्थ ही ‘स्व-प्रबंधन’ है। यदि स्रोतों के स्वतंत्र प्रबंधन में राज्य हस्तक्षेप करता है तो इससे सीधे गुणवत्ता को नुकसान पहुंचता है।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए गुणस्तरीय शिक्षक आवश्यक हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षक को टिकाए रखने के लिए बाज़ार अनुकूल वेतन देना पड़ता है। सरकार शुल्क पर अत्यधिक अंकुश लगाती है जिससे संसाधन कम होते हैं। इसके कारण विद्यालय अच्छे शिक्षक नहीं रख पाते। नतीजा स्वरूप दक्ष जनशक्ति पलायन होता है और शिक्षा का स्तर गिरता है। हालिया हस्तक्षेप और व्यावहारिक संकट को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान सरकार की कुछ नीतियां शिक्षा सुधार के लिए नहीं, बल्कि निजी क्षेत्र को निरुत्साहित करने के लिए हैं। स्कूलों को इंधन बचत के बहाने रविवार को अवकाश देने जैसे उपाय किए जा रहे हैं। इससे प्रतिवर्ष लगभग १०० दिन ही कक्षा चलती हैं और पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए स्कूलों को सुबह ९ बजे से शाम ५ बजे तक संचालित होना पड़ता है।

पंद्रह वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सुबह ९ बजे से शाम ५ बजे तक स्कूल में रखना कितना व्यावहारिक है? यह निर्णय बच्चों की भूख और मानसिक आराम का सम्मान नहीं करता। ९ से ५ बजे के इस कैद से बच्चे शिक्षा के प्रति उत्साहित होने की बजाय थके और परेशान हो रहे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य के बीच संतुलन न होने से दीर्घकालीन रूप से बच्चों की रचनात्मक क्षमताओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

वैशाख के पहले सप्ताह से शुरू होने वाले निजी विद्यालयों के पाठ्यक्रम को सरकारी अवकाशों ने अस्थिर बना दिया है। रविवार की छुट्टियां हों या अन्य आकस्मिक छुट्टियां, इससे विद्यालय की वार्षिक शैक्षिक योजना अस्त-व्यस्त हो जाती है। कभी स्थानीय सरकार तो कभी प्रदेश या संघीय सरकार द्वारा छुट्टियां घोषित करने पर सभी सरकारी निर्णयों का निजी विद्यालयों को पालन करना पड़ता है, जिससे उनकी स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लग जाता है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सरकार ने स्रोतों पर नियंत्रण कर दिया है जिससे निजी विद्यालयों के प्रबंधन को चुनौती मिलती है। शुल्क नियंत्रण से सरकार निजी विद्यालयों के आर्थिक संसाधनों पर प्रभाव डालने का प्रयास कर रही है, जो प्रबंधन में बड़ी समस्या है।

सभी निजी विद्यालयों की स्थिति समान नहीं हो सकती, पर ऋण लेकर निवेश करने वाले संचालक आज मानसिक और आर्थिक रूप से बहुत पीड़ा झेल रहे हैं। सरकार को पहले अपने सरकारी विद्यालयों के स्तर में सुधार करना चाहिए। जब सरकारी विद्यालय उत्कृष्ट होंगे, तो लोग स्वाभाविक रूप से वहां आकर्षित होंगे। वर्तमान में कुछ सरकारी विद्यालय उत्कृष्ट हैं। जब वे विश्वास जीतेंगे, निजी विद्यालय स्वयं ही स्थानांतरित या पुनर्परिभाषित होंगे। लेकिन सरकारी विद्यालयों को सुधारे बिना निजी स्कूलों पर अधिक अंकुश लगाना ‘शैक्षिक पलायन’ को जन्म देगा। यदि नेपाल में निजी विद्यालय बंद या गुणवत्ता खो देते हैं तो अभिभावक फिर से अपने बच्चों को भारत के दार्जिलिंग, देहरादून या अन्य शहरों में भेजने पर मजबूर होंगे। इससे अरबों नेपाली रुपये विदेश प्रवाहित होंगे और बच्चे अपनी जमीन और संस्कृति से दूर शिक्षा ग्रहण करेंगे।

अब आगे का रास्ता क्या है? निजी शिक्षा वैकल्पिक है, इसे किसी पर अनिवार्य नहीं किया गया है। जो लोग प्रभावशाली और सुचारू प्रबंधन चाहते हैं, वे निजी विद्यालय चुनते हैं। राज्य का काम निजी क्षेत्र को ‘शत्रु’ की दृष्टि से नहीं, बल्कि ‘सहयोगी’ के रूप में देखना है और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के माहौल को बनाना है। सरकार को नियमन अवश्य करना चाहिए, लेकिन वह नियमन शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों के हित में होना चाहिए। सरकारी अनुगमन और नियमन किसी पक्ष को प्रताड़ित करने के लिए नहीं, बल्कि जिम्मेदार बनाने के लिए होना चाहिए। संसाधन सुनिश्चित न होने पर निवेश नहीं होगा, और निवेश के बिना विकास संभव नहीं। निजी विद्यालयों पर अत्यधिक हस्तक्षेप न तो विद्यार्थियों के हित में है और न ही अभिभावकों के। इससे नेपाल का शिक्षा क्षेत्र और अस्थिर और कमजोर बनेगा। राज्य को इस पर समय रहते गंभीर होना आवश्यक है। प्रतिबंध लगाकर नहीं, अवसर और उचित नीतियों से ही शिक्षा में क्रांति लाई जा सकती है।