चीन में सस्ती ऊर्जा से समुद्री जल को पीने योग्य बनाने वाली नई तकनीक का विकास
समाचार सारांश
OK AI द्वारा निर्मित। सम्पादकीय समीक्षा गरिएको।
- चीन के शोधकर्ताओं ने विद्युत ऊर्जा का उपयोग किए बिना समुद्री जल को साफ पीने योग्य पानी में बदलने के लिए नई ‘फोटोथर्मल’ तकनीक विकसित की है।
- यह तकनीक नैनोपैटर्न और थ्री-डी संरचना का उपयोग कर सौर ऊर्जा की मदद से समुद्री जल के वाष्पीकरण द्वारा शुद्ध पानी निकालती है।
- परीक्षण में इस उपकरण ने दैनिक 20 लीटर से अधिक पानी उत्पादन किया और 5 वर्ग मीटर क्षेत्र में सफलतापूर्वक फसल उगाई गई।
15 जून, काठमांडू। समुद्री जल से नमक निकालकर (डिसालिनेशन) पीने योग्य जल बनाने की प्रक्रिया आमतौर पर बहुत अधिक ऊर्जा खर्च करने वाली तकनीक मानी जाती है। इसलिए यह तकनीक अब तक जीवाश्म ईंधन और आर्थिक रूप से समृद्ध देशों तक ही सीमित रही है।
लेकिन, चीन में किए गए स्थलीय परीक्षण में एक नए ‘फोटोथर्मल’ सामग्री के उपयोग से बिना अतिरिक्त विद्युत ऊर्जा के, पूरे वर्ष शुद्ध जल उत्पादन को सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया गया है।
चीन की एकेडमी ऑफ साइंसेज के अधीन बीजिंग स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ प्रोसेस इंजीनियरिंग (IPE) और शेन्ज़ेन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने संयुक्त रूप से यह अध्ययन किया है, जो 21 जून को ‘एडवांस्ड मैटेरियल्स’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
शोधकर्ताओं ने नैनोपैटर्न को बुनकर एक त्रि-आयामी (थ्री-डी) फोटोथर्मल वाष्पीकरण सामग्री विकसित की है, जो सौर ऊर्जा से जल शोधन की दक्षता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाती है।
परीक्षण ने दिखाया कि इस संरचना ने 90.2 प्रतिशत तक सौर ऊर्जा को अवशोषित किया और समुद्री जल को वाष्पित करने में उपयोग होने वाली ऊर्जा में 45.7 प्रतिशत की कटौती की।
छोटे परीक्षण स्थल पर इस उपकरण का उपयोग कर केवल प्राकृतिक सूर्य की रोशनी के तहत 5 वर्ग मीटर क्षेत्र में पूरी फसल के लिए सिंचाई की गई, जिसमें कोई बाहरी बिजली प्रयोग नहीं किया गया।
टीम ने बताया कि दो वर्ष की परिचालन लागत के आधार पर इस तकनीक से बनने वाले पानी की लागत मिनरल वाटर से कम होगी और दीर्घकालिक रूप से यह बड़ी तथा आर्थिक रूप से लाभदायक साबित होगी।
परंपरागत डिसालिनेशन तकनीक महंगी होती है और बड़े बुनियादी ढांचे पर निर्भर होती है, जिसमें मुख्य तकनीक रिवर्स ऑस्मोसिस होती है। इसमें समुद्री जल को मेम्ब्रेन से गुजराने के लिए भारी विद्युत ऊर्जा खर्च होती है।
1950 से चली आ रही इस तकनीक में ऊर्जा और संसाधनों से समृद्ध खाड़ी के देश मुख्य भूमिका में हैं। इस वर्ष अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में कुल शुध्द किए गए समुद्री जल का 40 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी के देशों द्वारा उत्पादन किया जाता है और 400 से अधिक पौधे संचालित हैं।
इसके पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में सौर वाष्पीकरण तकनीक का उपयोग किया जाता रहा है, जो सूर्य की रोशनी को गर्मी में बदलकर समुद्री जल को भाप में परिवर्तित करता है और उसको ठंडा कर शुद्ध जल संकलित करता है।
लेकिन व्यवहार में इस तकनीक को लागू करने में चुनौतियां थीं। सौर वाष्पीकरण में उपयोग होने वाले नैनोपाउडर में कण झड़ने की समस्या होती थी और जल वाष्प के निकलने के रास्ते बंद हो जाते थे। साथ ही, प्लास्टिक से बने पॉलीमार स्थायित्व खो देते थे।
इन समस्याओं के समाधान के लिए शोध टीम ने कपड़े के टांके से प्रेरणा लेकर नैनोपैटर्न को टांके के आकार में धागों से मजबूत थ्री-डी संरचना में बनाया। यह कणों के झड़ने को रोकता है और दीर्घकालिक टिकाऊपन प्रदान करता है।
यह नई संरचना कड़ी आवरण वाले होती है और परीक्षण में समुद्री जल को 450 RPM पर लगातार एक महीने तक घुमाने के बाद भी कोई कण नहीं हिले। इसने सूर्य की किरणों को अंदर ही अंदर परावर्तित कर सौर ऊर्जा अवशोषण क्षमता में सुधार किया।
शोधकर्ताओं ने 0.75 वर्ग मीटर के एक परीक्षण प्रणाली का निर्माण किया, जहाँ सौर पैनल से चलने वाला एक छोटा पंखा वाष्प को ठंडा करके शुद्ध जल संकलन प्रणाली से जोड़ा गया।
प्राकृतिक धूप में यह उपकरण प्रतिदिन 20 लीटर से अधिक शुद्ध पीने योग्य जल उत्पादन करता है, जो लगभग 10 लोगों की मूलभूत आवश्यकता से अधिक है।
IPE की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, उत्पादित पानी विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों के अनुरूप है। इस पानी से 5 वर्ग मीटर जमीन पर पालक, मकई और चीनी बंदगोभी की पूर्ण फसल सफलतापूर्वक उगाई गई। परीक्षण अवधि में सामग्री स्थिर और टिकाऊ साबित हुई।
IPE ने कहा, ‘हम वाष्प को जल में बदलने की दक्षता बढ़ाने और प्रणाली लागत कम करने के लिए और अधिक अनुसंधान कर रहे हैं। इसका मुख्य उद्देश्य पानी की कमी वाले तटीय, द्वीप और दुर्गम क्षेत्रों में इस तकनीक को बड़े पैमाने पर लागू करना है।’
