समाचार सारांश
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- राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने सफलतापूर्वक अपना पहला महाधिवेशन पूरा करके नई कार्यसमिति चुनी है।
- पार्टी ने महाधिवेशन में तकनीकी जटिलताओं और शारीरिक थकान के कारण हुई मानवीय त्रुटियों के लिए माफी मांगी है।
- आगे पार्टी प्रदेशसभा खारिज करने और प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी को लेकर बहस को खुला रखने का निर्णय लिया है।
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) ने हाल ही में अपना पहला महाधिवेशन सम्पन्न किया और नई कार्यसमिति का चयन कर लिया है। पार्टी ने कुछ पदाधिकारियों के मनोनयन प्रक्रिया अभी पूरी नहीं की है। महाधिवेशन में पारित दस्तावेजों और प्रक्रियागत कार्यों के बारे में रास्वपा केन्द्रीय निर्वाचन आयोग के उपाध्यक्ष राम गुरुङ से संवाद के दौरान उन्होंने कहा:
रास्वपा का पहला महाधिवेशन पूरा हो गया है। क्या चुनाव की कुछ प्रक्रियाएँ अभी भी बाकी हैं या सब पूरा हो गया?
चुनाव के तकनीकी काम सफलतापूर्वक पूरे कर लिए गए हैं। मतलब, पार्टी के सदस्यों को महाधिवेशन प्रतिनिधि बनाना, उनका मतदाता पंजीकरण करना और केंद्रीय समिति पदाधिकारियों का चुनाव सभी हो चुका है। अब दस्तावेज तैयार करना और अभिलेख रखने का काम बाकी है। निर्वाचन आयोग को रिपोर्ट जमा करने की तैयारी चल रही है।
पहले दिन महाधिवेशन का उद्घाटन बहुत उत्साहपूर्ण रहा। बाद में इतना समय क्यों लगा? अंदर क्या हो रहा था?
मैं चुनाव कार्यवाही की टीम का नेतृत्व कर रहा था, परंतु बाहर की गतिविधियाँ ज्यादा नजर नहीं आईं। गर्मी और प्रतिकूल वातावरण के कारण थकान भी हुई। यह चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है। प्रतिनिधि राजनीतिक उम्मीदें लेकर आते हैं, इसलिए अलग-अलग दृष्टिकोणों को शामिल करने में काफी मेहनत करनी पड़ी। केवल दो महीने का समय था और प्रतिनिधि जोड़ने के लिए कुछ समय पीछे भी जाना पड़ा।
सभापति निर्विरोध चुने गए, तो प्रतिनिधि संख्या क्यों पूरी नहीं हुई?
यह तय हो चुका था, हालांकि गलत सूचना बाहर गई थी। 4,000 से अधिक लोगों ने प्रतिनिधि के रूप में नामांकन कराया था। सभी को समय पर मतदान कराना जरूरी था। इसलिए सत्यापन (भेरिफिकेशन) में समय लगा। बाहर के सदस्यों को असुविधा हुई है तो मैं इसके लिए माफी मांगता हूँ।
नामों के क्रम में गड़बड़ी और वोट पर प्रभाव की बातें आई हैं, इस पर क्या कहेंगे?
यह पूरी तरह तकनीकी मुद्दा है, न कोई पक्षपात न कोई गलत सोच। शुरुआत में एक ही डेस्क पर नामांकन की वजह से भीड़ बढ़ गई थी, इसलिए नामांकन प्रक्रिया को दो जगहों पर विभाजित किया गया। इसलिए दोनों पंजी पुस्तकों में नामों को समान क्रम में लाना मुश्किल हुआ। हमने सभी को बराबरी का अवसर देने का निर्णय लिया है। उम्मीदवार इसका अर्थ अलग-अलग तरीके से समझ सकते हैं।
क्या कोई स्मार्ट टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हुआ?
डिजिटल विकल्प उपलब्ध नहीं था। पंजीकरण मैनुअल और कागजी प्रक्रिया से किया गया। एक जैसे नाम दो पुस्तकों में होने के कारण क्रम मिलाना कठिन रहा।
कुछ उम्मीदवारों ने बताया कि उनका वोट दिखाई नहीं दिया, इसके बारे में क्या हुआ?
परिणाम घोषित करते समय कुछ नाम छूट गए थे। यह सिस्टम की गलती नहीं, बल्कि मेरी थकान के कारण ध्यान न दे पाने की वजह से हुआ। कार्यदल लगभग 72 घंटे लगातार कॉफी के सहारे काम कर रहा था।
नो वोट लागू करने की मांग थी, लेकिन इस बार क्यों लागू नहीं हुआ?
मतदाताओं को इसे समझा पाने में कमी रह गई। हमने सैद्धांतिक रूप से मतपत्र को विभाजित किया था। पहले जो कागजी मतपत्र था उसमें भी ‘नो वोट’ था, जिससे समावेशिता प्रभावित हुई। इसलिए हमने इस महाधिवेशन को स्थगित किया है। ई-वोटिंग मशीन में तकनीकी खराबी के कारण ‘डबल स्किप’ की समस्या आई। इसे पुनर्विचार के लिए प्रस्ताव पारित किया गया है।
मतदान प्रणाली में उम्मीदवार को स्किप करने का विकल्प न मिलने से बाध्यता का सवाल उठ रहा है?
ऐसा नहीं है। चुनाव में 384 उम्मीदवार थे। मतपत्र में बहुविकल्पीय नाम थे। कोई बाध्यता नहीं है। बाध्यता का आरोप तार्किक नहीं।
दूसरे चरण में मतदाता सहभागिता कम हुई, क्या इससे पदाधिकारियों का चयन वैधता कमजोर होगी?
केवल प्रतिशत से नहीं, बल्कि अंतिम तक टिकने वाले लोगों का भी महत्व होता है। पहले चरण के चुनाव को पूरा करके दूसरे चरण तक पहुंचना बड़ी सफलता है।
महाधिवेशन में दस्तावेज़ केवल 10 मिनट में पास कर दिए गए, क्या यह अजीब नहीं है?
ये दस्तावेज़ पहले कई स्तरों पर चर्चा के बाद आए थे। तालियाँ बजाकर मंजूरी देना नेतृत्व के प्रति पूर्ण विश्वास का संकेत है। यह नया राजनीतिक संस्कार है, तानाशाही नहीं। आंतरिक समीक्षा लगातार जारी रहेगी।
यदि प्रतिनिधियों को खुली चर्चा नहीं मिली तो क्या यह लोकतांत्रिक है?
इसे सैद्धांतिक और स्तरगत रूप से देखना आवश्यक है। रास्वपा एक जनाधारित पार्टी है। प्रतिनिधि एकजुट और सांस्कृतिक रूप से जुड़े हैं। महाधिवेशन के कार्यसूची में चर्चा के लिए पर्याप्त समय था। दस्तावेज पास होना अंतिम नहीं है, आंतरिक समीक्षा जारी है।
प्रदेशसभा खारिज करने और संघीयता मॉडल पर पार्टी की क्या सोच है?
डॉक्टर स्वर्णिम वाग्लेज्यू ने प्रदेशसभा खारिज करने का प्रस्ताव दिया है, जिसका मतलब प्रदेश की औचित्य खत्म हो जाना नहीं है। खर्च अधिक और कार्यक्षमता में समस्या के कारण पुनर्संरचना की जरूरत है। प्रदेशसभा इकाई है लेकिन प्रक्रिया में विकृति बन रही है। खारिज का मतलब पूरा प्रदेश खत्म करना नहीं, बल्कि पुनर्विचार और सुधार पर चर्चा करना है।
संविधान निर्माण में संघीयता सामाजिक पहचान से जुड़ी है। खर्च के आधार पर इसे कैसे संबोधित किया जाएगा?
आर्थिक विकास और सामाजिक पहचान एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। राज्य की प्रमुख नीति पिछड़े और हाशिए पर पड़े वर्गों को न्याय देना है। पहचान और आर्थिक रूपांतरण जुड़े हुए हैं। संघीयता की समीक्षा करते वक्त आर्थिक पक्ष को ध्यान में रखा जाएगा, पर पहचान की उपेक्षा नहीं की जाएगी। प्रदेशसभा खारिज करने का मतलब प्रदेश को खत्म करना नहीं है।
प्रदेशसभा न होने पर कार्यपालिका चयन, परिषद की अवधारणा और लोकतंत्र का स्वरूप कैसा होगा?
परिषद विचाराधीन विकल्प और शैक्षणिक चर्चा का विषय है। संविधान तीन स्तर की स्वायत्त सरकार की कल्पना करता है। प्रदेशसभा खारिज कोई अंतिम फैसला नहीं, बल्कि बहस शुरू करने का प्रस्ताव है।
पूर्ण समानुपातिक चुनाव और प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी की बात चल रही है। इससे क्यों माना जाता है कि दो-तिहाई मजबूत सरकार बन सकती है? रास्वपा प्रत्यक्ष कार्यकारी क्यों चाहता है?
यह बहस जारी है। प्रत्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपतिकी अवधारणा सरकार को निष्पक्ष अभिभावक बनाना और जनता की सेवा सरलता से करना है।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया से भी शक्तिशाली तानाशाह पैदा होते हैं, जैसे जनआंदोलन उदाहरण है। क्या प्रत्यक्ष निर्वाचित नेता और अधिक निरंकुश नहीं होंगे?
संदेह रह सकता है। फिर भी निरंकुशता के भय में मजबूत प्रणाली की बहस नहीं रुकनी चाहिए। संविधान में ‘‘चेक एंड बैलेंस’’ प्रावधान होना चाहिए। संविधान व्यवस्था के पुनरावलोकन की संभावना भी देता है।
रास्वपा सामाजिक लोकतंत्र को अपनाना चाहता है, इसका मतलब क्या है?
सामाजिक लोकतंत्र समाजवाद और लोकतंत्र का मिश्रण है जो न्यायपूर्ण संसाधन वितरण और समावेशिता को बढ़ावा देता है। राज्य को सेवा, स्वास्थ्य, शिक्षा और अवसर न्यायपूर्ण रूप से प्रदान करना चाहिए। नया अर्थव्यवस्था में भी खुलेपन की अपेक्षा है।
सामाजिक न्याय में गिरावट की चिंता है, पार्टी इसे कैसे संभालेगी?
ऐसी चिंता नहीं करनी चाहिए। आरक्षण और समावेशिता ऐतिहासिक जरूरत के अनुसार अलग व्यवस्था हैं। समय-समय पर इसकी समीक्षा होती रहेगी, पर मूल ढांचे में अभी भी कई समुदायों को शामिल करना बाकी है। समावेशिता को निरंतर समीक्षा कर मेरिट से मिलान करना जरूरी है।
पार्टी में विभिन्न पृष्ठभूमि के लोग आए हैं, क्या महाधिवेशन उन्हें एक सूत्र में बांध सकता है?
यह संभव है। महाधिवेशन लंबा इसलिए भी हुआ कि विभिन्न मत और विचारधाराओं को समेटा जा सके। केंद्रीय समिति और पदाधिकारी चुनाव में कोई गुट या उपगुट स्पष्ट नहीं था। सभी व्यक्तिगत क्षमताओं के आधार पर वोट में आए।
गुटबंदी न होने का दावा, फिर कुछ नेताओं ने खुले तौर पर समर्थन क्यों किया?
लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उम्मीदवार का समर्थन करना गुटबंदी नहीं होता। यह नैतिक समर्थन होता है। व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा थी और वैचारिक विविधता अधिक दिखी।
केंद्रीय सदस्य 99 निर्वाचित हैं, फिर भी मनोनयन अधिक क्यों?
पार्टी नई है, चुनाव कुछ महीने पहले विभिन्न समूहों के मिलने से बनी है। सभी योगदानकर्ताओं को सम्मान देने के लिए मनोनयन व्यवस्था जरूरी है। पुरानी पार्टियों से तुलना नहीं हो सकती।
पहले महाधिवेशन ने क्या सकारात्मक संदेश दिया? अनुभव कैसा रहा?
मैं सभी अनुभव सीख के रूप में लेता हूं। राजनीतिक मनोविज्ञान को समझना और तकनीकी काम करना सीखा। यह महाधिवेशन पार्टी को वैधता और मजबूत मंच प्रदान करता है। नेताओं और कार्यकर्ताओं में जिम्मेदारी का भाव बढ़ा है। देशभर में सदस्यता बढ़ी।
थोड़ी बहुत सुधार की जरूरत महसूस हो रही है। आवश्यक सुधार और योजनाएँ आगे बढ़ रही हैं। चुनाव और प्रचार के समन्वय को बेहतर बनाएंगे। आगामी महाधिवेशन के लिए उचित अंतराल रखा जाएगा ताकि प्रक्रिया और आसान हो सके।
