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‘बालेन शाह पुराने प्रधानमंत्रियों की समस्याओं को दोहरा रहे हैं’

राजनीतिक विश्लेषक भाष्कर गौतम ने सरकार की कार्यशैली में ऐतिहासिक ज्ञान की कमी और संस्थागत विधियों पर व्यक्ति का प्रभुत्व नजर आने की बात कही है। उन्होंने कहा, “सरकार ने स्थानीय निकायों को सशक्त बनाने की बजाय सिंहदरबार में सत्ता केंद्रीकृत कर सुशासन और सेवा प्रवाह में बाधाएं उत्पन्न की हैं।” छँटनी-छँटनी कार्रवाई की नीति से दण्डहीनता बढ़ी है और इससे कानूनी शासन की नींव कमजोर होने का खतरा है, गौतम ने चेतावनी दी। बालेन शाह नेतृत्व वाली सरकार इस सप्ताह सौ दिनों का कार्यकाल पूरा कर रही है। एक सौ कामों के एजेण्डे के साथ शुरू हुई इस सरकार ने इस अवधि में राज्य के निकायों में क्या सुधार किए और जनता तक सेवाएं कैसे पहुंचाईं, इस पर समीक्षा हो रही है।

गौतम ने कहा, “नेपाल में २००७ या २०१७ से शासन करने वाले सभी नेता विकास की बात करते हैं। लेकिन हर नया शासक अपनी मूर्खता को नेपाली जनता की मूर्खता साबित करने की कोशिश करता है।” उन्होंने ऐतिहासिक विस्मृति का उदाहरण देते हुए कहा, “पिछले राजा महेन्द्र, वीरेन्द्र या पूर्व प्रधानमंत्रियों ने जो किया, वही काम आज बालेन शाह दोहरा रहे हैं।” उन्होंने बालेन के विकास गति बढ़ाने के प्रयास को केवल ऐतिहासिक अज्ञानता बताया और चेतावनी दी कि इससे संस्थाएं दीर्घकालिक रूप से कमजोर होंगी।

गौतम ने कहा, “नेपाल में राजनीतिक दल और प्रधानमंत्री संस्थागत रूप से शासन करने में सक्षम नहीं रहे हैं।” उन्होंने माना, “छँटनी-छँटनी पकड़ने और कार्रवाई करने की नीति राजनीति को विकृत करती है और कानूनी शासन के मूल्यों को चोट पहुंचाती है।” उन्होंने कहा कि बालेन की सरकार में भी इसी तरह की जल्दबाजी और तेज़ी देखी गई है, जो संस्थाओं को कमजोर करने का संकेत है।

अंत में उन्होंने कहा, “जब तक प्रणालीगत सुधार नहीं होंगे, केवल डिजिटल सुधार और दिखावटी कामों से सही सुशासन संभव नहीं होगा।”