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विद्यार्थी आंदोलन के बाद इस्तीफा देने वाले भारत के केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान नरेंद्र मोदी के 12 साल के कार्यकाल के चौथे शिक्षा मंत्री थे।
शनिवार इस्तीफा देते ही प्रधान भी कार्यकाल पूरा होने से पहले ही पद से हटाए गए मंत्रियों की सूची में शामिल हो गए।
भारत की शिक्षा प्रणाली के खिलाफ आवाजें जनपथ से आगे बढ़कर एक हफ्ते में देशव्यापी युवा आंदोलन बन गईं। कक्रोच जनता पार्टी (सीजेपी) की मांगे मान लिए जाने के बाद आंदोलन समाप्त हुआ।
हालिया आंदोलन ने भारत की शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली और सरकार की प्राथमिकताएं लेकर नई बहस शुरू की है।
यह सवाल केवल वर्तमान शिक्षा मंत्री तक सीमित नहीं है, बल्कि मोदी सरकार की समग्र शिक्षा नीति की दिशा पर भी प्रश्न उठ रहे हैं।
सन् 2014 से स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ और धर्मेंद्र प्रधान सहित चार मंत्री इस मंत्रालय के दायित्व संभाल चुके हैं।
उनके नेतृत्व में शिक्षा मंत्रालय ने नई शिक्षा नीति, संस्थागत बदलाव और वैचारिक बहस के विभिन्न चरण देखे हैं।
आलोचकों के अनुसार इस अवधि में शिक्षा सुधार से ज्यादा वैचारिक बदलाव को महत्व दिया गया।
लेकिन सरकार इसे लंबे समय से आवश्यक माने जा रहे संरचनात्मक सुधार प्रक्रिया के रूप में बताती रही है।
अस्थिर शिक्षा मंत्रालय
हालिया विवाद ने मोदी के प्रधानमंत्री कार्यकाल के चार शिक्षा मंत्रियों की भूमिका और विरासत पर नई बहस शुरू कर दी है।
मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में शिक्षा मंत्रालय एक ऐसा महत्वपूर्ण मंत्रालय रहा है, जिसका नेतृत्व चार अलग मंत्रियों ने किया है।
गृह, विदेश, अर्थ, रक्षा और स्वास्थ्य मंत्रालयों में तुलना में अधिक स्थिरता देखी गई है।
पहले तीन शिक्षा मंत्रियों को अपने कर्तव्य से हटाए जाने के कुछ सालों बाद ही विभिन्न कारणों से मंत्रिपरिषद से भी बाहर होना पड़ा।
भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की राजनीति पर लंबे समय से नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी के मुताबिक 12 वर्षों में सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सात और संस्कृति मंत्रालय के पांच मंत्री बने।
“शिक्षा, संस्कृति, सूचना और प्रसारण जैसे मंत्रालयों को ‘सॉफ्ट पावर’ के माध्यम के रूप में देखा जाता है।
आरएसएस की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए ये मंत्रालय महत्वपूर्ण माने जाते हैं, इसलिए विवाद और अस्थिरता यहां अधिक दिखाई देती है,” त्रिवेदी कहते हैं।
सन् 2021 के मंत्रिपरिषद पुनर्गठन में धर्मेंद्र प्रधान शिक्षा मंत्री बने थे। लेकिन कक्रोच जनता पार्टी के समर्थकों की जनपथ पर एक महीने तक धरना के बाद सरकार दबाव में आकर उन्हें पद से हटा दिया।
पहले सरकार ने मेडिकल शिक्षा की नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र चुहाव वाले मुद्दे पर संसद में चर्चा का वादा किया था, लेकिन मंत्री के इस्तीफे को वार्ता की पूर्व शर्त न बनाने का विपक्ष से अनुरोध किया गया।
शुरुआत में सरकार धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देने के लिए तैयार नहीं थी, बताते हैं त्रिवेदी।
“नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र चुहाव को भुला दें तो धर्मेंद्र प्रधान ने संगठन के कई महत्वपूर्ण लक्ष्यों को विवाद के बिना पूरा करने में सफलता पाई थी। उन्हें पहले अपाचित प्रयासों में विवाद झेलना पड़ा।”
मंत्रियों की भूमिकाएं कैसी रहीं?
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सन् 2014 में धर्मेंद्र प्रधान पेट्रोलियम मंत्री थे। दूसरे कार्यकाल में वे शिक्षा मंत्री बने और तीसरे कार्यकाल में भी वही जिम्मेदारी संभाली।
उनके कार्यकाल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को प्राथमिकता मिली और मातृभाषा एवं बहुभाषिक शिक्षा को भी बढ़ावा दिया गया।
लेकिन तीन-भाषा नीति को लेकर तमिलनाडु सरकार ने लंबा विवाद खड़ा किया।
आलोचकों ने उन पर राजनीतिक हस्तक्षेप और ‘हिंदी थोपने’ का आरोप लगाया था।
द हिन्दू के राजनीतिक संपादक निस्तुला हेबर के अनुसार, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के सामने भारतीय जनता पार्टी के पास ज्यादा विकल्प नहीं थे।
नीट प्रश्न पत्र चुहाव ने मध्यम और मध्यम वर्ग के परिवारों को सीधे प्रभावित किया था।
एक अन्य पत्रकार शरद गुप्ता का कहना है कि मोदी सरकार की शिक्षा नीति वामपंथी विचारधारा के प्रभाव को हटाने के उद्देश्य से बनाई गई है।
“मोदीकाल के चारों शिक्षा मंत्रियों को एक समान मापदंड से आंका जाना चाहिए क्योंकि उनमें से कोई भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं था। नीतियां ऊपर से निर्धारित होती थीं, फर्क सिर्फ इतना था कि हर मंत्री ने अलग अंदाज में इन्हें लागू किया,” गुप्ता कहते हैं।
विजय त्रिवेदी भी इसी संदर्भ में शिक्षा मंत्रियों के चयन को देखते हैं। उनके अनुसार स्मृति ईरानी को छोड़कर प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल ‘निशांक’ और धर्मेंद्र प्रधान सभी आरएसएस पृष्ठभूमि से हैं।
सन् 2014 में स्मृति ईरानी को मानव संसाधन विकास मंत्री नियुक्त किया गया था, जिन्होंने राहुल गांधी से चुनाव हारने के बाद भी मंत्री पद प्राप्त किया।
मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम शिक्षा मंत्रालय में बदल दिया गया।
सरकार ने इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति की मुख्य सिफारिश के रूप में प्रचारित किया और कहा कि यह शिक्षा केंद्रित होगा।
पहले कार्यकाल में स्मृति ईरानी और प्रकाश जावड़ेकर इस मंत्रालय को संभाले। दूसरे कार्यकाल में यह जिम्मेदारी रमेश पोखरियाल ‘निशांक’ को दी गई।
शिक्षा मंत्री विवाद में फंसे घटनाएं
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1985 से पहले भी इस मंत्रालय का नाम शिक्षा मंत्रालय ही था। राजीव गांधी सरकार के दौरान इसे मानव संसाधन विकास मंत्रालय नाम दिया गया।
सन् 2014 में मंत्री बनी स्मृति ईरानी को कांग्रेस ने 12वीं कक्षा तक की शिक्षा विषय पर सवाल उठाए, लेकिन भाजपा ने उनका समर्थन किया।
हालांकि उन्होंने पूरा कार्यकाल शिक्षा मंत्रालय का नेतृत्व नहीं किया। मोदी ने उन्हें बाद में वस्त्र मंत्रालय दिया। उन पर अध्ययन विषय और रोहित वेमुला की आत्महत्या से जुड़ी विवाद भी आए।
त्रिवेदी कहते हैं, “स्मृति ईरानी आरएसएस से आई हैं, यह साफ नहीं कहा जा सकता। आरएसएस का संदेश समझना आसान नहीं है। इसलिए शांति प्रिय प्रकाश जावड़ेकर को मंत्रालय दिया गया।”
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही नई शिक्षा नीति का काम शुरू हुआ।
स्मृति ईरानी के कार्यकाल में नई शिक्षा नीति की प्रारंभिक तैयारी हुई और अंततः रमेश पोखरियाल ‘निशांक’ के कार्यकाल में 2020 में इसे लागू किया गया।
2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार नई शिक्षा नीति बनाने और लागू करने में देरी के कारण आरएसएस भी असंतुष्ट था।
भारत में 34 साल बाद लागू हुई नई शिक्षा नीति को मोदी सरकार की प्रमुख उपलब्धि माना गया। इस नीति में शिक्षा क्षेत्र में कुल सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत खर्च करने का लक्ष्य रखा गया था।
लेकिन ताजा आंकड़ों के अनुसार केंद्र के बजट में शिक्षा मंत्रालय का हिस्सा कम हुआ है।
2013-14 में कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए सरकार के दौरान यह बजट 4.6 प्रतिशत था, जो 2025-26 में घटकर 2.5 प्रतिशत हो गया है, ऐसा दावा किया जाता है।
रणनीतिक मंत्रालय
शरद गुप्ता के अनुसार शिक्षा बजट में कमी से सरकार की शिक्षा सुधार के प्रति गंभीरता पर सवाल उठते हैं।
उन्होंने विश्वविद्यालयों में शिक्षक और अधिकारियों की नियुक्ति में वैचारिक पक्ष को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया है।
2022 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शांतिश्री धूलिपुडी पंडित कुलपति बनीं, जो विश्वविद्यालय की पहली महिला कुलपति और आरएसएस से जुड़ी सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने वाली पहली कुलपति हैं।
प्रकाश जावड़ेकर के कार्यकाल में पुलवामा हमले के बाद कश्मीरी छात्रों पर हिंसा के मामले चर्चा में रहे। इसी तरह कक्षा 10 व 12 के प्रश्नपत्र चुहाव विवाद में छात्रों ने जनपथ पर प्रदर्शन किए।
लेकिन उन्होंने ‘इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस’ और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की स्थापना की।
नेशनल टेस्टिंग एजेंसी द्वारा आयोजित नीट परीक्षा में प्रश्नपत्र चुहाव के आरोप के बाद कक्रोच जनता पार्टी आंदोलन में थी।
रमेश पोखरियाल ‘निशांक’ भी कुछ वैज्ञानिक आधार न होने के दावे के कारण विवाद में रहे। उन्होंने कहा था कि ‘चरक ऋषि ने अणु एवं परमाणु की खोज की’, जो विवादित था।
कोविड महामारी के दौरान नीट परीक्षा के आयोजन के विरोध में व्यापक अभियान चला था और मामला अदालत तक भी गया था।
बाद में स्वास्थ्य कारण बताते हुए उन्होंने पद से इस्तीफा दिया और पूरी तरह मंत्रिपरिषद से बाहर हो गए।
उनकी जगह 2021 से जो धर्मेंद्र प्रधान ने संभाला था, उन्होंने भी हालिया आंदोलन के कारण पूरे कार्यकाल को पूरा नहीं किया।





