
अभिभावकों को चाहिए कि वे अपने बच्चे के रूप-रंग के बारे में चर्चा करने के बजाय उनकी क्षमताओं और दक्षताओं की सराहना करें और बच्चों को यह सिखाएं कि वे खुद की तुलना दूसरों से न करें। बहुत से बच्चों को अपनी शारीरिक बनावट या रूप को लेकर असुरक्षा महसूस हो सकती है, जिससे उनका आत्मविश्वास कम हो सकता है। यह उन्हें केवल दुखी ही नहीं करता, बल्कि पढ़ाई, खेलकूद और अन्य गतिविधियों पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। बच्चों के आत्मविश्वास को बढ़ावा देने और उनके भविष्य की सफलता में केंद्रित रहने के लिए अभिभावकों को विशेष ध्यान देना चाहिए।
ऐसे में यह समझना मुश्किल हो सकता है कि बच्चों को कैसे समझाया जाए और उनका आत्मविश्वास कैसे बनाए रखा जाए। इसके लिए कुछ प्रभावी उपाय प्रस्तुत हैं।
1. अपने शरीर के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करें: बच्चे के सामने अपने रूप-रंग या त्वचा के रंग पर चर्चा न करें। साथ ही दूसरों के रूप-रंग पर टिप्पणी करने से बचें। क्योंकि अभिभावक बच्चों के लिए पहले रोल मॉडल होते हैं; जब अभिभावक आत्मविश्वासी होते हैं, तो बच्चों में भी यह गुण विकसित होता है।
2. रूप-रंग की बजाय क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित करें: बच्चे का ध्यान उनके रूप-रंग और शरीर से हटाकर शारीरिक गतिविधियों या कार्यों में प्रशंसा करें। उदाहरण के लिए, यदि आपका बच्चा अच्छे से कूदता या दौड़ता है, तो इसकी प्रशंसा करें। यह समझाना जरूरी है कि सुंदर शरीर से अधिक स्वस्थ शरीर महत्वपूर्ण होता है।
3. संचार माध्यमों के प्रभाव के प्रति जागरूक करें: सकारात्मक बातचीत के साथ-साथ बच्चों को संचार माध्यमों में दिखाए जाने वाले नकारात्मक प्रभावों के बारे में भी सचेत करें ताकि उनकी सोच पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े। साथ ही यह भी समझाएं कि हर किसी की शारीरिक बनावट अलग होती है और खुद को दूसरों से तुलना करना गलत है।
4. अपने आप के प्रति प्यार और सम्मान की भावना विकसित करें: छोटे बच्चों को अपने शरीर का सम्मान करना सिखाना महत्वपूर्ण है। इससे भविष्य में हीन भावना विकसित होने से बचा जा सकता है। शरीर के सभी भागों का सुंदर और आकर्षक होना जरूरी नहीं है, लेकिन स्वस्थ और मजबूत होना बुद्धिमानी की बात है, इस पर जोर दें।
5. बच्चे की भावनाओं को सहानुभूति के साथ संबोधित करें: यदि आपका बच्चा अपने शरीर या त्वचा के रंग को लेकर चिंतित, निराश या शर्मिंदा महसूस कर रहा है, तो क्रोध या शिकायत करने के बजाय उसे प्यार और समझदारी के साथ संभालें। खुली बातचीत से बच्चों को अपनी भावनाएं अभिभावकों के साथ साझा करने में आसानी होती है और झिझक कम होती है।





