
समाचार सारांश
एआई द्वारा तैयार। संपादकीय समीक्षा की गई।
- समाजशास्त्री युर्जेन हेवरमास 14 मार्च को 96 वर्ष की आयु में निधन हो गया, जिन्होंने मार्क्सवाद को नए दृष्टिकोण से व्याख्यायित किया।
- हेवरमास ने वैधता संकट में पूंजीवादी समाज में नागरिक और सरकार के बीच भरोसे की कमी को मुख्य समस्या माना।
- नेपाल में बड़े दलों द्वारा नागरिक की अपेक्षाओं की पूर्ति न करने पर वैधता संकट ने राजनीतिक पराजय को जन्म दिया, लेख में उल्लेख है।
गत 14 मार्च को समाजशास्त्री युर्जेन हेवरमास का 96 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे समाजशास्त्र और मार्क्सवाद में आलोचनात्मक दर्शन के प्रमुख प्रतिनिधि थे। आलोचनात्मक दर्शन में मार्क्सवाद का संबंध फ्रैंकफर्ट स्कूल ऑफ थॉट से जुड़ा है।
यह लेख फ्रैंकफर्ट स्कूल ऑफ थॉट के बारे में न हो, लेकिन हेवरमास के योगदान को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। फ्रैंकफर्ट इंस्टीट्यूट फॉर सोशल रिसर्च की स्थापना 1923 में जर्मनी के मार्क्सवादी विचारकों ने की थी। इसका मुख्य उद्देश्य यूरोप में श्रमिक वर्ग के आंदोलनों की विफलता, रूसी क्रांति के बाद स्टालिनवाद के उदय और बढ़ती फासीवाद की जड़ें समझकर मार्क्सवाद की कमजोरियों का पता लगाना था।
बढ़ती हुई फासीवाद अंततः द्वितीय विश्व युद्ध में तब्दील हुई और हिटलर का नाम विश्व तथा जर्मनी के इतिहास में एक काला अध्याय बन गया। 1929 में जन्मे हेवरमास ने फ्रैंकफर्ट स्कूल के अन्य सदस्यों के देश छोड़ने के समय, नाजी पार्टी के युवा दस्ते में 10 से 14 वर्ष के लड़कों के नेता के रूप में कार्य किया, जिसे उन्होंने अपने जीवन का अंधकारमय पक्ष स्वीकार किया।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उन्होंने अपना शेष जीवन मार्क्सवाद को नए परिप्रेक्ष्य से व्याख्यायित करने में समर्पित कर दिया। उन्होंने 50 से अधिक पुस्तकें और सैकड़ों शैक्षणिक लेख लिखे, जिनमें मानव मुक्ति के पक्ष को जीवित रखने पर जोर था।
प्रोफेसर जोनाथन टर्नर ने हेवरमास के बारे में लिखा है, “उनके विचार इतने व्यापक हैं कि समेट पाना कठिन है।”
हेवरमास का योगदान सार्वजनिक क्षेत्र, सामाजिक विज्ञान की तार्किकता, समाज में वैधता की समस्या, भाषण तथा अन्तरक्रियात्मक विश्लेषण, संचार माध्यम और मानसिकता के औपनिवेशीकरण जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है।
उनके निधन के बाद मैंने इन विषयों पर एमए समाजशास्त्र की कक्षा में बार-बार चर्चा की। साथ ही, मार्क्सवाद और लोकतंत्र के संदर्भ में सार्वजनिक क्षेत्र की अवधारणा के बारे में बहस हुई कि यह नेपाली समाज में लोकतांत्रिक माहौल बनाए रखने में कितनी उपयुक्त है।
परन्तु, मेरे और मेरे कुछ साथियों के मन में अभी भी एक प्रश्न है – नेताओं और बड़े दलों को नए चुनावों में भारी पराजय क्यों झेलनी पड़ी? पुराने दल क्यों हारे? हेवरमास ऐसे हालातों को कैसे विश्लेषित करते? इसका उत्तर उनके पुस्तक ‘लेजिटिमेसन क्राइसिस’ में निहित है।
लेजिटिमेसन क्राइसिस मुख्यतः पूंजीवादी समाज में नागरिकों द्वारा सामाजिक व्यवस्था पर विश्वास खोना और शासन की क्षमता में कमी का अनुभव होना है। किसी भी राजनीतिक व्यवस्था में नागरिकों का विश्वास आवश्यक होता है।
हेवरमास के अनुसार यह विश्वास दोतरफा होता है: सरकार नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य, कानूनी अधिकार उपलब्ध करवाती है और नागरिक कानून का पालन करते, कर चुकाते तथा सार्वजनिक भागीदारी निभाते हैं। इन दोनों पक्षों के बीच अनुबंध व्यवस्था को संचालित करता है।
जब सरकार ये जिम्मेदारियां निभाने में विफल होती है या जनता की अपेक्षाओं की उपेक्षा करती है, व्यवस्था संकट में पड़ जाती है। नेताओं की असफलता, भ्रष्टाचार और संविधान उल्लंघन जनविश्वास में धक्का पहुंचाते हैं।
बड़े दलों द्वारा पिछले 20 वर्षों में नागरिकों की अपेक्षाएं पूरी न कर पाने के कई उदाहरण हम मीडिया में देखते आए हैं। ये घटनाएं सरकार द्वारा जनता को धोखा देना नहीं, बल्कि जनता के सामाजिक व्यवस्था पर विश्वास में बड़ी चोट पहुंचाना हैं।
इस अस्थिरता में आंदोलन, संघर्ष और हड़तालें बढ़ती जा रही हैं, जिनसे नागरिक जीवन और जटिल होता जा रहा है। जैसे-जैसे आक्रोश बढ़ता है, लोग छोटे-छोटे काम करके भी लोकप्रियता पाने लगते हैं और व्यवस्था के विकल्प तलाशने लगते हैं।
हेवरमास ने कहा है कि पूंजीवादी समाज में लोकतांत्रिक व्यवस्था में लेजिटिमेसन क्राइसिस का खतरा पारंपरिक समाज की तुलना में अधिक होता है। जहां पारंपरिक समाज में नेता का चयन अलौकिक शक्ति पर आधारित था, वहीं पूंजीवादी व्यवस्था में तर्क, दक्षता और नीतिगत आधार होता है। नेतृत्व की वैधता सतत कार्य और क्षमता से प्रमाणित होनी चाहिए, अन्यथा वह खो जाती है।
उनके अनुसार आर्थिक विषमता लेजिटिमेसन क्राइसिस को उकसाती है। कुछ अत्यधिक धनार्जन करते हैं और कई बुनियादी आवश्यकताओं से वंचित रहते हैं, जिससे व्यवस्था के प्रति नकारात्मक भावना पैदा होती है।
नेपाल में 20 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे है। भाद्र 23 को माइतीघर में ‘मेरा बाप खाड़ी में, तुम्हारा बाप गाड़ी में’ जैसे नारों से सार्वजनिक असमानता झलकती है।
लेजिटिमेसन क्राइसिस का एक अन्य महत्वपूर्ण तत्व विचारधारा है। जब राजनीतिक नेतृत्व अपने वैचारिक आधार से दूर चला जाता है या व्यवहारिक भेद दिखाता है, तो नागरिक उसे स्वीकार करना बंद कर देते हैं।
२००७ से नेपाली दल समानता पर जोर देते आए हैं, परन्तु महिला, आदिवासी, दलित जैसे समुदायों में समानता बहस और दफ्तर की कागजी सीमाओं तक ही सीमित है।
तकनीकी विकास से नई जटिलताएं उत्पन्न होती हैं, जो लेजिटिमेसन क्राइसिस को बढ़ा सकती हैं। तकनीक से काम आसान होता है तो बेरोजगारी का खतरा बढ़ता है, जिसे नेतृत्व को संबोधित करना होगा।
मीडिया सामाजिक समस्याओं को उजागर कर रहा है और नेतृत्व को सचेत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। असंतोष, आलोचना और विरोध की अनदेखी करने से भ्रम और असंतोष बढ़ता है, जिससे व्यवस्था की वैधता कमजोर पड़ती है।
नेपाली मीडिया में जनता का राज्य संचालन पर विश्वास न होना बड़े पैमाने पर उठाया गया है। लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले दल इन आवाजों को सत्ता के अवसर के लिए ही संबोधित करते हैं। इसके विपरीत, नेता अपनी कमजोरियों को मजाक के रूप में प्रस्तुत करते रहते हैं।
लेजिटिमेसन क्राइसिस की पहली अवस्था में नागरिकों के व्यवस्था पर भरोसा कम होता है, जिससे मतदान का प्रतिशत गिरता है। दूसरी अवस्था में कानून उल्लंघन और अनियमितताएं बढ़ती हैं, जैसे सड़कों पर अनाधिकृत रूप से चलना आदि। यह सामाजिक अस्थिरता को जन्म देता है।
यह स्थिति आंदोलन, संघर्ष और हड़तालों को बढ़ावा देती है और नागरिक जीवन को अधिक कष्टदायक बनाती है। लोग छोटे-छोटे कामों से भी लोकप्रियता पाने लगता हैं और व्यवस्था के विकल्प खोजने की प्रक्रिया शुरू होती है। यह वर्तमान नेपाली राजनीतिक स्थिति की मूल सच्चाई है।
नेपाली नागरिक वर्तमान व्यवस्था में सुधार के विकल्प खोजते हुए राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी को मतदान कर विकल्प दे चुके हैं।
अब तक सात महीनों में प्रभावशाली माने जाने वाले राजनीतिक दल एक साथ नागरिक वोट से पराजित हुए हैं। सभी दल हार के कारण खोज रहे हैं।
संक्षिप्त उत्तर यह है कि ये दल नागरिकों की समस्याओं का समाधान करना छोड़ चुके थे और खुद को जनता से अलग समझने लगे थे। यही वजह है कि उन्हें भारी पराजय झेलनी पड़ी। यह कोई एक घटना नहीं, बल्कि हजारों घटनाओं का परिणाम है।
आगामी सरकार और भविष्य में बड़े दल बनने वाले नेताओं को चाहिए कि वे नागरिकों की समस्याएं, आलोचनाएं और आक्रोश खुले संवाद के माध्यम से सुनें और समाधान खोजें। संवाद की अनदेखी करने वाले अपनी ही नेतृत्व की वैधता खो देंगे।
लेजिटिमेसन क्राइसिस को रोकने के लिए सभी प्रकार की असमानता को घटाना और पारदर्शिता बढ़ानी होगी। तभी लोकतंत्र बच सकेगा, अन्यथा व्यवस्था विकल्प खोजने के लिए मजबूर होगी। हेवरमास के ये विचार नेपाल की वर्तमान राजनीतिक स्थिति को समझने में मदद करते हैं।





