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धनकुटा के आठपहरिया समुदाय में बिसु पर्व की रंगीन धूमधाम

धनकुटा नगरपालिका में मुख्यत: बसे आठपहरिया समुदाय बिसु पर्व आठ दिन तक मनाते हैं। पर्व के पहले दिन भूमि पूजा करके खेती-बाड़ी की आधार मानी जाने वाली जमीन की पूजा की जाती है। इसके अलावा धनुष-बाण प्रतियोगिता, वनभोज, पितृ पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं। २९ चैत्र, धनकुटा। पूरे देश में सीमांत क्षेत्र में बसे आठपहरिया समुदाय का यह सांस्कृतिक पर्व बिसु या बैशाखे चाड धनकुटा नगरपालिका में खासा उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। नए साल के आगमन पर सुख-शांति, उन्नति और आपसी सौहार्द की कामना के साथ लोग पर्व में एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। आठ दिन तक चलने वाले इस पर्व को आठपहरिया समुदाय वर्ष का पहला और प्रमुख पर्व मानते हुए विशेष धूमधाम से मनाते हैं। इस बार तिथि के घट-बढ़ के कारण यह पर्व चैत्र माह में पड़ा है।

बिसु पर्व रामनवमी के बाद दूसरे सोमवार से शुरू होकर आठ दिन यानी तीसरे सोमवार तक मनाया जाता है, किराँती आठपहरिया समाज के केन्द्रीय अध्यक्ष अष्टबहादुर आठपहरिया ने जानकारी दी। पर्व के पहले दिन सोमवार को भूमि पूजा में खेती की बुनियाद मानी जाने वाली जमीन की पूजा की जाती है। दूसरे दिन मंगलवार को आठपहरिया समुदाय के देवस्थल मार्गाथान की सफाई और लेखापोती की जाती है, जबकि तीसरे दिन मार्गाथान में मुर्गा और सूअर की बलि देने की परंपरा निभाई जाती है। चौथे दिन बैल और सूअर द्वारा भोज (भेजो) का आयोजन होता है और पांचवे दिन पितृ पूजा की जाती है। छठे दिन वल्लोपल्लो गांव के बुजुर्ग और युवा मिलकर संयुक्त वनभोज का आयोजन करते हैं और खुशी-खुशी पर्व मनाते हैं। हालांकि हाल के वर्षों में वनभोज का चलन कम हुआ है।

सातवें दिन “ताराआप्मा” अर्थात धनुष-बाण प्रतियोगिता होती है, जो विशेषत: धनकुटा के बिहीबारे हाटिया के नजदीक मार्गाथान क्षेत्र में आयोजित की जाती है। इस दौरान युवा लक्ष्य पर बाण मारते हुए अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं, जो पर्व में और भी उल्लास भर देता है। पहले धनुष-बाण प्रतियोगिता जीतने वालों को पैसे की माला पहनाई जाती थी, लेकिन अब माला का चलन खत्म होकर कुछ पुरस्कार दिए जाते हैं, अध्यक्ष आठपहरिया ने बताया। उन्होंने कहा कि समय के साथ इस प्रथा में बदलाव आया है, फिर भी इसका सांस्कृतिक महत्व कायम है। आठवें और आखिरी दिन मार्गाथान में विशेष पूजा की जाती है और पूरे वर्ष अन्न-पात और फसलों की अच्छी पैदावार के लिए प्रार्थना करते हुए पर्व सम्पन्न होता है, किराँती आठपहरिया समाज के केन्द्रीय उपाध्यक्ष सुर्य आठपहरिया ने बताया।

इसी तरह बैशाख पूर्णिमा तक रोटेपिङ और लिंगेपिङ खेलकर और कुलपितृ की पूजा करके पर्व को पूर्णता देने की प्रथा है, लेकिन हाल के वर्षों में यह भी कम देखने को मिला है। इस अवसर पर देश-विदेश से दूर रहने वाले आठपहरिया युवा अपने जन्मस्थान लौटते हैं, जिससे गांवों में नए जीवन का संचार होता है। पर्व में विशेष रूप से महिलाओं की सुख-समृद्धि के लिए घर-दुआर में पूजा करने की भी परंपरा है। आठपहरिया समुदाय बिसु पर्व के बाद भदौरे अर्थात न्वागी और मंसिरे अर्थात वाडाङ्मेट पर्वों को भी विशेष रूप से मनाते हैं। आठपहरिया समुदाय वाडाङ्मेट को सबसे बड़ा पर्व मानता है। वाडाङ्मेट के दौरान पहली संतान के जन्म की खुशी में और सालभर माता-पिता की सेवा करने वाले संतान तीन दिन पैदल यात्रा कर सुनसरी के वराहक्षेत्र के पास कोकाहा नदी पर केस, दाढ़ी और मुंडन कर सामूहिक रूप से बरखी फुकाते हैं। पुरुष पारंपरिक पोशाक इष्टकोट और दौरा सुरुवाल पहनते हैं जबकि महिलाएं म्यাখ्ली, सिन और हार धारण करती हैं। धनकुटा नगरपालिका में ही आठपहरिया जाति की आबादी लगभग ६ हजार के करीब है।