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सुन तस्करी की शिकायत करने वाले कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार का मामला दर्ज

समाचार सारांश

  • अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग ने त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के कस्टम कार्यालय के तीन कर्मचारियों के खिलाफ सुन तस्करी में शामिल होने के आरोप में भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया है।
  • कस्टम कार्यालय में जब्त इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट (वेप) के अंदर सुन छिपाकर तस्करी करने की घटना दो साल बाद सार्वजनिक हुई है।
  • जिला अदालत ने सुन चोरी में शामिल कर्मचारियों को आपराधिक विश्वासघात का दोषी मानते हुए जेल और जुर्माना की सजा सुनाई है।

२ वैशाख, काठमांडू। त्रिभुवन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के कस्टम कार्यालय के प्रमुख अरुण पोखरेल, प्रमुख कस्टम अधिकारियों मुक्तिप्रसाद श्रेष्ठ और अम्बिकाप्रसाद खनाल, ये तीन कर्मचारियों ने उच्च अधिकारियों को सूचित नहीं किया होता, तो इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट (वेप) के अंदर छिपाकर की गई सुन तस्करी सार्वजनिक नहीं होती।

घटना के लगभग दो साल बाद अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग ने तस्करी की लिखित शिकायत और रिपोर्ट देने वाले कर्मचारियों पर ही भ्रष्टाचार का मामला दर्ज कर दिया है।

अख्तियार का यह निर्णय विरोधाभासी है क्योंकि आरोपित कर्मचारी जिला अदालत में सुन तस्करी की सूचना देने वाले गवाह के रूप में बयान देने जा रहे हैं।

अख्तियार ने बड़े और उच्च प्रोफ़ाइल व्यक्तियों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों पर दबाव के कारण, तस्करी और अनियमितता की सूचना देने वाले कर्मचारियों पर भी मामला दर्ज किया है। दो वर्षों तक जांच न करने के बाद नए सरकार बनने के साथ ही मामला दर्ज किया गया है।

कस्टम द्वारा जब्त की गई वेप

१० पुष, २०८०। सुबह साढ़े ७ बजे त्रिभुवन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर स्थित कस्टम कार्यालय के चेकप्वाइंट पर फ्लाई दुबई विमान से नेपाल आए चीनी नागरिक ली हांग सुंग के दो सूटकेस की जांच के दौरान ७३ पैकेटों में रखे ७३० इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट (वेप) बरामद हुए।

यह सामान व्यवसायिक मात्रा में लाने की अनुमति थी परंतु झीटीगुण्टा सुविधा के तहत पाए जाने के कारण विमानस्थल कस्टम ने सूटकेस जब्त कर लिए।

जब्त पूंजी और कागजात तैयार करने के बाद सूटकेस प्रमुख कस्टम अधिकारी मुक्तिप्रसाद श्रेष्ठ के कार्यालय के पास रखा गया और कस्टम कर्मचारी नासु सरोज श्रेष्ठ ने फोटो भी खींचे।

बाद में इन सूटकेसों का निरीक्षण करने और कार्रवाई हेतु एक महीने से अधिक समय लगा और अंततः गोदाम में भेजा गया, हालांकि कस्टम रिपोर्ट में सूटकेस यात्रु शाखा काउंटर पर होने का उल्लेख है।

सूचना देने वाले कर्मचारियों का कहना है कि शुरुआत में उन्हें पता नहीं था कि वेप के अंदर सुन छिपाई गई है, उन्होंने केवल बिजनेस सामान होने के आधार पर जप्त किया था।

त्रिभुवन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे में टर्मिनल पर कस्टम जांच पास यूनिट, चेकप्वाइंट और कर्मचारी कार्यालय होते हैं, नीचे कस्टम कार्यालय, प्रमुख कार्यकक्ष और गोदाम होते हैं, बरामद सामान आमतौर पर वहां भेजा जाता है।

जब वेप जब्त किया गया, तब प्रमुख कस्टम प्रशासक अरुण पोखरेल के संयोजन में मूल्यांकन समिति बैठकर उसकी कीमत ५ लाख ११ हजार निर्धारण की गई, पर नीलामी प्रक्रिया शुरू नहीं हुई।

सुरक्षा गार्ड की वसूली

निर्मल विक एयरपोर्ट कस्टम के सुरक्षा गार्ड हैं। उन्होंने सूटकेस टर्मिनल से नीचे ले जाने में मदद की। गोदाम पहुंचने के बाद सूटकेस फोड़कर सामग्री की जांच की।

जिला अदालत और अख्तियार के मुताबिक निर्मल ने एक वेप चोरी कर घर ले जाकर जलाने की कोशिश की, समस्या उत्पन्न होने पर सुन की दुकान पर दिखाया तो दुकानदार ने यह सुन होने की बात कही और उन्होंने सुन सिक्के बनाकर बचे हुए रूपये से मजदूरी भी चुकाई।

सुरक्षा गार्ड ने नीलामी कराने वाले बब्लु गुप्ता को बताया कि वेप के अंदर सुन है। बब्लु ने एयरपोर्ट कस्टम कर्मचारियों से मिलकर सुन बिक्री का काम किया और वेप का बदला किया।

कस्टम में जब्त सामान को पोको सूटकेस के गोदाम में रखा गया, वेप और अंदर की सुन अलग कर बेच दी गई और नया वेप खरीदकर उसी सूटकेस में रखकर गोदाम में रख दिया गया।

वेप जब्त होते ही एयरपोर्ट कस्टम में बार-बार फोन आए और राहुल महरा व पूर्व सभापति कृष्णबहादुर महरा ने सूटकेस छोड़ने दबाव बनाया।

उस वक़्त कर्मचारियों को वेप में सुन होने की सूचना नहीं थी, प्रमुख अरुण पोखरेल ने नीलामी प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए थे।

बब्लु ने संदिग्ध सामग्री होने के कारण सबकी रुचि होने की बात कही, पर नीलामी उनके चुनाव हेतु दबाव बनाया गया।

सूटकेस का एक्स-रे परीक्षण किया गया, लेकिन कुछ नहीं देखा गया, पर फोटो लेने वाले कर्मचारी सही नहीं मिले, जिससे पता चला वेप बदला हुआ है।

जब वेप बदलने की पुष्टि हुई तो उनको नासु रेवंत खड्डा बुलाकर समझाया गया, नासु ने इससे इनकार किया तथा डिजिटल उपस्थिति प्रणाली में मौजूद रहे।

प्रमुख कस्टम अधिकारी अम्बिका खनाल के नेतृत्व में अध्ययन समिति बनी और वेप बदलने की रिपोर्ट तैयार की गई।

रिपोर्ट पाते ही प्रमुखों ने नासु और अन्य को तुरंत सामान खोजने और ठीक रखने का निर्देश दिया।

रेवंत ने दिनेश बस्नेत को वेप बदले जाने की बात बताई, लेकिन दिनेश ने कहा सुन बिक्री हो चुकी है और अब वापसी संभव नहीं।

वेप के अंदर छिपाई गई सुन बेचकर दिनेश ने एक करोड़ रुपये कमाए, जिनमें से 65 लाख प्रतिनिधि नासु रेवंत खड्डा को दिए गए।

सुन बिक्री की रकम प्रेरणा थापा और ललिता भंडारी के खातों में जमा कराई गई, और नासु ने 10 लाख से अधिक राशि लेने का आरोपपत्र में उल्लेख है।

नासु ने पैसे से सुकुटे रिसोर्ट में पार्टी भी की, लेकिन बाकी रकम का हिसाब नहीं दे पाए।

दिनेश के बयान अनुसार निकाल गई सुन कुल नौ किलो हुई और पूरी बिक्री हुई है।

दिनेश ने 2 करोड़ 75 लाख रुपए अपने ससुर रामकेशव थापा नाम पर जमीन खरीदी, कुछ नगद बैंक में जमा किए और हिस्सा खर्च किया।

रिपोर्ट में सामने आए खुलासे

अम्बिका खनाल के नेतृत्व वाली समिति की रिपोर्ट के बाद स्पष्ट हुआ कि वेप बदला गया था, और कस्टम कर्मचारी बार-बार नासु रेवंत पर दबाव डाल रहे थे। अंततः नासु ने स्वीकार किया।

कस्टम कार्यालय ने सीआईबी से लिखित अनुरोध कर जांच शुरू कराई, जिसमें प्रमुख अरुण पोखरेल स्वयं सीआईबी गए।

नासु ने बयान में कहा कि उसी चिट्ठी के आधार पर वह गिरफ्तार हुआ।

लेकिन पुलिस की जांच में देरी हुई, कुछ पुलिस अधिकारी प्रभावित हुए और जांच रुक गई।

जब यह सार्वजनिक हुआ तो सीआईबी ने जांच शुरू की और १७ चैत २०८० को ठगी का मामला दायर किया।

सुन तस्करी में शामिल सभी पर मामला दर्ज हुआ, पर सीआईबी ने मामला कमजोर करने की भी कोशिश की।

ट्रैवलर और अन्य मुख्य आरोपियों पर मामला नहीं चला, पूर्व सभापति महरा और उनके पुत्रों की भी जांच नहीं हुई।

सुन चोरी की घटना प्रचंड सरकार में हुई, पर राजनीतिक तौर पर मामला आगे नहीं बढ़ पाया।

सरकार बदलने के बाद जांच फिर शुरू हुई और कुछ आरोपी गिरफ्तार हुए।

जिला अदालत ने नासु रेवंत खड्डा और दिनेश बस्नेत को सुन चोरी में संलिप्त माना और उन्हें आपराधिक विश्वासघात की सजा सुनाई।

६ करोड़ से अधिक लेनदेन होने के बावजूद अदालत ने अधिकांश रकम को बिगो नहीं माना, केवल ३ करोड़ रुपये को बिगो मान्यता दी।

आंतरिक जांच में भी कर्मचारियों द्वारा सामान बदलने का पता चला, जिसके कारण उन्हें जेल और जुर्माना की सजा मिली।

जिन्होंने सूचना दी, उनके खिलाफ मामला

सुन तस्करी की सूचना लंबे समय तक छुपाई गई, पर अख्तियार ने एक साथ पिछली सप्ताह २८ व्यक्तियों के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया। शिकायत करने वाले कर्मचारियों को भी आरोपित किया गया है।

घटना के वक्त प्रमुख कस्टम प्रशासक अरुण पोखरेल विदेश में थे और उनके लौटते ही शिकायत दर्ज हुई। फिर भी अख्तियार ने उन्हें भी दोषी माना।

जांच के बाद कस्टम ने एक्स-रे परीक्षण किए, लेकिन पुलिस ने वेप जांच करते हुए पूरी जांच नहीं की।

जिला अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों ने कर्मचारियों द्वारा कस्टम जांच में छुपाई गई सुन चोरी की पुष्टि की है।

अख्तियार का आरोप है कि तस्करी की शिकायत करने वाले कर्मचारियों ने मिलकर मामले को दबाया और प्रमुख अधिकारियों ने ‘आपराधिक जिम्मेदारी’ लेते हुए वेप के अंदर मौजूद सुन की बिक्री की।

परंतु प्रमुख अधिकारी दावा करते हैं कि वे घटना को रोकने के लिए प्रयासरत थे और सभी प्रक्रियाएं पारदर्शी थीं।

जिला अदालत के फैसले के अनुसार सुरक्षा गार्ड निर्मल विक ने चोरी की सूटकेस सूचना तस्करों को दी और वे भी सुन बिक्री में शामिल थे।

उप सचिव मुक्तिप्रसाद श्रेष्ठ की योजना के अनुसार वेप के अंदर सुन रखी गई थी और गोदाम में सीसीटीवी न होने के कारण चोरी संभव हुई।

कस्टम अधिकारी अम्बिकाप्रसाद खनाल पर सूचना छुपाने और गलत मूल्यांकन करने का भी आरोप है।

फिर भी अदालत के फैसले और दस्तावेजों से अख्तियार के आरोप पूरी तरह सत्यापित नहीं होते, जहां शिकायत आने के बाद जांच शुरू हुई।

अंत में जिला अदालत ने यह दर्शाया कि गोदाम की जिम्मेदारी वाले कर्मचारियों और उनके समूह की जांच तब शुरु हुई जब हवाई अड्डे कस्टम की शिकायत आई।