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पश्चिम बंगाल में इस बार चुनाव दो चरणों में क्यों हुआ?

१२ वैशाख, काठमाडौँ। भारत के चार राज्यों असम, केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और एक केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। पहला चरण का मतदान कल सम्पन्न हो चुका है जबकि अंतिम चरण का मतदान २९ अप्रैल को होगा। २९ अप्रैल के मतदान के बाद सभी राज्यों की विधानसभा सीटों की मतगणना ४ मई को की जाएगी। हाल के वर्षों में सबसे ज्यादा राजनीतिक गतिविधि वाले राज्यों में से एक पश्चिम बंगाल के चुनावी मुकाबले को विशेष रूप से देखा जा रहा है। यह चुनाव २०२१ के विधानसभा चुनाव से पूरी तरह अलग तस्वीर पेश करता है, जब मार्च २७ से अप्रैल २९ तक आठ चरणों में मतदान हुआ था। इस बार चुनाव आयोग ने चुनाव प्रक्रिया को सरल और सुविधाजनक बनाने के लिए केवल दो चरणों में सीमित रखा है। केन्द्रीय निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने सभी पक्षों से विस्तृत बातचीत के बाद चरणों की संख्या घटाने को उपयुक्त और सुविधाजनक बताया है। इसके पीछे केवल तकनीकी कारण नहीं, बल्कि गहरा राजनीतिक और प्रशासनिक महत्व भी है।

२०२१ का आठ चरणों वाला चुनाव पश्चिम बंगाल के चुनाव इतिहास में एक असाधारण घटना माना जाता है। मार्च २७ से अप्रैल २९ तक चला यह चुनाव भारत का सबसे लंबा राज्य विधानसभा चुनाव था। राज्य के २९४ निर्वाचन क्षेत्रों में से २०२१ के मुख्य मतदान अवधि में २९२ सीटों पर मतदान हुआ था। बाकी दो क्षेत्रों में उम्मीदवारों के निधन के कारण चुनाव स्थगित किया गया था और उन सीटों पर पांच महीने बाद मतदान हुआ था। उस समय फैली कोविड-१९ महामारी की दूसरी लहर थी। संक्रमण के खतरे को कम करने के लिए एक मतदान केंद्र में मतदाताओं की संख्या १,५०० से घटाकर १,००० की गई थी। इसका परिणाम यह हुआ कि मतदान केंद्रों की संख्या ३१ प्रतिशत बढ़कर ७७,००० से १ लाख से ऊपर पहुंच गई, जिसके प्रबंधन के लिए कई चरणों की आवश्यकता पड़ी। राज्य की सुरक्षा चुनौती और केन्द्रीय सुरक्षा बलों का तैनाती भी महत्वपूर्ण थी। बंगाल के चुनावी हिंसा के इतिहास को देखते हुए आयोग ने १२५ कंपनियां केन्द्रीय अर्धसैनिक बल तैनात किए थे।

दो चरणों में निर्वाचन: भौगोलिक और राजनीतिक विभाजन २०२१ के आठ चरणों के लंबे चुनाव को छोटा कर केवल दो चरणों में कराने के निर्णय के पीछे गंभीर रणनीतिक एवं प्रशासनिक कारण हैं। २०२१ में कोविड-१९ के उच्च जोखिम के कारण मतदान केंद्रों की संख्या बढ़ाई गई थी, परन्तु वर्तमान में स्थिति सामान्य होने से प्रक्रिया को सरल बनाया गया है। आयोग ने “शून्य सहिष्णुता” नीति के तहत राज्य के मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती, गृह सचिव और पुलिस महानिरीक्षक सहित शीर्ष नेतृत्व को चुनाव घोषणा के बाद हटाकर नए अधिकारियों की नियुक्ति की है। पूर्व में कई चरणों की मांग करने वाली बीजेपी, वाम मोर्चा और कांग्रेस ने भी इस बार कम चरणों का आग्रह किया था। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अनुसार यह तिथि कार्यक्रम मतदाता, सुरक्षा एजेंसियों और राजनीतिक दलों सभी के लिए प्रबंधन में सुविधा देने हेतु तैयार किया गया है। चुनाव के दो चरणों ने राज्य को भौगोलिक एवं राजनीतिक रूप से दो हिस्सों में विभाजित किया है। पहले चरण में कल समाप्त १५२ निर्वाचन क्षेत्रों में उत्तर बंगाल के ५४ सीटें शामिल हैं। यह क्षेत्र भारतीय जनता पार्टी का मजबूत आधार माना जाता है। साथ ही मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में त्रिकोणीय प्रतिस्पर्धा इस चरण को बेहद संवेदनशील बनाती है। खासकर नंदीग्राम में सुवेंदु अधिकारी और पवित्र कबी के बीच मुकाबले ने राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया है। दूसरे चरण में १४२ सीटों पर मतदान होगा, जो तृणमूल कांग्रेस का अभेद्य किला माना जाता है। कोलकाता, हावड़ा और २४ परगना जिलों को सम्मिलित इस क्षेत्र में २०२१ में टीएमसी ने करीब ८७ प्रतिशत सीटें जीती थीं। इस चरण के मतदान से ममता बनर्जी के सत्ता पुनरागमन की दिशा तय होगी।