
समाचार सारांश: सरकार द्वारा काठमाडौं उपत्यका के सुकुमवासी इलाकों को हटाए जाने के बाद लगभग 3,000 बच्चे विद्यालय नहीं जा पा रहे हैं। सुकुमवासी इलाकों के अभिभावक अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए आश्रम में अस्थायी ठहराव करते हुए नई व्यवस्था की मांग कर रहे हैं। राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड ने सहजीकरण की सूचना जारी की है, लेकिन परीक्षा दे रहे विद्यार्थियों को आवश्यक सहयोग नहीं मिल रहा है। 15 वैशाख, काठमाडौं।
‘सर! बच्चे की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। सुकुमवासी कहलाने के कारण हमें कोई कमरा भी नहीं दिया गया। अगर बच्चे पढ़ सकें तो बेहतर होता,’ तीनकुने के आस-पास कमरा न मिलने पर कीर्तिपुर के राधास्वामी सत्संग व्यास आश्रम पहुंची सुकुमाया विश्वकर्मा मानवाधिकारकर्मी से मदद मांग रही थीं। ‘ग़म मत करो, कुछ दिनों में व्यवस्था हो जाएगी,’ मानवाधिकारकर्मी उन्हें समझा रहे थे। उनके मोबाइल पर फोन आया, ‘मम्मी, क्या कमरे मिल गए? कल स्कूल दाखिला कराने जाना है या नहीं?’ बेटे के सवाल ने उन्हें आश्रम के प्रांगण में रोने पर मजबूर कर दिया।
‘तीन दिन से कोई कमरा नहीं मिला। अगर कम से कम एक कमरा मिल जाता तो बच्चे पढ़ सकते थे। मैं तो यही आश्रम में ही रह जाती,’ उन्होंने अपनी पीड़ा बताई। उनके तीन बच्चे हैं जिनकी पढ़ाई की जिम्मेदारी उनकी है। पार्टी पैलेस में काम करके बच्चे पढ़ाती हैं वह। वह कहती हैं, ‘हमें गैरीगाउँ के स्कूल में दाखिला लेना होगा। बच्चे कक्षा 1 और 3 में पढ़ते हैं। अगर अब पढ़ाई नहीं हो पाएगी, तो गरीब बच्चों का क्या होगा?’ उन्होंने सरकार से सवाल किया।
गैरीगाउँ में वे सुकुमवासी बस्ती में रहती थीं। सरकार द्वारा डोजर चलाए जाने के बाद उनकी दैनिक जिंदगी पूरी तरह बदल गई है। नौकरी छोड़कर बच्चों की पढ़ाई और रहने की जगह तलाश में वे त्रस्त हैं। तीन दिन से थापाथली से तीनकुने तक भटक रही हैं। ‘मैं तो थक चुकी हूं, पैसे नहीं हैं, काम नहीं है, घर टूट गया। अगर बच्चों को पढ़ने का मौका नहीं मिलेगा,’ वे निराश नजर आईं। संविधान के अनुच्छेद 31 के तहत प्रत्येक नागरिक को बुनियादी शिक्षा का अधिकार प्राप्त है। मुफ्त प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा का प्रावधान होने के बावजूद सुकुमवासी बस्ती के अभिभावक अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए राज्य से संघर्ष कर रहे हैं।
सुकुमवासी लोगों को राधास्वामी सत्संग व्यास आश्रम में अस्थायी आवास दिया गया है। थापाथली, शांति नगर और गैरीगाउँ के सुकुमवासी आश्रम के प्रांगण में बनाए गए हॉल में रखे गए हैं। हॉल में ‘फैमिली वन’, ‘फैमिली टू’ नामक अस्थायी घर बनाए गए हैं जिन्हें वे अपना घर समझते हैं। सोमवार दोपहर आश्रम पहुंचे वरिष्ठ नागरिक, प्रसूता, गर्भवती महिलाएं और बच्चे हॉल के अंदर थे। उनके माता-पिता whereabouts के बारे में पूछने पर कुछ लोग कमरा खोजने गए थे तो कुछ काम पर। हॉल में बच्चे खेल रहे थे और कई अपने तौर-तौर के बिस्तर पर पल्ट रहे थे। स्कूल जाने की उम्र के तबिता परियार, वर्षा महतो और सबिना मगर एक जगह बैठकर पढ़ाई के बारे में चर्चा कर रहे थे। उन्होंने आश्रम में बने अपने-अपने अस्थायी घर दिखाए।
‘यह मेरा घर है,’ कक्षा 6 में पढ़ने वाली तबिता ने कहा, ‘थापाथली का घर टूट गया। यह हमारा नया घर है।’ तबिता थापाथली के गुहेश्वरी बाल शिक्षा विद्यालय में पढ़ती थीं। ‘स्कूल नहीं जा पाईं। शायद मेरे दोस्त गए होंगे। मैं कब जाऊंगी पता नहीं,’ उन्होंने अपनी पढ़ाई की अनिश्चितता जताई। वर्षा महतो कुपण्डोल के प्रगति स्कूल में कक्षा 7 में हैं। ‘स्कूल जाना तो चाहती हूं, लेकिन कैसे जाऊं? यह जगह दूर है, नई कक्षा में जाना पड़ेगा। थापाथली से हटाकर यहां लाया गया है,’ उन्होंने कहा। ‘पिता कठिन मेहनत कर पढ़ाएंगे। दूसरे जगह जाने के लिए पैसे नहीं हैं। अब क्या किया जाए पता नहीं।’ कई बच्चे मजदूरी करके पढ़ाई कर रहे हैं।
तबिता कहती हैं, ‘हमारे माता-पिता सब इसी तरह काम करते हैं।’ विश्व निकेतन स्कूल में कक्षा 3 की रिदिमा श्रेष्ठ भी वहीं स्कूल में पढ़ना चाहती हैं। ‘मेरे दोस्त वहीं हैं। वहीं स्कूल में पढ़ना चाहती हूं, लेकिन क्या होगा मालूम नहीं,’ उन्होंने कहा। इन बच्चों के पास अभी किताबें और कॉपियां होने चाहिए, लेकिन उनमें अनिश्चितता ही है कि वे पढ़ पाएंगे या नहीं। विभिन्न जगहों से आए इनका अपना-अपना घर एक ही हॉल में अलग-अलग स्थान पर बना है। अधिकांश बच्चे उसी समूह में दोस्त बने हैं। कई दोस्त सुकुमवासी बस्ती के ही रहे हैं। सरकार ने 15 दिनों के भीतर नई व्यवस्था करने का आश्वासन दिया है। फिर भी वर्षों से दोस्तों से अलग होने का डर उन्हें सताता है।
‘यहां से थापाथली बेहतर था। घर टूटा। 15 दिनों बाद हमें अलग होना होगा। तब दोस्तों से मिलना नहीं हो पाएगा,’ रिदिमा ने कहा। उसी हॉल के दूसरे बिस्तर पर आयुसा खातुन लेटी हुई थीं। गैरीगाउँ के स्कूल में उनकी कक्षा में बाधा आई है। ‘अब पढ़ना है या नहीं पता नहीं। घर टूट गया। कहां रहकर पढ़ें?’ उन्होंने सवाल किया। लहर दर लहर प्रत्येक घर का कोना बनाया गया है। दूसरे कोने में विद्यालय जाने की उम्र वाले बच्चे कतार में हैं। कक्षा 6 के सूर्य महतो और तितिस माझी ने बताया कि भरणा अभियान शुरू होने के बावजूद स्कूल दूर होने के कारण वे स्कूल नहीं जा पाए। ‘पढ़ना चाहते हैं, लेकिन मन से ही नहीं होता। स्कूल तक कैसे जाएं? कैसे आएं? कहां रहें? क्या खाएं? पता नहीं,’ उन्होंने सामूहिक रूप से सवाल किया।
निरज थापा की बेटी विश्व निकेतन स्कूल में कक्षा 1 और भांजी कक्षा 4 में पढ़ती है। थापाथली से बस्ती हटाए जाने के बाद उनकी पढ़ाई प्रभावित हुई है। ‘बच्चों की पढ़ाई बंद हो गई है। हम ठंडे फर्श पर भी रहेंगे। 18 महीने का बच्चा है, वह बीमार न पड़े,’ उन्होंने अपनी समस्या बताई। शनिवार को थापाथली क्षेत्र में डोजर चलने के बाद वे परिवार समेत आश्रम आ गए। वह काम पर भी नहीं जा पा रहे। ‘जो अपने घर गए हैं, जो कमरे वाले हैं वे अपने स्थान पर गए हैं। हम तो यहाँ शनिवार को ही आए हैं। अगर बारिश हुई तो बच्चों को कैसे बचाएंगे? रात भर सोए नहीं,’ उन्होंने कहा। ‘बच्चों का भविष्य अंधकारमय है। वे स्कूल नहीं जा पाए हैं।’
संविधान के अनुसार विकलांगता वाले और आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों को मुफ्त उच्च शिक्षा का अधिकार प्राप्त है। लेकिन सुकुमवासी बस्ती के गरीब बच्चों के लिए शिक्षा अभी भी एक चुनौती बनी हुई है।
ग्रिवाणीका थापा की कक्षा 12 की परीक्षा चल रही है। सोमवार से उनकी परीक्षा शुरू हुई लेकिन उनके पास किताबें नहीं हैं। ‘मैं परीक्षा दे रही हूं। डोजर ने किताबें नष्ट कर दीं। रात भर नींद नहीं आई और परीक्षा दे चुकी हूं,’ उन्होंने बताया। डोजर के बाद वे किताबें खोजने थापाथली गई थीं। ‘किताब नहीं मिली, शायद खो गई। परीक्षा चल रहे हैं और सरकार पढ़ने तक नहीं दे रही। पढ़ने का अधिकार कानून में है तो भी क्या हुआ? अधिकार गरीबों के लिए नहीं था क्या?’ उन्होंने सरकार से सवाल किया।
चुनाव से पहले प्रधानमंत्री बलेन शाह के भाषण की याद उनकी ज़ुबान पर थी। ‘हमने सुना था कि गरीब नहीं होने पर भी पढ़ाई की योजना है। आज परीक्षा है। किताबें नहीं हैं। पैसे नहीं हैं। हमारा अधिकार कहां है?’ उन्होंने सवाल उठाया। राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड ने सुकुमवासी बस्ती के छात्रों के लिए परीक्षा में जरूरी सहजीकरण की सूचना जारी की है, लेकिन वह परीक्षा दे रही ग्रिवाणीका तक असर नहीं पहुंचा पाई है। बालबालिका सम्बन्धी कानून २०७५ से बच्चों को शिक्षा, खेलकूद, पोषण और स्वास्थ्य का अधिकार मिलता है, लेकिन यह कानून सुकुमवासी बच्चों के संदर्भ में प्रभावी नहीं है। सरकार ने सुनिश्चित किया है कि कोई भी बच्चा स्कूल से बाहर न रहे।
15 वैशाख (आज) से नया शैक्षिक सत्र और दाखिला अभियान शुरू हो चुका है। लेकिन बच्चे कहां दाखिला लें, इसने अभिभावक आश्रम में ही हैं। पढ़ाई के लिए बच्चों के भविष्य को लेकर निरज कहते हैं, ‘अंत में गरीब ही मार खाते हैं, सरकार से पूछिए।’ सरकार ने सुकुमवासी बस्ती के छात्रों को उचित विद्यालयों में स्थानांतरण का फैसला लिया है और इस संबंध में 6 बिंदुओं वाला सर्कुलर भी जारी किया है।
सोमवार को आश्रम पहुंचे स्कूल जाने योग्य 48 बच्चों पर सरकार के सर्कुलर का प्रभाव दिखाई नहीं देता। प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, काठमाडौं उपत्यका के थापाथली, मनोहरा, शांति नगर, गैरीगाउँ सहित सुकुमवासी बस्तियों में लगभग 3,000 बच्चे हैं। अधिकतर विद्यार्थी नर्सरी से लेकर कक्षा 12 तक पढ़ाई कर रहे छात्र-छात्राएं हैं।





