
समाचार सारांश
- प्रतिनिधि सभा में बुधवार को राष्ट्रपति द्वारा प्रस्तुत नीति तथा कार्यक्रम पर चर्चा और पारित करने की कार्यसूची विपक्ष के विरोध के कारण तीनों बैठकें स्थगित रहीं।
- प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की अनुपस्थिति में बैठक को आगे बढ़ाने की कानूनी व्यवस्था के बावजूद विपक्ष ने प्रधानमंत्री के संसद में न आने पर सवाल खड़े किए।
- प्रतिनिधि सभा नियमावली के नियम ३८ के अनुसार प्रधानमंत्री के अनुपस्थित होने पर निर्धारित मंत्री जवाब दे सकते हैं, लेकिन विपक्ष इस बात पर कायम रहा कि जवाब प्रधानमंत्री को ही देना चाहिए।
३० वैशाख, काठमांडू। राष्ट्रपति द्वारा प्रस्तुत नीति तथा कार्यक्रम पर चर्चा और पारित करने के लिए बुधवार को प्रतिनिधि सभा में तीन बैठकें हुईं, लेकिन विपक्षी दलों के विरोध के कारण सभी तीन बैठकें बाधित रही।
सुबह ११ बजे तय बैठक कुछ देर बाद शुरू हुई, पर कार्यसूची को आगे बढ़ाया नहीं जा सका। बैठक दो बार स्थगित हुई। तीसरी बैठक के स्थगित होने तक शाम के ताढ़े पाँच बज चुके थे।
तीनों बैठकें प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की गैरमौजूदगी में आगे बढ़ सकती हैं या नहीं इस पर लंबी बहस हुई, लेकिन नीति और कार्यक्रम पर चर्चा आरंभ नहीं हो सकी।
प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद कार्यालय के कुछ ही दूर स्थित संसद भवन की यह स्थिति प्रधानमंत्री बालेन्द्र के लिए नई नहीं थी।
उनको यह पता था कि संसद उन्हें खोज रही है, फिर भी उन्होंने कोई संकेत नहीं दिया। नतीजे के तौर पर राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी संसद में प्रधानमंत्री के अनुपस्थित होने पर भी बैठक हो सकने वाली कानूनी व्यवस्था याद करता रहा।
विपक्षी दल के सांसद प्रधानमंत्री की गैरमौजूदगी का जवाब कौन देगा, इस सवाल पर लगातार चर्चा कर रहे थे।
दोनों पक्षों के तर्क अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण थे। समाधान न मिलने से संसद की कार्यसूची प्रभावित हुई।
सरकार द्वारा आगामी आर्थिक वर्ष के लिए प्रस्तुत नीति तथा कार्यक्रम पर संसद में चर्चा नहीं हो सकी, जिससे जनता की आवश्यकताएं और एजेंडा संसद में उठाए नहीं जा सके।
विपक्षी दलों को सूचना नहीं मिली
प्रतिनिधि सभा की संभावित कार्यसूची आमतौर पर एक दिन पहले सार्वजनिक की जाती है। मंगलवार को जारी कार्यसूची के अनुसार, बुधवार के बैठक में राष्ट्र अध्यक्ष के प्रतिनिधि प्रधानमंत्री बालेन्द्र द्वारा नीति तथा कार्यक्रम पर चर्चा आरंभ करने का प्रस्ताव रखेंगे। विपक्षी दल इस विषय पर आश्वस्त थे।
बैठक शुरू होने से पहले हुई कार्यव्यवस्था परामर्श समिति की बैठक में प्रधानमंत्री की मौजूदगी पर कोई चर्चा नहीं हुई। आकस्मिक और शून्य समय चलाने पर सहमति बनी और कार्यसूची को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया।
हालांकि, बैठक शुरू होने से कुछ समय पहले यह खबर आई कि प्रधानमंत्री संसद में उपस्थित नहीं होंगे। इसके बाद सहमति अनुसार आकस्मिक और शून्य समय जारी रहा।
सभामुख डोलप्रसाद अर्याल ने कार्यसूची को आगे बढ़ाने का प्रयास किया, लेकिन विपक्षी दलों ने विरोध जताया। उन्होंने याद दिलाया कि कार्यसूची में प्रधानमंत्री द्वारा नीति तथा कार्यक्रम पर चर्चा करने का प्रस्ताव है।
सभामुख अर्याल ने बताया कि प्रतिनिधि सभा नियमावली के नियम ३८ के अनुसार प्रधानमंत्री अनुपस्थित होने पर निर्धारित मंत्री जवाब दे सकते हैं।
फिर संसद में यह बहस शुरू हुई कि क्या प्रधानमंत्री की उपस्थिति अनिवार्य है या नहीं। नेपाली कांग्रेस के सांसद अर्जुननरसिंह केसी ने मंगलवार की घटना को याद किया।

‘कल जब राष्ट्रपति ने नीति तथा कार्यक्रम पढ़ा, तो प्रधानमंत्री खड़े होकर सत्र छोड़ गए। आज सरकार की नीति और कार्यक्रम पर चर्चा करने, सुनने या जवाब देने के लिए प्रधानमंत्री नहीं आएंगे?’ सांसद केसी ने प्रधानमंत्री बालेन्द्र की मंशा पर सवाल उठाए।
प्रधानमंत्री की गैरमौजूदगी में सदन को आगे बढ़ाने पर विपक्ष ने बहिष्कार की चेतावनी दी।
‘चर्चा को शुरू करने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन जवाब देने के समय अगर प्रधानमंत्री अनुपस्थित रहे तो हमें बहिष्कार करना होगा,’ उन्होंने कहा।
अतः राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के संसदीय दल के नेता ज्ञानबहादुर शाही ने प्रधानमंत्री की उपस्थिति को आवश्यक बताया।
‘प्रधानमंत्री का संसद में उपस्थित न होना सभामुख की उपस्थिति या अस्तित्व की बात ही नहीं, यह हमारे संसदीय दल के १८१ सांसदों का भी मामला है। पिछली कार्यकाल में भी हमने इसका विरोध किया था,’ उन्होंने कहा।
नेकपा एमाले के प्रमुख सचेतक ऐनबहादुर महर ने कहा कि प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति संसद के प्रति जिम्मेदारी और जवाबदेही के सवाल को बढ़ाती है।
‘प्रधानमंत्री संसद में कब जवाब देंगे? पिछले अधिवेशन में बोले नहीं, इस अधिवेशन में भी नहीं आए। आज आने का समय भी नहीं है,’ उन्होंने कहा।

विपक्षी दलों के कड़े सवालों पर राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के मुख्य सचेतक कबिन्द्र बुर्लाकोटी ने प्रतिनिधि सभा नियमावली के नियम ३८(३) का हवाला दिया।
नियम के अनुसार नीति तथा कार्यक्रम पर उठाए गए सवालों के जवाब प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में उनके द्वारा निर्धारित मंत्री दे सकते हैं।
‘प्रधानमंत्री ने अर्थमंत्री को चर्चा में उठे सवालों का जवाब देने के लिए नियुक्त किया है,’ उन्होंने बताया।
इस पर नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख सचेतक युवराज दुलाल ने सवाल किया, ‘पाँच वर्षों से नियमावली के दफा ३८ का हवाला देकर प्रधानमंत्री की आवाज संसद में क्यों नहीं सुनाई देती?’
वातावरण तनावपूर्ण होता गया और नेकपा एमाले के सांसद गुरुप्रसाद बराल ने विपक्षी दलों को दोषी ठहराने की कोशिश की।
‘प्रतिपक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दों को नजरअंदाज किए बिना सरकार संसद को खराब स्थिति में ले जाना गलत है,’ उन्होंने कहा।
नेपाली कांग्रेस के संसदीय दल के नेता भीष्मराज आङ्देम्बे ने समाधान खोजने के लिए बैठक स्थगित करने का प्रस्ताव रखा।
‘१०-१५ मिनट के लिए बैठक रोककर समाधान खोजें,’ उनका प्रस्ताव था। सभामुख ने भी बैठक स्थगित कर दी।
अस्पष्ट सहमति के कारण उलझन
पहली बैठक स्थगित होने के बाद शीर्ष नेताओं की चर्चा शुरू हुई।
सभाहल के साथ जुड़े कार्यव्यवस्था परामर्श समिति के हॉल में सभामुख अर्याल, उपसभामुख रुवी ठाकुर मौजूद थे।
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने, संसदीय दल के उपनेता गणेश पराजुली, मुख्य सचेतक कबिन्द्र बुर्लाकोटी, सचेतक प्रकाशचंद्र परियार और क्रान्तिशिखा धिताल भी वहां मौजूद थे। अर्थमंत्री स्वर्णीम वाग्ले भी थे।
नेपाली कांग्रेस के संसदीय दल के नेता भीष्मराज आङ्देम्बे, प्रमुख सचेतक वासना थापा और सांसद अर्जुननरसिंह केसी भी उपस्थित थे।
एमाले से संसदीय दल के नेता रामबहादुर थापा बादल, उपनेता पद्मा अर्याल और प्रमुख सचेतक ऐनबहादुर महर मौजूद थे।
नेकपा कम्युनिस्ट पार्टी से प्रमुख सचेतक युवराज दुलाल, सांसद प्रमेश हमाल, श्रम संस्कृति पार्टी से आरेन राई एवं राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टी से खुश्बू ओली उपस्थित थे।
समझौता खोजने के उद्देश्य से हुई बैठक में सभामुख ने पहले समाधान के उपाय सुझाए और फिर सांसद अर्जुननरसिंह केसी ने बोलना शुरू किया।

‘विपक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दे के सटीक मायने को समझना जरूरी है। हर बात लिखित होती है, ऐसा जरूरी नहीं। बाधा हटाने का नियमावली में प्रावधान पहले से मौजूद है,’ केसी ने कहा।
कांग्रेस नेता आङ्देम्बे ने कहा, ‘प्रधानमंत्री की उपस्थिति की मांग सभी कर रहे हैं। प्रधानमंत्री को संसद बुलाने में क्या बाधा है?’ उन्होंने आगे कहा, ‘संसद प्रधानमंत्री से जवाब मांग रही है, कम से कम जवाब तो आए।’
निकट में खड़े अर्थमंत्री वाग्ले ने बताया कि प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भरता के तौर पर एक पत्र भेजा है, जिसमें उन्होंने प्रतिनिधि नियुक्त किया है।
प्रतिनिधि सभा नियमावली के नियम ३८ के निरीक्षण से यह स्पष्ट हुआ कि प्रधानमंत्री ने प्रतिनिधि नियुक्त किया है। नियमावली में पहले से ही ऐसी व्यवस्था है।
नई संसद ने भी इसी तरह की व्यवस्था को स्वीकार किया है। इस बात की पुष्टि सभामुख अर्याल ने भी की।
‘मैं गणित के सवाल में पड़ना नहीं चाहता। दुनिया देख रही है। आज बैठक चलाओ। अगली बैठक में फिर चर्चा होगी। मैं प्रधानमंत्री से समन्वय करूंगा,’ वे बोले।
एमाले के नेता बादल ने बात नहीं की। प्रमुख सचेतक महर ने विपक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दे को नियम के अनुसार नहीं बल्कि प्रधानमंत्री की संसद के प्रति जवाबदेही के संदर्भ में देखने की अपील की।
एक दूसरे को स्वीकार करने की कोशिश जारी थी।
उसी दिन अर्थमंत्री वाग्ले ने चर्चा शुरू करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन कांग्रेस के सांसद केसी ने कहा कि जवाब प्रधानमंत्री को ही देना चाहिए।
केसी ने संसदीय अभ्यास के व्यवहारिक पक्ष को भी महत्त्वपूर्ण बताया और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को मनाने की कोशिश की।
‘नीति तथा कार्यक्रम के सवालों के जवाब प्रधानमंत्री ही देते आए हैं, यह परंपरा भी आवश्यक है। पहले भी प्रधानमंत्री संसद में आए थे,’ उन्होंने कहा।
सभामुख अर्याल ने कहा कि बुधवार की बैठक में जवाब नहीं मिलेगा, ‘सदन समाप्त होने के बाद मैं प्रधानमंत्री से संवाद करूंगा।’
इसके बाद स्थगित बैठक फिर शुरू करने पर सभी सहमत हुए।
स्थगित बैठक फिर शुरू हुई। अर्थमंत्री वाग्ले ने नीति तथा कार्यक्रम पर चर्चा शुरू करने का प्रस्ताव रखा।
शीघ्र कांग्रेस नेता आङ्देम्बे उठे और कहा कि नीति तथा कार्यक्रम पर उठाए गए सवालों के जवाब प्रधानमंत्री से निश्चित करना आवश्यक है। साथ ही उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को चर्चा सुननी चाहिए।
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने इसे सहमति उल्लंघन बताया। मुख्य सचेतक बुर्लाकोटी ने विपक्ष को सवाल किया।
फिर अन्य विपक्षी दल भी सहमत हुए और नीति तथा कार्यक्रम पर उठाए गए प्रश्नों का जवाब प्रधानमंत्री को ही देने की मांग दोहराई।
नेताओं के अनुसार शीर्ष नेताओं के बीच अस्पष्ट सहमति ने उलझन पैदा की। विपक्ष ने संसद में जवाब अगले दिन आएगा यह स्पष्ट नहीं किया।
चर्चा के खत्म होने के बाद भी अर्थमंत्री द्वारा जवाब देने की संभावना पर विपक्ष को संशय रहा। इसी बीच सत्तापक्ष और विपक्षी दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी रहे। विपक्ष ने कहा कि जनता के एजेंडा को संसद में उठाने नहीं दिया गया जबकि सत्तापक्ष का दावा था कि प्रधानमंत्री संसद में जवाबदेह होना ही चाहिए।
बैठक आगे नहीं बढ़ सकी और प्रतिनिधि सभा की दूसरी बैठक स्थगित हुई।
कांग्रेस में दोमुखी रुख
दूसरी बैठक के स्थगित होने के बाद फिर से शीर्ष नेताओं की चर्चा शुरू हुई। विपक्षी दल पर सहमति उल्लंघन का आरोप राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने लगाया।
कांग्रेस, एमाले और नेकपा के नेताओं ने यह रुख अपनाया कि प्रधानमंत्री को जवाब देने के लिए आना होगा और इसके लिए सभामुख के निर्णय आवश्यक होंगे। एमाले उपनेता पद्मा अर्याल ने यह कहा।
लेकिन कांग्रेस के अंदर रूलिंग को लेकर दो विरोधाभासी राय सामने आई।
कांग्रेस के सांसद केसी ने कहा, ‘संसद को रोकना संभव नहीं है, आगे बढ़ें। प्रधानमंत्री कल आएंगे। आज बैठक होनी चाहिए। सभामुख की रूलिंग देश के तीनों अंगों के बीच संतुलन का मसला है।’
वहीं कांग्रेस संसदीय दल के नेता आङ्देम्बे ने कहा, ‘प्रधानमंत्री को चर्चा सुननी और जवाब देना चाहिए, यह स्पष्ट पार्टी नीति है। इसके अनुसार सदन चलता है, वरना मुश्किल होगी।’
सूत्रों के अनुसार आङ्देम्बे कांग्रेस अध्यक्ष गगन थापा के साथ लगातार संवाद में थे और उसी के अनुसार बात रखी।

नेकपा के प्रमुख सचेतक युवराज दुलाल ने प्रधानमंत्री का संबोधन जरूरी बताया।
‘प्रधानमंत्री को संबोधन करना चाहिए, यह बात सभी नेपाली समझ चुके हैं। यह केवल नियमावली नहीं है,’ उन्होंने कहा। ‘संविधान में भी प्रधानमंत्री की संसद में जवाबदेही अनिवार्य है। इसलिए यह कोई सिर्फ नियमावली का मामला नहीं है।’
नीति तथा कार्यक्रम में सांसदों के सवालों के जवाब प्रधानमंत्री को स्वतः देना चाहिए, यह परंपरा भी जायज है। दुलाल ने कहा कि प्रधानमंत्री के जवाब के बाद सदन सहज होगा।
कोई ठोस सहमति के बिना तीसरी बैठक हुई, लेकिन वह भी स्थगित हो गई।
सभामुख अर्याल ने गुरुवार को अगली बैठक बुलाई है।
क्या प्रधानमंत्री आएंगे?
नेताओं के अनुसार तीसरी बैठक के स्थगित होने तक सभामुख ने प्रधानमंत्री से संवाद नहीं किया था।
‘यदि प्रधानमंत्री संसद में आकर नीति तथा कार्यक्रम पर चर्चा सुनने और जवाब देने को तैयार होते तो दिन में कुछ इशारा मिलता। लेकिन कोई संकेत नहीं है,’ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेता कहते हैं।
सभामुख ने बताया कि वे कल प्रधानमंत्री से बातचीत करेंगे।
इसका आधार यह है कि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने नियमावली के विपरीत प्रधानमंत्री द्वारा प्रतिनिधि नियुक्त करने के मामले को गलत नहीं माना है। सवाल उठता है कि कौन सा नियम प्रधानमंत्री की उपस्थिति को अनिवार्य ठहराता है? प्रतिनिधि सभा नियमावली के नियम ३८ में नीति तथा कार्यक्रम से संबंधित प्रावधान है।
उपनियम १ के तहत, राष्ट्रपति से संबोधन के बाद धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया जाता है और चर्चा के लिए दिन तय करने का अधिकार सभामुख को होता है। यदि प्रधानमंत्री उपस्थित नहीं होते हैं तो नियुक्त मंत्री जवाब दे सकता है।

यानी प्रधानमंत्री बालेन्द्र अनुपस्थित होने पर किसी अन्य मंत्री को प्रतिनिधि नियुक्त कर सकते हैं।
सभामुख अर्याल के अनुसार ३५ संशोधन पहले ही दर्ज हो चुके हैं, जिनके आधार पर नीति तथा कार्यक्रम पर चर्चा होगी।
चर्चा में उठाए गए सवालों का जवाब प्रधान मंत्री को अनिवार्य रूप से देना जरूरी नहीं है।
‘चर्चा के अंत में प्रधानमंत्री या नियुक्त मंत्री जवाब देंगे,’ नियमावली के नियम ३८ के उपनियम ३ में उल्लेख है।
उपनियम ४ के अनुसार, ‘प्रधानमंत्री या नियुक्त मंत्री द्वारा जवाब देने के बाद चर्चा समाप्त मानी जाएगी। संशोधनों पर निर्णय के बाद सभामुख नीति तथा कार्यक्रम बैठक में प्रस्तुत करेंगे।’





