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ट्रम्प और सी के दौर में ताइवान का भू-राजनीतिक महत्व

प्रशांत महासागर के पश्चिमी किनारे स्थित ताइवान एक छोटा द्वीप राष्ट्र है। यह देश पाँच दशकों से अधिक समय से संयुक्त राज्य अमेरिका और जनवादी गणराज्य चीन के बीच भू-राजनीतिक विवाद का केंद्र बना हुआ है। सन् 1972 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष माओ त्सेतुंग के बीच हुए समझौते से लेकर मई 2026 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के शिखर सम्मेलन तक, ताइवान दोनों महाशक्तियों के बीच कूटनीतिक संवाद में सबसे चुनौतीपूर्ण मुद्दा रहा है।

1960 के दशक के अंत में चीन और सोवियत संघ के बीच वैचारिक मतभेद तीव्र हो गए थे। 1969 में हुई रक्तपातपूर्ण सैन्य झड़प ने अमेरिका को चीन के साथ वार्ता की मेज पर लाया। ताइवान का मुद्दा 1949 तक जाता है, जब च्यांग काई-शेक की राष्ट्रवादी सरकार ताइवान में शरण ले चुकी थी। अमेरिका ने ताइवान को वैध सरकार के रूप में मान्यता दी थी। माओ ने कहा था कि ताइवान के मुद्दे को सौ साल तक इंतजार किया जा सकता है, लेकिन सोवियत संघ के खतरे का सामना अभी करना जरूरी है।

1972 में निक्सन के चीन दौरे ने शीत युद्ध के कालीन मौन को तोड़ दिया। इस दौरे के बाद ताइवान ने संयुक्त राष्ट्र में अपनी सदस्यता खो दी और बीजिंग को चीन का आधिकारिक प्रतिनिधि मानकर सुरक्षा परिषद में स्थायी स्थान दिया गया। ट्रम्प के कार्यकाल में ताइवान का महत्व और बढ़ गया, जब अमेरिका ने ताइवान के साथ अपने सम्बंधों को अभूतपूर्व रूप से मजबूत किया। ताइवान ने अपनी सुरक्षा बजट बढ़ाते हुए ‘असिमेट्रिक युद्धनीति’ अपनानी शुरू कर दी।

मई 2026 में ट्रम्प और शी के शिखर सम्मेलन में ताइवान को ‘अमेरिका-चीन संबंधों का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा’ के रूप में केंद्र में रखा गया। शी ने चेतावनी दी कि यदि ताइवान के मुद्दे को सावधानीपूर्वक प्रबंधित नहीं किया गया तो संघर्ष फैल सकता है। ताइवान की सुरक्षा अमेरिका के लिए केवल लोकतंत्र की रक्षा नहीं, बल्कि आर्थिक और सैन्य प्रभुत्व का भी प्रश्न बन गई है। ताइवान को एक विशेष भू-राजनीतिक ‘फ्लैशपॉइंट’ के रूप में माना जाता है।