प्रश्नपत्र चुहावट विरोधी आंदोलन के नेता धर्मेन्द्र प्रधान ने उसी मुद्दे पर दिया इस्तीफा

सूचना सारांश
समीक्षा पश्चात निर्मित।
- भारत के शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने प्रश्नपत्र चुहावट प्रकरण में नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफा दिया है।
- 1997 में प्रश्नपत्र चुहावट विरोधी आंदोलन के दौरान पुलिस की लाठी चार्ज से घायल हुए प्रधान अब इस्तीफा मांगने वाले प्रदर्शन के केंद्र में हैं।
- विपक्षी दल इस्तीफे की मांग कर रहे हैं जबकि भाजपा इसे नई शिक्षा नीति का विरोध करार देकर राजनीतिक हमला बता रही है।
9 साउन, काठमांडू। विडम्बना यह है कि भारत के शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने एक समय प्रश्नपत्र चुहावट के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया था और पुलिस की लाठी चार्ज से घायल हुए थे, आज (शनिवार) उसी प्रश्नपत्र चुहावट मामले में नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया है।
इसी दौरान, उनके इस्तीफे की मांग करने वाले प्रदर्शनकारी छात्र भी पुलिस की लाठी चार्ज से घायल हुए हैं।
2021 में प्रकाशित ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ की एक खबर भारतीय मीडिया और सोशल मीडिया पर फिर से व्यापक रूप से वायरल हो रही है।
खबर के अनुसार, 1997 में ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय जे.बी. पटनायक के कार्यकाल में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) ने राज्य सचिवालय के सामने प्रश्नपत्र चुहावट के विरोध में प्रदर्शन किया था, जिसका नेतृत्व धर्मेन्द्र प्रधान ने किया था।
उस प्रदर्शन में पुलिस की लाठी चार्ज से वे स्वयं घायल हुए थे।
करीब 29 साल बाद, 20 जुलाई 2026 को धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए संसद की ओर मार्च कर रहे छात्र-युवाओं पर पुलिस ने लाठी चार्ज किया, जिसमें कई प्रदर्शनकारी घायल हो कर अस्पताल में भर्ती हुए।
उस समय के प्रदर्शन में शामिल और वर्तमान भुवनेश्वर स्थित राजा मधुसूदन देव कॉलेज के छात्र संघ अध्यक्ष प्रशांत राउत ने बीबीसी से बात करते हुए उस घटना की पुष्टि की है।
‘तब मैं एबीवीपी के भुवनेश्वर शाखा अध्यक्ष था और धर्मेन्द्र प्रधान राष्ट्रीय महासचिव थे,’ उन्होंने कहा, ‘जुलाई 1997 की तीसरी साप्ताह में प्लस-टू परीक्षा के प्रश्नपत्र चुहावट के खिलाफ सैकड़ों कार्यकर्ता विधानसभा के सामने प्रदर्शन कर रहे थे, जिसका नेतृत्व धर्मेन्द्र प्रधान ने किया था।’
राउत के अनुसार, 1988 से 1997 तक लगभग हर साल प्रश्नपत्र चुहते थे और इसे ‘प्रश्नपत्र चुहावट का दशक’ कहा जाता था।
उन्होंने बताया, ‘पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) को लाठी चार्ज का आदेश दिया। इस दौरान 64 कार्यकर्ता घायल हुए, जिनमें मैं और धर्मेन्द्र प्रधान भी शामिल थे।’
विद्यार्थी राजनीति से शुरू हुई यात्रा
धर्मेन्द्र प्रधान की राजनीतिक यात्रा दशकों पहले विद्यार्थी राजनीति से शुरू हुई थी।
उनका जुड़ाव बाल्यकाल से राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) की निकट छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) से था। उन्होंने तालचेर कॉलेज छात्र संघ की अध्यक्षता भी की थी।
बाद में वे उत्कल विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष पद के लिए चुनाव भी लड़े लेकिन एसएफआई के उम्मीदवार एवं वर्तमान बीजेडी के वरिष्ठ नेता अरुण साहू से हारे। उस चुनाव में धर्मेन्द्र तीसरे स्थान पर रहे जबकि दूसरा स्थान विद्यार्थी जनता दल की सिंधुज्योति त्रिपाठी का था।
त्रिपाठी ने धर्मेन्द्र को सामान्य छात्र बताया और कहा, ‘उम्मीदवार घोषित होने से पहले बहुत लोग उन्हें नहीं जानते थे, लेकिन विश्वविद्यालय में एबीवीपी का संगठन मजबूत था इसलिए उन्होंने अच्छा वोट प्राप्त किया।’
अरुण साहू बाद में बीजेडी के प्रमुख नेता और ओडिशा के उच्च शिक्षा मंत्री बने। उन्होंने प्रधान के इस्तीफे की मांग पर कहा, ‘हमारे नेता नवीन पटनायक ने कहा है कि उन्हें इस्तीफा देना चाहिए और मेरा भी यही मानना है।’
उन्होंने प्रधान की राजनीतिक उन्नति पर कहा, ‘भाजपा में कई निर्णय संघ के प्रभाव में होते हैं। धर्मेन्द्र संघ से लंबे समय जुड़े हैं इसलिए पार्टी और सरकार में उन्हें उच्च जिम्मेदारी मिली।’
राष्ट्रीय राजनीति में उदय
विश्वविद्यालय चुनाव हारने के बावजूद धर्मेन्द्र प्रधान की राजनीतिक प्रगति जारी रही।
1994–1997: एबीवीपी के राष्ट्रीय महासचिव
2004–2006: भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष
इसके बाद: भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव
उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक सहित अन्य राज्यों में पार्टी विस्तार में सक्रिय भूमिका
चुनावी सफर
2000: पाललहडा विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विधायक चुने गए
2004: देवगढ़ लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए
2012–2018: बिहार से राज्यसभा सदस्य
2018–2024: मध्य प्रदेश से राज्यसभा सदस्य
2014: नरेन्द्र मोदी सरकार में पेट्रोलियम राज्य मंत्री
2024: ओडिशा के संबलबपुर से लोकसभा सांसद चुने गए
अमित शाह से संबंधों पर चर्चा
प्रधान के सहपाठी सिंधुज्योति त्रिपाठी का दावा है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और जेपी नड्डा के साथ निकट संबंधों ने प्रधान के राजनीतिक उत्थान में मदद की है।
उनका कहना है कि जब अदालत ने अमित शाह के खिलाफ तड़ीपार आदेश जारी किया था, कतिपय दिन उन्हें धर्मेन्द्र प्रधान के तालचेर स्थित घर में देखा गया, जिसकी पुष्टि विश्वसनीय सूत्रों से मिली है, हालांकि इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं।

ओडिशा में भाजपा विस्तार
वरिष्ठ पत्रकार रूबेन बनर्जी के अनुसार धर्मेन्द्र प्रधान ओडिशा में भाजपा का संगठन विस्तार करने वाले प्रमुख नेता हैं।
2014 में केंद्र में मंत्री बनने के बाद प्रधान हर सप्ताहांत ओडिशा में स्थानीय कार्यकर्ताओं से मिलकर संगठन विस्तार में सक्रिय रहते थे, जिसे कुछ लोग मजाक में ‘वीकेंड पार्टी’ कहते थे।
प्रधान के पूर्व निजी सचिव संबित त्रिपाठी ने कहा, ‘वे राज्य भर के कार्यकर्ताओं को व्यक्तिगत रूप से जानते थे और केंद्र में होने वाले प्रभाव का उपयोग स्थानीय समस्याओं के समाधान में करते थे।’
इस्तीफे पर भाजपा की प्रतिक्रिया
प्रधान के समर्थकों का कहना है कि उनके इस्तीफे की मांग राजनीतिक है। भाजपा नेता सज्जन शर्मा ने कहा, ‘एनआईटी परीक्षा को बहाना बनाकर विपक्षी राजनीतिक कर रहे हैं। परीक्षा सफलतापूर्वक समाप्त हो चुकी है और छात्र सफल हो रहे हैं, इसलिए आंदोलन के पीछे केवल राजनीतिक उद्देश्य है।’
दूसरे नेता गोलक महापात्र ने कहा, ‘एनआईटी केवल बहाना है। असल असंतोष नई शिक्षा नीति से जुड़ा है। विपक्ष मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहा है लेकिन वे अपने शासनकाल (2019-2024) में ओडिशा में नौ बार प्रश्नपत्र चुहावट की घटनाओं को भूल गए हैं।’
(बीबीसी हिंदी से)





