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गुरु पूर्णिमा गुरु के सम्मान में मनाया जानेवाला एक पर्व है। वह गुरु आध्यात्मिक या प्राज्ञिक हो सकते हैं। मनुष्य के जीवन के आरंभ से ही गुरु का महत्वपूर्ण भूमिका और प्रभाव रहता है।
किसी भी व्यक्ति का सफल या असफल होना इस बात पर भी निर्भर करता है कि गुरु उसे कैसी शिक्षा देते हैं।
वे गुरु केवल औपचारिक शिक्षा देने वाले शिक्षक ही नहीं बल्कि कोई भी व्यक्ति हो सकता है।
“सफल जीवन के लिए मार्गदर्शन करने वाले व्यक्ति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने वाला दिवस गुरु पूर्णिमा है,” संस्कृतिकर्मी और प्राध्यापक माधवप्रसाद भट्टराई कहते हैं।
गुरु पूर्णिमा कब मनाई जाती है?
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विशेषतः हिंदू धर्मावलंबी आश्विन शुक्ल पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा के रूप में इसका आयोजन करते हैं।
हिंदू संस्कृति के प्रभाव और उसकी परंपरा को अपनाते हुए अन्य कुछ धार्मिक संप्रदाय भी नेपाल में गुरु पूर्णिमा मनाने का चलन रखते हैं।
इस वर्ष गुरु पूर्णिमा सोमवार को है और नेपाल सहित भारत तथा अन्य हिन्दू बहुल देशों में इस पर्व को धूमधाम से मनाया जा रहा है।
गुरु का सम्मान करने का सबसे उपयुक्त दिन
पौराणिक मतों के अनुसार गुरु पूर्णिमा वेद व्यास का जन्मदिन भी माना जाता है। कुछ जानकार कहते हैं कि गुरु पूर्णिमा उन्हीं के सम्मान में मनाई जाती है और इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
कुछ हिंदू शास्त्रों में गुरु पूर्णिमा के दिन महान ऋषि वेद व्यास ने चार वेदों की रचना की मानी जाती है, इसलिए उन्हें व्यास नाम मिला।
प्राचीन काल से नेपाल में गुरु की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
विशेषकर पूर्वी सभ्यताओं में गुरु को उच्च सम्मान और स्थान देने की परंपरा है।
यह परंपरा आधुनिक काल में भी ज्यों की त्यों जारी है।
एक अन्य पौराणिक विश्वास के अनुसार भगवान शिव ने गुरु पूर्णिमा के दिन से सात ऋषियों को योग सिखाना आरंभ किया था।
बौद्ध धर्मावलंबी भी गौतम बुद्ध की याद में गुरु पूर्णिमा मनाते हैं।
उनके अनुसार गौतम बुद्ध ने इसी दिन अपना पहला उपदेश दिया था।
आधुनिक गुरु पूर्णिमा
आजकल गुरु पूर्णिमा आधुनिक विद्यालयों में भी धूमधाम से मनाई जाती है।
इस दिन छात्र गुरु की महिमा का गान करते हैं, सम्मान करते हैं और उपहार देते हैं।
“वर्तमान में गुरु पूर्णिमा को आधुनिक तरीके से मनाने में कुछ सकारात्मक पहलें हुई हैं, लेकिन गुरु-शिष्य के पुराने सम्मान अब कम होता दिखाई देता है,” भट्टराई कहते हैं।
“आज के समाज में अधिकतर चीजों को आर्थिक नजरिये से देखा जाता है जिससे पूर्वी सभ्यता में गुरु-शिष्य की सांस्कृतिक परंपरा में बड़ा बदलाव आया है।”
ऐसे ही हिंदू परंपरा अनुसार जो गुरु गायत्री मंत्र सुनाते हैं उन्हें गुरु दक्षिणा देने की प्रथा होती है।
यदि गुरु से मिलना संभव न हो तो विभिन्न माध्यमों से याद करके बाद में गुरु दक्षिणा अर्पित करने का भी चलन होता है।





