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पशु अधिकारों की बजाय उत्पादन को प्राथमिकता देने वाले सरकार के विधेयक पर पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का विरोध

सरकार द्वारा प्रस्तुत ‘‘पशु सेवा तथा पशु कल्याण संबंधी विधेयक’’ के मसौदे पर पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने असहमति जताई है। उनका आरोप है कि यह विधेयक पशु अधिकार और कल्याण के स्थान पर केवल पशुपालन, उत्पादन, व्यापार एवं प्रशासनिक प्रबंधन पर केंद्रित है। पशु कल्याण को कानूनी आधारभूत उद्देश्य बनाने की मांग करते हुए पशु अधिकारवादी ने उत्पादन-केंद्रित व्यवस्था को प्राथमिकता देने का विरोध किया है। साथ ही, उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार पृथक, स्वतंत्र एवं समग्र पशु कल्याण कानून बनाने का सरकार से आग्रह किया है।

पशु कल्याण संबंधी कानून का आधार अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त ‘‘फाइव फ्रीडम्स’’ है, जिसमें पशु को भूख और प्यास से मुक्ति, असुविधाजनक परिस्थितियों तथा पीड़ा से मुक्ति, रोग और चोट से सुरक्षा, स्वाभाविक व्यवहार करने की स्वतंत्रता एवं भय और तनाव से मुक्ति सुनिश्चित करने की बात शामिल है। यह जानकारी स्नेहा केयर की संस्थापक स्नेहा श्रेष्ठ ने दी। लेकिन वर्तमान विधेयक में इन मूलभूत सिद्धांतों को शामिल नहीं किया गया है। पशु कल्याण के मूल दर्शन की उपेक्षा करते हुए तैयार यह विधेयक पशु हितों की संपूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाएगा, ऐसा श्रेष्ठ का तर्क है।

पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने सड़क पर मौजूद सामुदायिक कुत्ते और बिल्लियों के मानवीय प्रबंधन, रेबीज नियंत्रण हेतु टीकाकरण अभियान, उद्धार, उपचार, पुनर्स्थापन और पुनर्वास जैसे विषयों में स्पष्ट कानूनी आधार न देने की आलोचना की है। इसके अतिरिक्त, सड़क पर छोड़े गए गाय एवं परित्यक्त पशुओं के संरक्षण, प्रबंधन और उनकी जिम्मेदारी किसकी होगी इस पर उचित व्यवस्था नहीं होने का आरोप भी लगाया गया है। स्थानीय तह, प्रदेश व संघीय सरकार के मध्य ऐसे पशुओं के संरक्षण व प्रबंधन की जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं होने की बात भी उन्होंने कही है।

पशुओं के प्रति क्रूर व्यवहार को लेकर भी पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने असहमति जताई है। कुटपिट, जहर देने, यातना देने, अमानवीय परिवहन या अन्य किसी प्रकार के दुर्व्यवहार को अपराध के रूप में स्पष्ट रूप से परिभाषित न किए जाने तथा इसके लिए कठोर दंड, जुर्माना, कैद एवं प्रभावी कार्यान्वयन व्यवस्था की आवश्यकता को विधेयक में नजरअंदाज किए जाने की उन्होंने आलोचना की है।