
समाचार सारांश
प्रौद्योगिकी और एआई के युग में छात्रों को सही सूचना पहचानने और उसका विवेकपूर्ण उपयोग करने का मार्गदर्शन देना आवश्यक है।
- प्रौद्योगिकी और एआई के युग में छात्रों को सही सूचना पहचानने और उसका विवेकपूर्ण उपयोग करने का मार्गदर्शन देना आवश्यक है।
प्रकृति के नियम भिन्न हैं। प्रकृति के साथ मित्रता कायम करने पर ही जीवन सहज होता है, अन्यथा प्रकृति अपना मार्ग स्वयं तय करती है। यह सत्य है। इसी प्रकार हमारे संतान भी प्रकृति के अंग हैं।
उन्हें केवल किताबों का ज्ञान ही नहीं, बल्कि प्रकृति के अनुकूल मूल्य, संस्कार और उपयोगी शिक्षा देना प्रत्येक अभिभावक एवं शिक्षण संस्थान की जिम्मेदारी है।
शिक्षण पेशे और पिछले चार दशकों के अनुभव से मैंने एक बात समझी है। जीवन का एक महत्वपूर्ण समय बाल्यावस्था से युवा अवस्था तक पार करते हुए मैं अब एक जिम्मेदार माँ और शिक्षिका की भूमिका में हूँ।
हम जो शिक्षा और संस्कार प्राप्त करते हैं, उसके आधार पर अब भविष्य के निर्माणकर्ता (हमारे संतान) को क्या और कैसा बनाना है, यह प्रश्न उठता है। शिक्षक और शिक्षण संस्थाओं की जिम्मेदारी तो है, लेकिन घर-परिवार से मिलने वाले मूल्य और संस्कार उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हैं।
आज की पीढ़ी प्रौद्योगिकी और एआई के युग में हैं। इंटरनेट अधिकांश घरों में पहुंच चुका है। इसलिए छात्रों को ज्ञान अर्जित करने के लिए केवल अभिभावक या शिक्षक का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। मुख्य आवश्यकता है ज्ञान के सही स्रोत खोजने और उसका सही उपयोग करने की।
धन-संपत्ति केवल जीवन यापन के साधन हैं। अभिभावकों को धन-संपदा की दौड़ से समय प्रबंधन कर अपने संतान के भविष्य की देखभाल करनी चाहिए।
प्रेम, अपनत्व, खुला संवाद और एक-दूसरे की परवाह करने की प्रवृत्ति संतान को करीब लाती है। उज्जवल भविष्य बनाने की जिम्मेदारी भी अभिभावकों की ही है।
कितनी भी वैभव और सुख-शांति हो, यदि संतान सही मार्ग पर नहीं है, तो वे सभी मूल्य शून्य हो जाते हैं। जैसे मिट्टी के झरोकों को आकार दिया जाता है, वैसे ही अभिभावकों को अपने बच्चों का सही आकार देने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। सफल अभिभावक बनने के लिए न्यूनतम कर्तव्यबोध आवश्यक है।
कहावत है – ‘संगत का फल गुण होता है।’ घर का वातावरण, समाज और मित्र संतान को किस मार्ग पर ले जाते हैं, यह निर्धारित करते हैं। धूम्रपान, मद्यपान और नशीली दवाइयों जैसी चुनौतियाँ भी हो सकती हैं।
इसलिए निगरानी की मुख्य जिम्मेदारी अभिभावकों के कंधों पर होती है, बाकी जिम्मेदारी शिक्षण संस्थानों की।
घर का उचित वातावरण और सही संस्कार पाना संतान का अधिकार है। पढ़ाई, लेखन और अधिकारों की रक्षा करते हुए उज्जवल भविष्य बनाने की जिम्मेदारी अभिभावकों और शिक्षण संस्थाओं की ही है।
शिक्षण संस्थानों की शिक्षा महत्वपूर्ण होते हुए भी घर से मिलने वाले संस्कार और मूल्य ही चरित्र निर्माण की मुख्य नींव हैं। एआई और इंटरनेट के युग में बच्चों को सूचना की कमी नहीं है, लेकिन सही और गलत की पहचान करना और तकनीक का सही उपयोग सिखाना आवश्यक है।
(लेखक पूजा खड़का, गोरखा मॉडल सेकेंडरी स्कूल, लमही-६, दाङ में कार्यरत शिक्षिका हैं।)





