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सुरंग उद्धार १७ दिन बीतने के बाद भी चुनौतीपूर्ण, जीवन की आशा बनी हुई है

समाचार सारांश

संपादकीय समीक्षा एवं तैयार किया गया।

  • भोटेकोशी बाढ़ के बाद रसुवा, नुवाकोट और धादिंग के जलविद्युत परियोजनाओं के ९१६ कर्मचारी संपर्क विहीन हैं, १३ परियोजनाएं और पाँच सोलर प्लांट प्रभावित हुए हैं।
  • आरडिएनए रिपोर्ट के अनुसार ऊर्जा और ग्रिड प्रणाली पुनर्स्थापना में ३ खरब ९० अरब ६२ करोड़ ३० लाख ४० हजार रुपये की आवश्यकता है।
  • सुरंग और भूमिगत विद्युत गृह में फंसे लोगों की खोज और बचाव नेपाली सेना, पुलिस, परियोजना टीम और विदेशी विशेषज्ञों के संयुक्त प्रयास से जारी है।
  • ऊर्जा मंत्रालय ने भोटेकोशी घटना के बाद डिजाइन गाइडलाइन और सुरक्षा प्रोटोकॉल सुधारने की योजना बनाई है।

२६ भाद्र, काठमाडौं। भाद्र १० गते भोटेकोशी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ ने रसुवा, नुवाकोट और धादिंग के जलविद्युत परियोजनाओं को व्यापक नुकसान पहुंचाया है। बाढ़ ने न केवल परियोजनाओं की संरचनाओं को क्षति पहुंचाई बल्कि सैकड़ों कर्मियों को भी सम्पर्क विहीन कर दिया है।

स्वतंत्र ऊर्जा उत्पादक संस्थान नेपाल (इपान) द्वारा संकलित जानकारी के अनुसार, जलविद्युत परियोजनाओं में कार्यरत ९१६ लोग सम्पर्क विहीन हैं। बाढ़ के १७ दिन बीत जाने के बाद भी कुछ लोग अभी तक लापता हैं और सुरंग में फंसे लोगों की खोज एवं बचाव कार्य अभी पूरा नहीं हो पाया है।

राष्ट्रीय योजना आयोग और राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा तैयार किए गए त्वरित क्षति और आवश्यकताओं के आकलन (आरडिएनए) रिपोर्ट में ऊर्जा क्षेत्र को बड़े पैमाने पर क्षति होने का संकेत मिला है।

प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार, ७५९ मेगावाट क्षमता की १३ जलविद्युत परियोजनाएं और २४ मेगावाट क्षमता के पाँच सोलर प्लांट प्रभावित हुए हैं। ऊर्जा और ग्रिड प्रणाली के पुनर्स्थापन के लिए ३ खरब ९० अरब ६२ करोड़ ३० लाख ४० हजार रुपये की आवश्यकता बताई गई है।

हालांकि, भौतिक संरचनाओं की तुलना में सबसे संवेदनशील मुद्दा अब भी वही है — सुरंग और भूमिगत पावरहाउस में फंसे व्यक्तियों की खोज और उद्धार।

रास्ते की कमी से उपकरण पहुंचाने में मुश्किल

ऊर्जा, जलस्रोत और सिंचाई मंत्रालय के सहसचिव सुनिल पौडेल के अनुसार, उद्धार में सबसे बड़ी चुनौती सुरंग तक पहुंच और आवश्यक उपकरणों को स्थल तक ले जाना है।

बाढ़ से सड़कें और पहुंच संरचनाएं क्षतिग्रस्त होने के कारण भारी और जटिल उपकरणों को मौके तक पहुंचाना मुश्किल है। हेलीकॉप्टर से सभी उपकरण ले जाना सहज नहीं होने के कारण बचाव कार्य प्रभावित हुआ है।

पौडेल ने कहा, ‘‘वहां रास्ता न होने और हेलीकॉप्टर के उपकरण ले जाने में असमर्थता के कारण उद्धार में बड़ी चुनौतियाँ आ रही हैं।’’

वर्तमान में आवश्यक उपकरण परियोजना स्थल तक पहुंचाने का कार्य चल रहा है। नेपाली सेना उद्धार कार्य का नेतृत्व कर रही है, साथ ही नेपाल पुलिस, सशस्त्र पुलिस, परियोजना के तकनीशियन, विदेशी विशेषज्ञ तथा स्वयंसेवक भी परिचालित हैं।

उद्धार में उपयोग किए गए उपकरणों में तकनीकी समस्याओं के कारण कार्य में देरी भी हुई है। उदाहरण के तौर पर एक एक्सकैवेटर के दांत खराब होने के कारण लगभग डेढ़ घंटे काम रुका था, लेकिन तुरंत व्यवस्था कर दी गई।

उन्होंने कहा, ‘‘जटिल उपकरणों के कारण कुछ पार्ट्स बाहर से मंगाने पड़ते हैं, जबकि कुछ स्थानीय स्तर पर मिल जाते हैं, हम समन्वय और प्रबंधन कर रहे हैं।’’

अपर त्रिशूली-१ परियोजना निर्देशक गिरिराज अधिकारी ने बताया कि सबसे अधिक लोग जिन परियोजनाओं में संपर्क विहीन हैं, उनमे से एक भी अभी तक भारी उपकरण नहीं पहुंचा पाने के कारण पूरी तरह उद्धार कार्य सफल नहीं हो पाया है। गुरुवार को ही एक मिनी एक्सकैवेटर लाया गया।

उन्होंने कहा, ‘‘उद्धार कार्य बेहद कठिनाईपूर्ण है। सड़क पूरी तरह नष्ट हो चुकी है, पुल नहीं हैं, इंटरनेट सेवाएं बाधित हैं, बचाव सुरंग इलाका बिजली रहित है, बचाव दल हर दिन रसुवा के मुख्यालय धुन्चे वापस लौटता है।’’

सुरंग के भीतर स्थिति सबसे बड़ी चुनौती

जियोटेक्निकल इंजीनियर उदयराज न्यौपाने ने कहा है कि सुरंग उद्धार एक ही तरीके से नहीं हो सकता। सुरंग के अंदर स्थित परिस्थितियां जैसे पानी, कीचड़, पत्थर, लकड़ी और अन्य बाधाएं हर बार रणनीति बदलने पर मजबूर करती हैं।

माथिल्लो त्रिशूली-३ ‘ए’ के भूमिगत संरचना में फंसे दो तकनीशियनों को बचाने में टीम को बार-बार योजना बदलनी पड़ी, यह उनका अनुभव है।

उन्होंने कहा, ‘‘प्राविधिक तौर पर एक तरीके से समाधान नहीं हो तो दूसरा तरीका अपनाना पड़ता है। जैसे ही स्थिति बदलती है, नए तरीके और उपकरणों का उपयोग जरूरी हो जाता है।’’

उद्धार के लिए उपकरणों की उपस्थिति मात्र पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें वास्तविक परिस्थितियों से कैसे मेल खाया जाए, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

विदेशी विशेषज्ञ जो जियोलॉजिकल प्रोबिंग रडार (जीपीआर) जैसी तकनीकें इस्तेमाल करते हैं, वे सीमित गहराई तक ही प्रभावी होती हैं, इसलिए 100 मीटर से अधिक गहराई में स्थित संरचना या व्यक्ति को जीपीआर खोज नहीं पाता।

उन्होंने कहा, ‘‘जहां तकनीक उपलब्ध नहीं है, वहां की स्थिति के अनुसार तकनीक, उपकरण और सोच का संयोजन मजबूत होना चाहिए।’’

उद्धार के दौरान माथिल्लो त्रिशूली-३ ‘ए’ में ११२ मीटर ड्रिलिंग करनी पड़ी, जिसके लिए अन्ततः एक और उपकरण की आवश्यकता पड़ी। यदि बड़ा क्षमता वाला हेलीकॉप्टर उपलब्ध होता तो बड़े उपकरण आसानी से ले जाया जा सकता था।

अभी कहां-कहां खोज जारी है?

नेपाली सेना के अनुसार विभिन्न परियोजनाओं के सुरंगों में खोज और उद्धार कार्य जारी है। रसुवागढ़ी जलविद्युत परियोजना में कम्पोजिट क्विक रिएक्शन टीम और परियोजना प्रतिनिधियों के साथ संयुक्त टीम पावरहाउस, ट्रांसफॉर्मर रूम और कंट्रोल प्वाइंट तक पहुंचकर सर्च कर रही है।

लांगटांग हाइड्रो में नेपाली सेना का २५ सदस्यीय दल सुरंग के अंदर खोज में लगा हुआ है। चिलिमे हाइड्रो में विदेशी विशेषज्ञों सहित टीम सुरंग के अंदर की कीचड़ निकालने का काम कर रही है। आवश्यक उपकरण पहुंचाने के लिए ब्लास्टिंग कर रास्ता बनाया जा रहा है, अभी सुरंग तक पहुँचने के लिए लगभग ३५ मीटर दूरी बाकी है।

माथिल्लो त्रिशूली-१ के हाकुबेँशी में एक सुरंग में नेपाली सेना की टीम खोज कर रही है। त्रिशूली-३ ‘बी’ के पावरहाउस और सुरंग क्षेत्र में संयुक्त टीम परिचालित है, तथा त्रिशूली-३ ‘ए’ में भी संयुक्त टीम खोज जारी रखे हुए है।

यह दिखाता है कि उद्धार में राज्य सुरक्षा एजेंसियां, परियोजना संबंधित विभाग और निजी व विदेशी विशेषज्ञ मिलकर काम कर रहे हैं। हालांकि, घटना स्थल की कठिन भौगोलिक स्थिति और सुरंग के अंदर अनिश्चय ने खोज की गति अपेक्षा से कम कर दी है।

‘उद्धार में प्रशिक्षित एवं अभ्यासशील दल की जरूरत’

उदयराज न्यौपाने के अनुसार सुरंग उद्धार के लिए विशेष प्रशिक्षण प्राप्त संगठित जनशक्ति की आवश्यकता स्पष्ट हुई है। तकनीकी ज्ञान के साथ विपरीत परिस्थितियों में मानसिक तैयार, टीम वर्क और एकाग्रता अनिवार्य हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘उद्धार में अभ्यास करने वाले ज्यादा लोग जरूरी हैं। ऐसे स्थानों पर जाने के लिए मानसिक रूप से तैयार होना चाहिए। पर्सन, टीमवर्क और एक ही लक्ष्य जरूरी हैं।’’

उनका कहना है कि केवल आपदा के बाद उपकरण और मानवशक्ति खोजने पर उद्धार में और समय लग सकता है। इसलिए नेपाल में उपकरणों की उपलब्धता, क्षमता और परिचालन विधि पहले से जाननी चाहिए।

कुलमान घिसिङ: सामान्य बाढ़ के डिज़ाइन से इतनी बड़ी आपदा को नहीं रोक सकते

पूर्व ऊर्जा मंत्री तथा नेपाल विद्युत प्राधिकरण के पूर्व कार्यकारी निर्देशक कुलमान घिसिङ ने कहा कि भोटेकोशी में आई बाढ़ सामान्य बाढ़ से कहीं अधिक बड़ी और असाधारण घटना है।

उनका कहना है कि जलविद्युत परियोजनाओं के भूमिगत पावरहाउस आमतौर पर नदी सतह से ऊपर डिजाइन किए जाते हैं और संभावित बाढ़ की ऊंचाई का ध्यान रखा जाता है।

लेकिन इस बार आई बाढ़ बहुत बड़ी थी, जिसकी वजह से कई स्थानों पर सुरंग के मुख से ५० से १०० मीटर तक ऊपर पानी पहुंच गया।

घिसिङ ने कहा, ‘‘सामान्य बाढ़ के डिज़ाइन से यह आपदा समाहित नहीं हो सकती, यह सामान्य से ज्यादा बड़ी बाढ़ है।’’

इसी वजह से सुरंग मार्ग से पानी, कीचड़ और अन्य सामग्री भूमिगत संरचनाओं में घुस गई।

सुरंग के अंदर फंसे लोग जीवित हैं या नहीं?

घिसिङ ने कहा, ‘‘अगर सुरंग पूरी तरह पानी और कीचड़ से भरी नहीं है, तो कुछ जगहों पर हवा और ऑक्सीजन बची हो सकती है।’ इसलिए जब तक खोज पूरी नहीं होती, तब तक फंसे लोगों के मृत होने का निष्कर्ष निकालना गलत होगा।

उन्होंने कहा, ‘‘अगर सुरंग आधी भरी भी हो, तो जीवित रहने की संभावना रहती है।’’ हालांकि यह निर्भर करता है कि पानी और कीचड़ कहाँ तक पहुँचा है, लोग कहाँ थे और वहाँ कितनी हवा बची है।

मुख्य सुरंग बंद होने पर कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं

भोटेकोशी घटना ने जलविद्युत परियोजनाओं के भूमिगत हिस्सों के आकस्मिक निकासी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा किया है — आपात स्थितियों में वैकल्पिक निकास कितने ज्यादे हैं?

घिसिङ के अनुसार, कई परियोजनाओं में पावरहाउस तक पहुंचने वाला एक ही मुख्य सुरंग मार्ग होता है। अगर वही मार्ग अवरुद्ध हो जाए तो अंदर फंसे लोगों का बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।

इसलिए पावरहाउस और पहुंच सुरंग के डिजाइन में वैकल्पिक इमरजेंसी निकासों को अनिवार्य रूप से शामिल करना चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘‘इमरजेंसी एग्जिट के लिए एक अलग छोटा रास्ता या ऊपर की तरफ वैकल्पिक सुरंग बनाने का विचार करना होगा।’’

न्यौपाने ने भी कहा कि पहले से भेद्य और सुरक्षित स्थानों तथा वैकल्पिक मार्गों की पहचान होनी चाहिए।

उनके मुताबिक, माथिल्लो त्रिशूली-३ ‘ए’ पावरहाउस के ऊपरी हिस्से में बहुत बड़ा खाली क्षेत्र था, लेकिन वहां पहुंचने के रास्ते संकरे और सीधे थे, जिससे आसानी से पहुंचना संभव नहीं था।

यह दर्शाता है कि परियोजना के डिजाइन में केवल मशीन और उत्पादन क्षमता ही नहीं, बल्कि चरम संकट के दौर में मानव जीवन की सुरक्षा और निकासी का उपाय भी शुरू से शामिल होना चाहिए।

जलविद्युत परियोजनाओं के सुरक्षा डिज़ाइन में सुधार जरूरी

घिसिङ ने कहा कि भोटेकोशी के बाद बने और निर्माणाधीन दोनों परियोजनाओं की जोखिम पुनर्मूल्यांकन जरूरी है।

विशेषकर जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसमी घटनाएं, हिमताल और ग्लेशियर में बदलाव, ऊपर के जलाधारों में बनने वाली झीलें और उनसे होने वाली आकस्मिक जल प्रवाह की जोखिम मूल्यांकन में शामिल होनी चाहिए।

कई परियोजनाएं एक ही नदी बेसिन में होने के कारण एक परियोजना के जोखिम को अकेले देखना पर्याप्त नहीं, कुल नदी बेसिन में जोखिम मूल्यांकन जरूरी है।

घिसिङ ने कहा, ‘‘अब सिर्फ परियोजना को ही नहीं, बल्कि बड़ी आपदा में वहां काम कर रहे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने की व्यवस्था भी डिजाइन के प्रारंभिक चरण से शामिल करनी होगी।’’

उनके अनुसार पावरहाउस को धीरे-धीरे दूरस्थ संचालन (रिमोट ऑपरेशन) में ले जाया जा सकता है, नियमित संचालन और निगरानी बाहरी स्थान से हो सकेगी और भूमिगत संरचना में मानव उपस्थिति कम होगी।

लेकिन मरम्मत के लिए इंसानों को अंदर जाना जरूरी होगा, इसलिए इमरजेंसी निकासी, ऑक्सीजन, संचार व्यवस्था और सुरक्षित क्षेत्र का प्रबंध अनिवार्य होना चाहिए।

मंत्रालय सुधार की दिशा में

ऊर्जा मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि भोटेकोशी घटना ने उद्धार प्रणाली और जलविद्युत परियोजनाओं के सुरक्षा मानकों में सुधार की जरूरत जताई है। सहसचिव पौडेल के अनुसार मंत्रालय ऐसी घटनाओं से मिले सबक को लेकर डिजाइन गाइडलाइन और सुरक्षा प्रोटोकॉल सुधारने की तैयारी कर रहा है।

पौडेल ने कहा, ‘‘इस बदलाव को केवल परिवर्तन नहीं, बल्कि सुधार (रिफॉर्म) कहा जाता है।’’

वे आगे बताते हैं कि आपदा के बाद उद्धार में आए समस्याओं, परियोजनाओं के डिज़ाइन की कमजोरियों और भविष्य में अपनाए जाने वाले सुरक्षा उपायों का अध्ययन सरकारी संस्थान, विश्वविद्यालय, इसिमोड सहित विभिन्न संस्थाओं के साथ मिलकर किया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ता भी इस विषय पर अध्ययन कर रहे हैं।

इस अध्ययन का उद्देश्य भोटेकोशी घटना की वजह और घटना को समझना ही नहीं, बल्कि ऐसी आपदाओं के पुनरावृत्ति पर नुकसान को कम करने के वैज्ञानिक आधार तैयार करना भी है।

पौडेल ने कहा, ‘‘जानने से कि ऐसा क्यों हुआ और भविष्य में इसे कैसे रोका जाए, बेहतर तैयारी की जा सकती है।’’