
६ असोज, काठमांडू। चीन में पूंजीवाद के विस्तार के साथ पिछड़ गया मार्क्सवादी अर्थशास्त्र अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) क्रांति के कारण पुनः सक्रिय हुआ है। ग्रीस के पूर्व वित्त मंत्री और फudan विश्वविद्यालय के वरिष्ठ शोधकर्ता यानिस भारोउफाकिस के अनुसार, कुछ साल पहले तक चीन के शीर्ष विश्वविद्यालयों में मार्क्सवाद को केवल औपचारिकता के रूप में ही देखा जाता था। परन्तु अब एआई और रोबोटिक्स के तेज विकास ने चीनी मार्क्सवादी अर्थशास्त्रियों को नई ऊर्जा और वैचारिक शक्ति प्रदान की है।
चीनी मार्क्सवादी लंबे समय से चिंतित थे कि देश पूंजीवादी दिशा में बढ़ रहा है, जिससे उत्तर अटलांटिक अर्थव्यवस्थाओं की तरह ‘रेन्ट ट्रैप’ (जहां निवेश उत्पादक क्षेत्रों से हटकर जमीन या संपत्ति की कीमतों में वृद्धि पर केंद्रित हो जाता है) में फंस सकता है। उत्पादन क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ने और मुनाफे की दर घटने के कारण निवेशक कम जोखिम पर अधिक लाभ देने वाले अचल संपत्ति एवं वित्तीय क्षेत्रों की ओर आकर्षित होते हैं। इससे उद्योग त्वरित अवसान की ओर बढ़ते हैं और देश की औद्योगिक नींव कमजोर होती जाती है। चीन की बड़ी हाउसिंग कंपनी एवरग्रांडे का पतन भी कई लोग इस तरह के ‘रेन्ट ट्रैप’ का संकेत मानते हैं। हालांकि, चीनी सरकार ने हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर और एआई जैसे क्षेत्रों में रणनीतिक निवेश कर इस संकट को टालने का प्रयास किया है, जैसा कि सरकारी विद्वानों द्वारा दावा किया गया है।
फिर भी मार्क्सवादी अर्थशास्त्रियों की अलग चिंता थी। २०२५ की शुरुआत में कुछ अर्थशास्त्रियों ने चीन के विशाल व्यापार अधिशेष (ट्रेड सरप्लस) को चीनी और पश्चिमी दोनों वर्गों के श्रमिकों के खिलाफ वर्ग संघर्ष का परिणाम बताया। चीन के लगभग १७० खरब युआन (लगभग २५ खरब अमेरिकी डॉलर) की बचत यदि केवल संपत्ति खरीद में लगाई जाती है तो चीन ‘रेन्ट ट्रैप’ से बाहर नहीं निकल पाएगा। दूसरी ओर, यदि यह राशि विकासशील देशों में निवेश की जाती है, तो चीन भी पश्चिमी देशों की तरह अन्य देशों से लाभ कमाने वाला ‘रेन्टियर’ राष्ट्र बनने का जोखिम मोल ले सकता है।




