विपद् जोखिम के बीच रसुवा-नुवाकोट क्षेत्र में श्रमिक कैसे आकर्षित होते रहे और अब क्या होगा?

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रसुआ के स्याफ्रूबेंशी में सड़क मजदूर के रूप में पांच वर्षों तक काम करने वाले जाजरकोट के हिर्दबहादुर पुन ने बताया कि वे “बड़े खतरे से बच गए”।
बीते भाद्र 10 तारीख को विनाशकारी बाढ़ से कुछ समय पहले वह पांच दोस्तों के साथ मोबाइल चार्ज करने अपने कैंप की ओर गए थे।
उन्होंने बताया, “जैसे ही हम कैंप के बाहर पहुंचे, बम फटने जैसी तेज धमाके की आवाज़ आई। बिना कुछ सोचे हम सीधे ऊपर चढ़ गए। कैंप अचानक पानी में डूब सी गया।”
उनके कार्य क्षेत्र में लगभग 75 कामगार थे। उन्होंने बताया, “अगर हम बीस कदम ऊपर नहीं जाते तो बाढ़ हमें भी बहा लेती। हममें से छह को छोड़ बाकी सभी की मौत हो गई।”
इस विनाशकारी बाढ़ से जलस्रोत, पर्यटन, सड़क नेटवर्क समेत विभिन्न क्षेत्रों को भारी नुकसान हुआ है। प्रभावित इलाकों में आवास और रोजगार के अवसर भी खत्म हो गए हैं।
रोजगार के लिए एक प्रमुख केंद्र
नेपाल-चीन सीमा व्यापार, पर्यटन, जलविद्युत परियोजनाएं और सड़क निर्माण के कारण यह क्षेत्र रोजगार के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित हो रहा था।
नेपाल हिमालय सीमापार व्यापार संघ के अध्यक्ष रामहरी कार्की के अनुसार, दसियों हजार लोग इस सीमा पर रोजगार पर निर्भर थे।
उन्होंने कहा, “एक कामगार के साथ आठ-दस लोग काम करते हैं। रोजगार के लिहाज से 5-7 हज़ार सीधे तौर पर इस क्षेत्र में काम कर रहे थे।”
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विपदा से सबसे अधिक प्रभावित रसुआ और नुवाकोट में 12 जलविद्युत परियोजनाओं और एक सौर ऊर्जा परियोजना को भारी नुकसान हुआ है, अफसरों ने बताया।
कुछ परियोजनाएं संचालन में थीं और कुछ निर्माणाधीन, जिनमें नेपाली, विदेशी और भारतीय श्रमिक कार्यरत थे।
जलविद्युत क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिक टनल और पावर हाउस में फंसे हो सकते हैं, इस आशंका के कारण अधिकारी खोज जारी रखे हुए हैं।
स्वतंत्र ऊर्जा उत्पादक संस्था (इप्पान) के पूर्व अध्यक्ष गणेश कार्की कहते हैं, “वहाँ अत्यधिक कुशल नेपाली और विदेशी कामगार काम कर रहे थे। यह जनशक्ति की हानि बड़ी क्षति है। इसे पूरा करना संभव नहीं है।”
विपदा का स्थायी प्रभाव दिखने वाला क्षेत्र
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रसुआगढ़ी और आसपास के इलाके में भारी प्राकृतिक आपदा कोई नई बात नहीं है। पिछले साल हिमताल विस्फोट के बाद नेपाल-चीन सीमा के लेंडे नदी में बाढ़ आई जिसमें 18 की मौत हुई और 6 अरब से अधिक का नुकसान हुआ।
2015 के शक्तिशाली भूकंप का केंद्र सिंधुपाल्चोक था, जिन्होंने कोदारी नाका और आस-पास के क्षेत्र को भारी क्षति पहुंचाई थी।
उस भूकंप में देश के अनेक जिलों और राजधानी क्षेत्र से 9000 से अधिक व्यक्तियों का जीवन खत्म हो गया।
2015 के भूकंप के बाद नेपाल-चीन व्यापार धीरे-धीरे रसुआगढ़ी नाके की ओर खिसका। रोजाना सैंकड़ों मालवाहक कंटेनर इस व्यपारिक नाके से आते-जाते थे, जिसमें व्यापारियों ने लगभग 200 कंटेनर बहने की बात कही है।
श्रम विशेषज्ञ मीना पौडेल ने बताया कि नजदीकी श्रम बाजार सिकुड़ने से रसुआ और आसपास के क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों ने लोगों के लिए एक सरल विकल्प प्रदान किया।
उन्होंने कहा, “नेपाल में राजनीतिक पहुंच ने श्रम बाजारों की ओर ध्यान नहीं दिया। इसलिए जब नजदीकी बाजार सिकुड़ गए, तो लोग जहां भी मौका मिला, वहां काम खोजने लगे। इस क्षेत्र में बड़ी राष्ट्रीय महत्व की जलविद्युत परियोजनाएं थीं, जिनने देशव्यापी रोजगार दिया।”
नेपाल-चीन आयात-निर्यात और राजधानी के नजदीक कृषि क्षेत्र होने की वजह से श्रम बाजार मजबूत हुआ, उन्होंने बताया।
लेकिन उन्होंने कहा, “लेकिन अब वह स्थिति एक महीने पहले जैसी नहीं हो सकती। अपने रिश्तेदार खोने और श्रमिकों के लापता होने से आत्मविश्वास बनाना कठिन है। अब हम अपने परिजनों से कहा नहीं सकते कि जलविद्युत परियोजनाओं में काम करने जाओ। और दूसरे क्षेत्रों से श्रमिक आने की संभावना भी कम है।”
क्या श्रम बाजार फिर पहले जैसा हो सकेगा?
स्वतंत्र ऊर्जा उत्पादक संस्था (इप्पान) के पूर्व अध्यक्ष गणेश कार्की ने बताया कि यह हाल की बाढ़ सामान्य नहीं थी। भविष्य में ऐसे आपदाएं और भी जोखिम ला सकती हैं।
उन्होंने कहा, “यह हजारों वर्षों में एक बार होने वाला हादसा है। नई परियोजनाओं के निर्माण में सुरक्षा मानकों को कड़ा करना होगा। एक निश्चित रेड जोन तय किया जाना चाहिए। बाढ़ से होने वाली आर्थिक हानि वापस लाई जा सकती है, लेकिन खोए हुए तकनीकी जनशक्ति की भरपाई असंभव है।”
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व्यापारी कहते हैं कि पहाड़ फाड़ कर आने वाली इस बड़ी प्राकृतिक आपदा की कल्पना भी मुश्किल थी। वे सरकार से नेपाल-चीन व्यापार नाका पुनर्स्थापित करने की मांग कर रहे हैं।
नेपाल-चीन सीमा पार व्यापार संघ के अध्यक्ष रामहरी कार्की कहते हैं, “अगर राज्य रसुआ नाका पर परिवहन को सुगम बनाएगा तो श्रम और व्यवसाय पहले जैसा लौट आएगा।”
उन्होंने कहा, “हमारे और चीन के भूगोल समान हैं। ये नाके पूरे साल संचालित हो सकते हैं। हमें 20 साल तक यहां से मार्ग कहीं भी बिगड़ा नहीं चाहिए। अब हमें खुद सड़क बनानी पड़ेगी नहीं तो चीन से सहायता लेनी पड़ेगी। विकल्प के तौर पर दोलखा का लामा बगर रास्ता बनाया जा सकता है। 3 किलोमीटर सड़क का निर्माण कर एक और नाका जोड़ा जा सकता है।”
कर विभाग के आंकड़ों के अनुसार पिछले आर्थिक वर्ष में रसुआ नाका से 45 अरब रुपए से अधिक का सामान नेपाल भेजा गया था।
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बाढ़ के कारण पिछले वर्ष छह महीने के लिए बंद रहने वाला नाका इस वर्ष बाढ़ आने से पहले ही 7 अरब रुपए से अधिक राजस्व एकत्रित कर चुका था, कर विभाग ने बताया।
चीन ने भी द्विपक्षीय व्यापार को महत्व देते हुए बाढ़ प्रभावित क्षेत्र पुनर्निर्माण के लिए सरकार को 7 खरब 23 अरब रुपए की आवश्यकता बताई है, लेकिन कितना स्रोत मिलेगा यह अभी अनिश्चित है।
जाजरकोट के हिर्दबहादुर पुन अब रोज़गार के लिए रसुआ लौटने के इच्छुक नहीं हैं। उन्होंने कहा, “अगर मोबाइल चार्ज करने न जाते तो बच सकते थे। अब गाँव में ही कुछ करके जीविकोपार्जन करना होगा।”
“बड़ी आपदा से बच गए, यह लगता है, फिर भी अब क्या करें, सोच नहीं पा रहे। दिमाग भी ठीक से काम नहीं कर रहा।”
“खाली हाथ गांव लौटे हैं, अब गुजारा कैसे चलाएँ, नहीं पता,” उन्होंने जोड़ा।
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