जेन जेड आंदोलन: कुछ मामलों को वापस लेने की सिफारिश तैयार, आगे की प्रक्रिया क्या होगी?

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एक साल पहले हुए जेन जेड आंदोलन के बाद कुछ प्रदर्शनकारियों पर चल रहे मामलों को वापस लेने की सिफारिश सरकार द्वारा गठित समिति के संयोजक ने दी है।
समिति अपनी राय के साथ एक रिपोर्ट तैयार कर गृह मंत्री सुधन गुरुङ को सौंपने की तैयारी में है।
समिति के संयोजक, उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश बाबुराम रेग्मी ने कहा कि कानून की छूट वाले “कुछ मामलों” में मुकदमे वापस लेने की सिफारिश की गई है।
“हम अपनी कानूनी व्यवस्था को आधार बना कर रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे,” उन्होंने कहा।
समिति के मुताबिक 33 जिलों में 1887 लोगों के खिलाफ 445 मामले चल रहे हैं। इनमें कुछ फरार हैं, कुछ जेल में हैं और कुछ जमानत या तारीख पर छूटे हुए हैं।
पिछले साल भदौ 23 और 24 को जेन जेड आंदोलन पूरे देश में हुआ था। आंदोलन ने भ्रष्टाचार नियंत्रण, सुशासन और नातावाद के आधार पर दी जा रही सुविधाओं को समाप्त करने की मांग की थी।
भदौ 23 के प्रदर्शन में पुलिस की गोलीबारी में कई युवा मारे गए, जिसके बाद भदौ 24 को प्रदर्शन और भी उग्र हो गया जिसमें आगजनी, तोड़-फोड़, लूटपाट और सुरक्षा बलों पर हमले हुए। अधिकारियों ने कहा कि जांच कर आरोपितों पर मुकदमे चलाए गए।
“यहां तीन-चार प्रकार के मामले हैं – व्यक्तिगत संपत्ति को नुकसान, कुछ व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को नुकसान, और सरकारी संस्थानों को भी क्षति पहुंची,” रेग्मी ने बताया।
“कुछ मामलों को वापस लेने का कानून है, सर्वोच्च न्यायालय के उदाहरण हैं, हमारा प्रचलन भी है। ये सब ध्यान में रखकर हम रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे।”
पहले पुलिस ने भदौ 24 की घटनाओं में 13 विभिन्न अपराधों के तहत मुकदमे चलाने की जानकारी दी थी।
इनमें हत्या, हथियार रखरखाव, अभद्र व्यवहार, हत्या की तैयारी, डकैती और चोरी, कारागार कानून, आगजनी और तोड़-फोड़ शामिल थे।
रेग्मी के अनुसार 50 से अधिक मामलों में अदालत ने फैसला सुना दिया है। उन्होंने कहा कि कुछ प्रदर्शनकारियों के लिए सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति की आमाफी की संभावना रिपोर्ट में सुझाई गई है।
‘नए ने भी पुराने तरीके सीखे’
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सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश बलराम केसी ने कहा कि सरकार और नई पीढ़ी के नेताओं ने पुराने अभ्यास को जारी रखते हुए नया चरण सीख लिया है।
“यहां बहुत दुरुपयोग हुआ है। यह पहली सरकार नहीं है जिसने ऐसा किया है, पर नए लोग भी पुराने तरीके सीख गए हैं। लोगों का संगत बिगड़ता है,” केसी ने कहा।
पूर्व न्यायाधीश केसी के अनुसार जब अदालत से मुक्ति मिल चुकी हो तो सरकार को मामलों को वापस लेने का निर्णय पुनरावलोकन नहीं करना चाहिए।
“सरकार को असमान व्यवहार कर माफी देने या विपक्ष की सरकारों को बदनाम करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। यदि अदालत ने सफाई दी हो तो पुनरावलोकन नहीं होना चाहिए,” उन्होंने कहा।
लेकिन राष्ट्रपति द्वारा आमाफी देने और सजा माफ करने की प्रक्रिया विश्वभर में प्रचलित है, केसी ने बताया।
“फौजदारी न्याय प्रणाली त्रुटिमुक्त नहीं है, इसलिए सुधार के लिए सरकार आमाफी की सिफारिश करती है और राष्ट्रपति आमाफी देता है,” केसी ने कहा।
“ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में भी आमाफी देने की प्रक्रिया है। हमारे यहां अपने करीबों को माफ करने से स्थिति खराब हुई है।”
‘सभी मामले वापस नहीं होंगे’
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समिति ने सिफारिश की है, लेकिन अपराध न्याय प्रक्रिया संहिता और संबंधित कानून के अनुसार कुछ मामलों को वापस करने पर प्रतिबंध है।
कानून झूठे पासपोर्ट या नागरिकता, अप्रवास, भ्रष्टाचार, मानव तस्करी, मादक पदार्थों के तस्करी, वन्य जीवों के अवैध शिकार और व्यापार, सार्वजनिक उपभोग की वस्तुओं में विषाक्त पदार्थ मिलाने, अमानवीय तरीके से हत्या, संपत्ति शोधन और प्राचीन स्मारक संरक्षण से संबंधित मामलों को वापस लेने से मना करता है।
“हथियार लेकर किए गए मामलों को वापस नहीं किया जा सकता, यह कानून है। हमने सभी अध्ययन किया है,” रेग्मी ने कहा।
संयोजक रेग्मी के अनुसार सुषिला कार्की नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के साथ हुए समझौते के आधार पर मामला वापस लेने का अध्ययन और सिफारिश करने का निर्देश दिया गया था।
विशेषज्ञों का कहना है कि समिति की सिफारिश होती भी है तो केवल उस आधार पर मामलों की वापसी संभव नहीं है।
पूर्व न्यायाधीश केसी ने कहा कि समिति की सिफारिश सरकार और अदालत के लिए बाध्यकारी नहीं होती।
“अदालत वापस लेने से मना कर सकती है। यह अदालत का अधिकार है,” उन्होंने कहा।
समिति के संयोजक रेग्मी ने कहा कि रिपोर्ट मंत्रालय और महान्यायवादी की राय के बाद ही कानूनी प्रक्रिया शुरू होगी।
“मुकदमा चल रही अदालत में आवेदन दिया जाएगा और सुनवाई के बाद अदालत के स्वीकार या अस्वीकार करने का निर्णय होगा; कानूनी प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। हमने केवल सिफारिश की है, इसलिए अदालत इसे स्वीकृत करेगी ऐसा नहीं है।”
पहले जेन जेड नेताओं और तत्कालीन प्रधानमंत्री सुषिला कार्की की चयनित सरकार के बीच गंभीर अपराध न होने पर जेल रिहाई और मामले वापस लेने की सहमति हुई थी।
एक अभियानकर्ता सरिस्मा थापा ने कहा कि राजनीतिक प्रतिशोध या सरकारी संस्थाओं के खिलाफ असंतोष जताने वाली गतिविधियों को अपराध घोषित नहीं किया जाना चाहिए।
“हमने समझौते में कहा है कि यदि कोई सिंचाई प्रणाली से जुड़ा है और अपराधी इरादे से किया है तो कार्रवाई होनी चाहिए,” उन्होंने कहा।
तीन सदस्यों वाली समिति में पूर्व उपमहान्यायवादी चेतनाथ घिमिरे और पूर्व पुलिस महानिरीक्षक पोषराज पोखरेल भी शामिल थे।
समिति ने मामलों से जुड़े व्यक्तियों के बयानों, घटनाओं और सबूतों का अध्ययन किया है।





