भोजराज प्रतिवेदन के कार्यान्वयन में देरी: गुठी की हजारों बिघा ज़मीन वापिस नहीं हो पाई

समाचार सारांश: जनकपुरधाम में २५ गुठी की ९ हजार ८४६ बिघा १२ कट्ठा ज़मीन अतिक्रमण का शिकार हो चुकी है और उक्त प्रतिवेदन का कार्यान्वयन नहीं हो पाया है। २०७६ साल में गठित कार्यदल ने जनकपुरधाम के मठ-मंदिर और सार्वजनिक तालाबों के संरक्षण के लिए रिपोर्ट तैयार की, लेकिन उसे अमल में नहीं लाया जा सका। सरकार से अतिक्रमित गुठी ज़मीन के संरक्षण और मुक्तिकरण के लिए पहल करने की मांगें उठ रही हैं। १८ चैत्र, जनकपुरधाम। जनकपुरधाम बाजार क्षेत्र में अधिकांश गुठियों की ज़मीन मौजूद है। गुठी, मंदिर और कुठ्ठी की सार्वजनिक ज़मीनों को काफी हद तक अतिक्रमित कर लिया गया है। बाकी बची ज़मीनें भी अतिक्रमण के दायरे में हैं। जनकपुरधाम में बची सार्वजनिक ज़मीनों का संरक्षण और संवर्धन नहीं हो पाया है। हजारों बिघा अतिक्रमित गुठी ज़मीन भी वापस नहीं ली जा सकी हैं।
करीब दो दशक पहले सरकार ने जनकपुरधाम की गुठी, मठ-मंदिर और सार्वजनिक तालाबों की अतिक्रमित ज़मीनों की जांच के लिए समिति बनाई थी, जिसने रिपोर्ट तैयार की थी, लेकिन उसका कार्यान्वयन नहीं हो सका। तत्कालीन श्री ५ सरकार के निर्देश पर भूमि व्यवस्था, सहकारी तथा गरीबी निवारण मंत्रालय ने २६ साउन २०६२ को भोजराज घिमिरे के संयोजन में उच्चस्तरीय कार्यदल गठन किया था। इस कार्यदल की रिपोर्ट के अनुसार जनकपुरधाम में २५ गुठी की ९ हजार ८४६ बिघा १२ कट्ठा ज़मीन अतिक्रमण में थी। इन ज़मीनों की कीमत अरबों पर आंकी गई है। कथित अतिक्रमित ज़मीन निजीकरण भी हो चुका है, जैसा कि रिपोर्ट में स्पष्ट है।
प्रतिवेदन का अमल न हो पाने से गुठी के साथ-साथ जनकपुरधाम के जानकी मंदिर और अन्य मठ-मंदिर, धार्मिक तथा ऐतिहासिक सार्वजनिक तालाब भी विनाश के कगार पर हैं। रिपोर्ट के अनुसार नगर क्षेत्र में मौजूद ४९ तालाबों में से ५ पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं, जबकि कुल ८२ तालाबों में से लगभग ३२.८ प्रतिशत का अस्तित्व खतरे में है। कई तालाबों को भरकर भवन बनाया जा चुका है। जानकी मंदिर के अंतर्गत आने वाली ज़मीन भी अनधिकृत तरीके से बेची गई है और मंदिर के महंथों द्वारा विभिन्न हिस्सों को निचले दामों में बेंचा गया है, जो रिपोर्ट में उल्लेखित है।
प्रतिवेदन की भूमिका में संयोजक घिमिरे ने २०६२ माघ १० को सरकार को सौंपे गए दस्तावेज में समय पर सुझावों को लागू करने की उम्मीद जताई थी। उन्होंने लिखा था, ‘इस रिपोर्ट में दिए सुझाव समयोचित हैं और समय के साथ उनमें परिवर्तन भी हो सकता है। यदि कार्यान्वयन में देरी हुई तो इन सुझावों का महत्व भी बदल सकता है।’ उन्होंने यह भी जोड़ा था, ‘श्री ५ की सरकार प्रतिवेदन की सिफारिशों को तत्काल प्रभाव से लागू करने की दिशा में तेजी दिखाएगी, इसमें मुझे विश्वास है।’ स्थानीय स्रोतों से प्रस्तावित धार्मिक पर्यटन विकास कार्यक्रमों के माध्यम से निवेश होने पर अगले १० वर्षों में जनकपुर को स्वच्छ, सुंदर और नमूना नगरपालिका बनाने का भरोसा जताया गया था। लेकिन राजशाही समाप्त होने के बाद लोकतंत्र और गणतंत्र आ जाने के दो दशकों के बावजूद भोजराज प्रतिवेदन पर अमल नहीं हो पाया। जनकपुर में अतिक्रमित गुठी, सार्वजनिक ज़मीन, तालाब और पाटी-पौवाल को मुक्त कराने और अतिक्रमणकर्ताओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने में विफलता रही है। सरकार द्वारा अभी तक प्रतिबेदन का कार्यान्वयन न करने से नागरिक निराश हैं और भूमाफिया तथा मंदिर के महंथों का रवैया पिछले कुछ वर्षों से असंतोषजनक बना हुआ है। जनकपुरधाम के अधिवक्ता राहुल झा कहते हैं, ‘जनकपुर देश के सबसे बड़े गुठी ज़मीन घोटाले का केंद्र बन गया है, जहां करीब ९ हजार बिघा ज़मीन अतिक्रमित है।’ दो साल पहले तत्कालीन गृहमंत्री रवि लामिछाने ने गुठी ज़मीन के संरक्षण के लिए पहल करने की बात कही थी। अब सरकार से मांग हो रही है कि ऐसे अतिक्रमित ज़मीनों के संरक्षण और प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जाए।





