
सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में १० से ५ बजे तक की ड्यूटी समय-सारिणी लागू की है, जो चिकित्सकों की वास्तविक सेवा समय से मेल नहीं खाती। स्वास्थ्य एक विशेष और संवेदनशील क्षेत्र है। यह किसी भी सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में आता है। पहले की सरकारों ने इस क्षेत्र को जन-केंद्रित बनाने के प्रयास किए थे। चुनाव के बाद बनी नई सरकार ने भी स्वास्थ्य क्षेत्र से संबंधित विभिन्न निर्णय लिए हैं। लेकिन इस सरकार द्वारा लागू की गई १० से ५ बजे तक की ड्यूटी समय-सारिणी विज्ञान सम्मत नहीं प्रतीत होती। दरअसल, अधिकांश अस्पताल तो पहले से ही ९-५ बजे के लगभग ही कार्यरत हैं और स्वास्थ्यकर्मी उसी के अनुसार काम करते रहे हैं।
सरकारी प्रतिष्ठानों में कार्यरत चिकित्सक दशकों से अनेक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। न्यूनतम पारिश्रमिक, व्यावसायिक विकास की अनिश्चितता, अतिरिक्त सेवाओं, सुविधाओं का अभाव, बढ़ते मरीजों का दबाव और कार्यस्थल की असुरक्षा ये वर्तमान में देखी जाने वाली समस्याएं हैं। इन सभी के बावजूद सरकार की उदासीनता कष्टदायक है। कम वेतन और आर्थिक असुरक्षा दोनों सरकारी और निजी क्षेत्रों में काम करने वाले कई चिकित्सकों को उनके श्रम के अनुसार पारिश्रमिक से वंचित रखती है। ओवरटाइम, रात्रीकालीन सेवाओं या आपातकालीन ड्यूटी के लिए उचित भत्तों का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
कानूनी कार्य घण्टों के उल्लंघन के कारण श्रम कानून द्वारा निर्धारित कार्य समय व्यवहार में लागू नहीं होता, ऐसी शिकायतें बार-बार सामने आती रहती हैं। वर्तमान लागू की गई समय-सारिणी केवल ९-५ बजे की सेवाओं को ही स्वास्थ्य सेवा मानती है। इसके अलावा दी जाने वाली अंतरंग, आकस्मिक और अनुकूल सेवाओं को स्वास्थ्य सेवा के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है। कुछ सीमित सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में अतिरिक्त भत्तों का प्रावधान हो सकता है, लेकिन काठमांडू के बाहर कार्यरत स्वास्थ्यकर्मी इससे पूरी तरह वंचित हैं।
डॉक्टर और मरीजों के अनुपात अत्यंत कमज़ोर है। जनसंख्या के अनुपात में चिकित्सकों की संख्या कम होने के कारण एक चिकित्सक को अत्यधिक संख्या में मरीजों को देखना पड़ता है। हम गुणात्मक स्वास्थ्य सेवा की बात करते हैं, लेकिन एक चिकित्सक को रोजाना १०० तक मरीज देखने होते हैं, जो एक दुखद स्थिति है। इस स्थिति को तराई-मधेस की कहा हुआ एक कहावत से मेल खाती है, “धरफड़ी के विवाह, कनपत्ती में सेनूर” अर्थात् जल्दीबाज़ी में किया गया विवाह, जो इलाज और पहचान दोनों को प्रभावित करता है।
अपर्याप्त पूर्वाधारों के कारण कई अस्पतालों में उपकरण, बेड, दवाइयों और जनशक्ति की कमी से काम करना कठिन होता है। अभी भी नारायणी अस्पताल जैसे केन्द्रीय अस्पतालों में अधूरी संरचनाओं में काम चलाना पड़ता है। आंतरिक विभाग जीर्ण-शीर्ण हैं। बेड की कमी से रोजाना कई सेवा ग्रहियों को परेशानी होती है। चिकित्सक असंतुष्ट हैं क्योंकि उनके योगदान को सम्मान नहीं मिलता। वे निरंतर सेवा दे रहे हैं, पर नीति निर्धारण में उनकी वास्तविक स्थिति, मानसिक थकान और पेशेवर अधिकारों को उचित महत्व नहीं दिया जाता।
यदि बिना पूर्व तैयारी के ऐसे निर्देश लागू किए जाते हैं तो सेवा की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा। चिकित्सकों की मानसिक थकान बढ़ेगी। स्वास्थ्य क्षेत्र में असंतोष और आंदोलन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसके परिणामस्वरूप मरीज सबसे अधिक प्रभावित होंगे। देश में किसी भी विषम परिस्थिति में चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी अपनी जान की परवाह न करते हुए लगातार अहोरात्र सेवा देते रहे हैं। स्वास्थ्य सेवा को प्राथमिकता देना सर्वोपरि है, इसमें कोई विवाद नहीं। लेकिन सेवा देने वाली जनशक्ति अर्थात चिकित्सकों के अधिकार, सुविधाएं और कार्य स्थितियों को सुधारें बिना केवल ड्यूटी समय बढ़ाना कोई स्थायी समाधान नहीं है। सरकार को निम्न पहलुओं पर ध्यान देना आवश्यक है – पर्याप्त जनशक्ति प्रबंधन, उचित वेतन और भत्ता व्यवस्था, कार्य घण्टे संबंधी कानूनी प्रावधानों का कड़ाई से पालन, स्वास्थ्य पूर्वाधार का सुदृढ़ीकरण। चिकित्सक संतुष्ट होंगे तभी स्वास्थ्य सेवा प्रभावी होगी। अन्यथा सेवा विस्तार के नाम पर प्रणाली ही कमजोर होने का खतरा होगा। चिकित्सकों की मुस्कान लौटाने और मरीजों के प्रति मुस्कान के साथ व्यवहार करने के लिए सरकार से हमारी मांग है। (डा. उदय नारायण सिंह, वीरगंज स्थित नारायणी अस्पताल में कार्यरत हैं।)





