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संगठन में सफलता, जनजागृति आन्दोलन में सुरक्षा की कमज़ोरी

सशस्त्र पुलिस बल के प्रमुख राजु अर्याल १८ वैशाख को चार वर्षीय कार्यकाल पूरा करके सेवानिवृत्त होने वाले हैं। उनके कार्यकाल में सशस्त्र पुलिस ने १०९ कार्यविधि, निर्देशिका और मानक जारी किए हैं। जनजागृति आन्दोलन की सुरक्षा में हुई चूक की जिम्मेदारी अर्याल पर थी, जिसमें १९ लोगों की मृत्यु हुई थी। १५ वैशाख, काठमांडू। सशस्त्र पुलिस बल के प्रमुख (आईजीपी) राजु अर्याल अपने चार वर्षीय कार्यकाल को पूरा कर तीन दिन बाद सेवानिवृत्त हो जाएंगे। ३० वर्षों की सेवा अवधि के अनुसार उनके पास अभी दो वर्ष का कार्यकाल बचा था, फिर भी उन्होंने १८ वैशाख को चार वर्षों के कार्यकाल के बाद सेवा निवृत्त होने का निर्णय लिया है। सरकार ने उनके स्थान पर नारायणदत्त पौडेल को आईजीपी नियुक्त करने का निर्णय ले लिया है। इस चार साल के लंबे कार्यकाल में अर्याल बड़े विवादों में नहीं फंसे। संगठन के अंदर कुछ छोटी असंतुष्टियाँ थीं, लेकिन उन्होंने किसी बड़े विवाद को जन्म नहीं दिया। पुलिस संगठन के कार्यप्रणाली, अधिकार क्षेत्र, संख्या संरचना, पदस्थापन प्रक्रिया और सामान खरीद जैसे विषयों पर प्रायः संगठन के प्रमुख विवादों में होते हैं। चार साल के इस लंबे कार्यकाल में ऐसी जटिलताएँ और अधिक बढ़ जाती हैं। लंबे सेवा कार्य के दौरान काम करना सरल होता है, किन्तु विवाद का खतरा भी बढ़ जाता है। इस संदर्भ में अर्याल का कार्यकाल जोखिम और आसानी के बीच संतुलन में था। लेकिन उन्होंने इस चुनौती का सामना करते हुए किसी बड़े विवाद के बिना चार साल का कार्यकाल पूरा किया। उनका १८ वैशाख को विवादरहित विदाई होगी। ‘संगठन के प्रमुख अभिभावक होते हैं, लेकिन सभी का सामूहिक चर्चा और निर्णय आवश्यक होता है,’ अर्याल ने हर बैठक और ब्रीफिंग में यही बात दोहराई। १९ वैशाख २०७९ से सशस्त्र प्रमुख की कमान संभालने के बाद अर्याल ने सामूहिक निर्णयों को व्यावहारिक रूप से लागू किया। इस सामूहिक भावना ने उनकी सफलता को संभव किया। ‘जब संगठन के जवानों को कष्ट होता है, तो संगठन के प्रमुख को दुख होता है, और जब प्रमुख दुखी होता है तो संगठन के सभी स्तर के लोग प्रभावित होते हैं। संगठन में सामूहिक भावना और स्नेह का विकास हुआ है,’ उन्होंने कहा। हर बड़े और नीति सम्बन्धी विषयों पर वह डीआईजी और एआईजी से चर्चा करके निर्णय लेते थे, जिसे सशस्त्र पुलिस के अधिकारी भी स्वीकारते हैं। सशस्त्र पुलिस के पूर्व आईजी के विवरण देखें तो विवाद और भ्रष्टाचार से संबंधित मामलों का जिक्र मिलता है। कई पूर्व प्रमुखों के खिलाफ भ्रष्टाचार जांच चल रही है। लेकिन अर्याल आर्थिक विवाद से दूर रहे। अर्याल के आईजीपी रहने के दौरान गृह मंत्रालय में नेपाली कांग्रेस के बालकृष्ण खाँण मंत्री थे। उस समय गृह सचिव टेकनारायण पांडे ने उन्हें पंजीकृत चिन्ह जारी किया था। चार साल के दौरान उन्होंने ६ गृह मंत्रियों और ७ गृह सचिवों के साथ काम किया। शायद इतने गृह मंत्री और सचिव के साथ काम करने वाले वे पहले सशस्त्र पुलिस प्रमुख हैं। खाँण बाद वे रवि लामिछाने, नारायणकाजी श्रेष्ठ, रमेश लेखक, ओमप्रकाश अर्याल और सुधन गुरुङ के साथ कार्यरत रहे। गृह सचिवों में टेकनारायण पांडे से लेकर विनोदप्रकाश सिंह, दिनेश भट्टराई, एकनारायण अर्याल, गोकर्णमणि दुवाड़ी, रामेश्वर दंगल और राजकुमार श्रेष्ठ तक सात सचिव शामिल हैं। उनकी सरल स्वभाव का असर यह रहा कि कोई भी बदलाव उनके समक्ष बड़ी बाधा नहीं बना। जनजागृति आन्दोलन के बाद चुनौतीपूर्ण स्थिति में चुनाव को सफल बनाने में सशस्त्र पुलिस की भूमिका महत्वपूर्ण थी, और उस जिम्मेदारी को प्रमुख के नाते अर्याल ने संभाला। हथियारों और कैदियों से जुड़ी चुनौतियों को उन्होंने दूर करने का कार्य किया। अर्याल कहते थे, ‘कैदी अक्सर वांछित रहते हैं, हम देख कर गिरफ्तार करते हैं। चुनाव बिगड़ने का डर नहीं था। छिपे हुए हथियार अपराधी हो सकते हैं, पर वे उपयोगी नहीं होंगे।’ उनके अनुसार चुनाव शांतिपूर्ण हुए। सशस्त्र पुलिस ने दूसरे चरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। २०७९ के फाल्गुन के चुनाव के साथ ही वैशाख और मंसिर में हुए स्थानीय और प्रतिनिधि सभाओं के चुनाव में भी अर्याल की भूमिका उत्कृष्ट रही। आईजीपी बनने पर उन्होंने पदस्थापन को न्यायसंगत, पूर्वानुमानित और मापदंडों के आधार पर चलाने की योजना बनाई। इस योजना के अनुसार उनके कार्यकाल में १०९ कार्यविधि, निर्देशिका, मानक, स्थायी आदेश और कार्ययोजना जारी कर संगठन के कार्य-प्रणाली को सुव्यवस्थित किया गया, जैसा कि सशस्त्र पुलिस के सह प्रवक्ता शैलैन्द्र थापा ने बताया। कर्मचारी विकास के लिए नई संगठनात्मक और प्रबंधन सर्वेक्षण कर बढ़ोतरी की गई, जानकारी बाह्य सचिवालय से मिली। उन्होंने पहले बताये अनुसार पदस्थापन में पारदर्शिता लाने हेतु पूर्वानुमान सूची प्रकाशित करना शुरू किया है। हालांकि पदस्थापन में अभी भी शिकायतें आ रही हैं। संगठन की संस्थागत स्मृति को तकनीक से जोड़ने, अवकाश व्यवस्था को डिजिटल बनाने और वित्तीय पारदर्शिता को प्राथमिकता देने के प्रति महानिरीक्षक अर्याल समर्पित रहे। सुरक्षा से जुड़ा रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार से सशस्त्र पुलिस मुख्यालय हल्लचोक में मिलने पर अर्याल ने कहा, ‘मैंने मंत्रालय में अवकाश आवेदन दिया है। यदि स्वीकृत हुआ तो यह वर्दी में आपकी अंतिम मुलाकात होगी।’ सेवानिवृत्ति के दौरान उन्होंने कहा, ‘गृह मंत्रालय से कोई निर्णय नहीं आया है, देखता हूं।’ पुलिस संगठन में वार्षिक सेवा विस्तार के प्रयास की प्रथा प्रचलित है, जिसमें कई आईजीपी शामिल होते हैं। कभी-कभी अवकाश से पहले भी सेवा अवधि बढ़ाने की कोशिश की जाती है, जिससे गृह मंत्रालय और पुलिस दोनों परेशान होते हैं। लेकिन अर्याल ने एक माह पहले ही अवकाश का कार्यक्रम निर्धारित किया था, जो उन्होंने पद संभालते समय कहा था। सरकार ने अवकाश स्वीकार न किया तो भी उन्होंने एक सप्ताह पहले आवेदन दिया, जो मंजूर नहीं हुआ। पहले के आईजीपी सेवानिवृत्ति से पहले एक माह अवकाश लेते थे, परन्तु अर्याल ने इसे स्थापित करने का प्रयास किया। उनके कार्यकाल में सीमा सुरक्षा विभाग को भी पुनर्गठित किया गया, जो पहले बंद किया गया था। सीमा सुरक्षा को महत्व देते हुए एक एआईजी पद बढ़ाकर विभाग को पुनर्स्थापित किया गया। इसी अवधि में ३,७५۷ सीमा स्तम्भों का निर्माण, मरम्मत और रंग-रोगन किया गया। सीमा क्षेत्र में ११० स्थानों पर ३८८ सीसी कैमरे लगाए गए। अर्याल के कार्यकाल में ३२ बॉर्डर आउट पोस्ट स्थापित हुये, साथ ही ४५ प्रस्तावित सीमा सुरक्षा चौकियों को स्तरोन्नत कर स्थायी बनाया गया। ‘एक सैनिक, एक कौशल’ नीति के तहत २,२१९ को कौशल प्रशिक्षण दिया गया। १३४ गोताखोर तैयार किए गए, जो सभी प्रदेशों में उपलब्ध हैं। सशस्त्र पुलिस के अंदर विद्रोह और आतंकवाद विरोधी विशेष प्रशिक्षण शुरू किया गया। नेपाल पुलिस अस्पताल को ११० से बढ़ाकर ३०० श्यायियों वाली योजना के तहत अभी २१८ श्यायियां उपलब्ध कराई गई हैं। सभी पक्ष अर्याल को विवादरहित मानते हुए भी जनजागृति आन्दोलन की सुरक्षा में चूक उनकी सेवा पर दाग है। भ्रष्टाचार, अनियमितता और सोशल मीडिया प्रतिबंध हटाने की मांग को लेकर सन् २०७९ भदौ २३ को जनजागृति ने काठमांडू में प्रदर्शन किया था। उस समय सुरक्षा व्यवस्था कमजोर नजर आई। साधारण प्रदर्शन के बावजूद प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा घेराबंदी तोड़ दी और निषेधित क्षेत्र में प्रवेश किया। इसके बाद सुरक्षा कर्मियों की गोलीबारी में काठमांडू में १९ लोग मारे गए। २४ गते की घटनाओं में राज्यहीनता जैसी स्थिति बनी। सभी सुरक्षा व्यवस्थाएँ असफल रहीं। इसके विश्लेषण और रणनीति पर काम करना सशस्त्र एवं अन्य सुरक्षा विभागों की प्रतिबद्धता का विषय है। जनजागृति आन्दोलन की असफल सुरक्षा व्यवस्था का एक दोष अर्याल के जिम्मे है। संगठन के प्रमुख होते हुए उन्हें दोनों पक्षों का जिम्मेदार कमांडर अधिकारी होना आवश्यक था।