
नेपाल ट्रेड यूनियन महासंघ (जिफन्ट) ने बदलते विश्व परिवेश और तकनीकी विकास के अनुसार ट्रेड यूनियन आंदोलन को नई दिशा देने की तैयारी की है। जिफन्ट ने श्रमिक आंदोलन को दक्षता विकास, डिजिटल रूपांतरण और उत्पादकता से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया है। महासंघ ने श्रम कानून सुधार, रोजगारदाताओं के साथ नए समझौते और समावेशी श्रम बाजार के निर्माण के लिए सरकार के साथ निरंतर संवाद जारी रखने का संकेत दिया है। 15 वैशाख, Kathmandu।
नेपाल ट्रेड यूनियन महासंघ (जिफन्ट) ने वैश्विक परिवेश, तकनीकी विकास और नई राजनीतिक-सामाजिक संदर्भों के अनुसार ट्रेड यूनियन आंदोलन को नए और आधुनिक तरीके से आगे बढ़ाने की योजना बनाई है। मई दिवस 2026 के पूर्व संध्या पर जारी घोषणापत्र में ट्रेड यूनियन आंदोलन को नवाचार के साथ आगे बढ़ाने का संकल्प प्रकट किया गया है। जिफन्ट का मानना है कि नेपाली श्रम क्षेत्र को नया परिभाषित करने की जरूरत है। बदलते राष्ट्रीय और वैश्विक श्रम परिवेश को ध्यान में रखते हुए महासंघ ने स्पष्ट किया है कि अब श्रमिक आंदोलन केवल वेतन वृद्धि या पारिश्रमिक संबंधी मुद्दों तक सीमित नहीं रहेगा।
घोषणापत्र में आज के श्रम क्षेत्र में तकनीकी विकास, बाजार प्रतिस्पर्धा और रोजगार संरचना में आए परिवर्तनों को प्रमुखता से लिया गया है और ‘‘गतिशील और सशक्त श्रमिक आंदोलन’’ की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। घोषणापत्र के अनुसार, श्रमिकों के मुद्दे अब पारंपरिक मांगों से ऊपर उठकर दक्षता विकास, डिजिटल रूपांतरण और उत्पादनशीलता से सीधे जुड़े होंगे। जिफन्ट के महासचिव लक्ष्मण शर्मा ने बताया कि आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी क्षेत्रों में आए बड़े बदलावों के कारण अब पुराने तरीकों से श्रमिकों के मुद्दों का समाधान संभव नहीं है। आगामी महाधिवेशन में ये विषय मुख्य एजेंडा होंगे और दीर्घकालीन योजनाएं बनाई जाएंगी।
महासचिव शर्मा ने कार्यस्थल और तकनीक में आए बदलाव का श्रमिकों के कौशल और क्षमता विकास पर पड़ने वाले प्रभाव को चुनौती बताते हुए कहा, ‘‘हमने वर्तमान बदले हुए संदर्भ को एक नए सामाजिक समझौते के रूप में परिभाषित किया है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘तकनीक में आए परिवर्तन के अनुसार श्रमिकों की क्षमता में वृद्धि करना और देश की आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप आगे बढ़ना आज की सबसे आवश्यक मांग है।’’ जिफन्ट ने सरकार के साथ सहयोग और संवाद के लिए कई मुद्दे भी पहचाने हैं। श्रम कानून में समयोचित सुधार, रोजगारदाताओं के साथ नए प्रकार के समझौते और श्रमिकों की मौजूदा समस्याओं के समाधान के लिए सरकार के साथ लगातार संवाद किया जाएगा, उन्होंने बताया।
‘‘परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं, अगर हम पुराने तरीकों में अड़े रहेंगे तो टिक नहीं पाएंगे,’’ शर्मा ने कहा, ‘‘इसलिए श्रम कानून और रोजगारदाताओं के साथ संबंधों को नए तरीके से परिभाषित करते हुए आगे बढ़ना ही विकल्प है।’’ जिफन्ट इस महाधिवेशन को केवल नेतृत्व चयन तक सीमित न रखते हुए इसे श्रमिक आंदोलन की नई दिशा और नीति तय करने के महत्वपूर्ण चरण के रूप में देख रहा है। महासंघ ने तकनीकी-मित्र कार्यस्थल और सुरक्षित श्रम संबंधों के लिए ‘ब्रेकथ्रू’ करने की योजना भी बनाई है। श्रमिक के सम्मान और अधिकारों को तकनीक के साथ जोड़ते हुए ‘‘कौशल विकास और तकनीकी प्रगति’’ के बीच संतुलन को मूल मंत्र बनाया गया है। यह संदेश भी दिया गया है कि श्रमिक केवल काम करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि दक्ष, तकनीक-मित्र और प्रतिस्पर्धी जनशक्ति के रूप में विकसित होने चाहिए।
घोषणापत्र में सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक प्रभावी एवं समावेशी बनाने, वैदेशिक रोजगार के विकल्प के रूप में देश में ही नए रोजगार सृजित करने, और राष्ट्रीय उद्योगों के संरक्षण के माध्यम से आंतरिक उत्पादन बढ़ाने को प्रमुख प्राथमिकता के रूप में रखा गया है। इसके अतिरिक्त, श्रम बाजार को समावेशी बनाते हुए महिलाओं, युवा और सीमांतित समुदायों की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। महासंघ ने श्रम नीति को समयानुकूल संशोधित करने और श्रमिक-मित्र वातावरण सृजित करने के लिए सरकार, निजी क्षेत्र और श्रमिक संगठनों के बीच सहयोग को आवश्यक बताया है। घोषणापत्र में समावेशी समृद्धि की अवधारणा पर बल देते हुए आर्थिक विकास में श्रमिकों की निर्णायक भूमिका सुनिश्चित करने की बात कही गई है। जिफन्ट का मानना है कि आगे की चुनौती केवल न्यूनतम पारिश्रमिक वृद्धि नहीं, बल्कि गुणात्मक रोजगार सृजन, उत्पादकता वृद्धि और सामाजिक न्याय के साथ आर्थिक विकास ही है। यह श्रमिक आंदोलन को नई दिशा देकर दीर्घकालीन रूपांतरण की ओर ले जाएगा।





