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सरकार की पुनःस्थापना योजना के बिना 10 हजार विस्थापित लोग

१५ वैशाख, काठमाडौं। शनिवार सुबह थापाथली की सुकुमवासी बस्ती में सरकार द्वारा डोजर चलाए जाने के बाद गर्भवती पत्नी समेत ६ सदस्यों के परिवार के साथ प्रवेश परियार (२६) कीर्तिपुर स्थित आश्रम पहुंचे हैं। वे कहते हैं, ‘जाने के लिए कोई जगह नहीं है। कोठा खोजने का समय भी सरकार ने नहीं दिया,’ वे आगे कहते हैं, ‘पत्नी को ३० तारीख को (डिलीवरी कराने) समय निर्धारित है। यहां आने के बाद उनकी सेहत बिगड़ रही है।’ ९ महीने के गर्भवती पत्नी को दर्द बढ़ने पर आज प्रसूति गृह ले जाया गया था। प्रवेश ने कहा, ‘समस्या पर समस्या बढ़ गई। मजदूरी करके परिवार चलाते थे, अब रहने की जगह की चिंता बढ़ गई है।’ उदयपुर से २० साल पहले प्रवेश की माँ उन्हें थापाथली की सुकुमवासी बस्ती लेकर आई थीं। इसी बस्ती में पले-बढ़े प्रवेश की शादी ज्यादा दिन पहले हुई है। प्रवेश की बहन पूजा ने कहा, ‘पहले संतान के जन्म को खुशी मानते थे, लेकिन सरकार ने ऐसा हाल पैदा कर दिया।’ पूजा के भी एक पुत्र हैं। अंतरजातीय विवाह करने के कारण पूजा को पति के परिवार से भेदभाव का सामना करना पड़ा, जिसके बाद वह मायके में रह रही हैं। प्रवेश ने कहा, ‘माँ, दादी, बहन, भांजा, पत्नी और मैं, हमारे छह सदस्य हैं। यहां (आश्रम में) एक झूला दिया गया है, रहने की जगह ऐसी है।’ नाबालक भांजा, डिलीवरी के कगार पर पत्नी और वृद्ध माता के साथ वे कल कहां जाएंगे, इस चिंता में हैं। वे सरकार के व्यवहार से नाराज हैं, ‘ले जाने का कोई स्थान नहीं था तो क्यों तोड़ दिया?’ थापाथली सहित गैरीगाउँ, शान्तिनगर और मनहरा की सुकुमवासी बस्तियों में डोजर चलाए जाने के बाद विस्थापित हुए १५५ परिवारों को यहां (राधास्वामी सत्संग व्यास आश्रम) लाया गया है। एक संस्था की निगरानी रिपोर्ट में उक्त आश्रम को रहने के लिए उपयुक्त नहीं बताया गया है। महिला मानवाधिकार रक्षकों के राष्ट्रीय नेटवर्क ने विस्थापितों के आश्रम को खुला जेल बताया है। महानगर और नेपाल पुलिस के व्यवहार तथा आश्रम की भौतिक स्थिति ने भी इसे खुला जेल जैसा बताया है। ‘बरसात के समय टीन की छत से पानी टपकने की समस्या के कारण सभी को एक खुले हॉल में रहना पड़ता है,’ रिपोर्ट में कहा गया है, ‘विशेष रूप से महिलाओं की गोपनीयता बिल्कुल नहीं है, हॉल में हर जगह CCTV कैमरे लगे हैं और कपड़े बदलने के लिए अलग जगह भी नहीं है।’ मंगलवार दोपहर टीम पहुंची तो वहां बाकी लोग अपनी पीड़ा छुपा नहीं सके। सिर्जना लिम्बु (३८) बताती हैं, ‘बीमारियां बढ़ गई हैं। बच्चे, डिलीवरी कर रही महिलाएं और वृद्धों को समस्या है। खाने-पीने का इंतजाम नहीं है। बाहर जाने-आने पर कड़ाई है, नाम दर्ज करना पड़ता है।’ आश्रम की कमियों के उजागर होने के बाद पत्रकारों पर भी रोक लग गई है। तस्वीरें और वीडियो लेने पर पाबंदी है। ‘थोड़ी-बहुत खाने की समस्या की खबर आई तो अब मीडिया को अंदर आने नहीं दिया जा रहा है,’ एक युवक ने बताया। महानगर पुलिस के समन्वय में यहां आए विस्थापितों की मुख्य पीड़ा है – भविष्य को लेकर अनिश्चितता। ‘आज से स्कूल जाना शुरू कर दिया गया कहा गया, लेकिन बेटा नहीं भेज पाए,’ सुनिता तामाङ (३५) ने कहा। उनका १३ वर्षीय बेटा बुद्धनगर स्थित सिर्जनशील सेकेंडरी स्कूल में पढ़ता था। सुनिता के अनुसार थापाथली बस्ती के अधिकांश बच्चे इसी स्कूल में पढ़ते थे। ‘आसपास के अन्य विद्यालयों से यह सस्ता है इसलिए अधिक बच्चे यहां पढ़ते हैं,’ वे बताती हैं। विस्थापित होने के बाद बच्चों के स्कूल को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, जबकि मजदूरी करने वाले पुरुष स्थानीय टूटे-फूटे सामान इकट्ठा कर बस्ती के निकट निवास कर रहे हैं। ‘हम महिलाएं दूसरों के घरों में सफाई कर के पैसा कमाने को मजबूर हैं, लेकिन यहां इस आश्रम में कैद की तरह हैं,’ सिर्जना कहती हैं। दस हजार विस्थापित पुलिस रिपोर्ट के अनुसार शनिवार और रविवार को राजधानी में चार सुकुमवासी बस्तियों में २,०८१ परिवारों के घर-बार तोड़े गए हैं। थापाथली में १४४, गैरीगाउँ में १,०००, मनोहरा (काठमांडू की ओर) में १३१ और मनोहरा (भक्तपुर की ओर) में ८०६ परिवारों के घर-बार ध्वस्त किए गए। कुल प्रभावित लोग दस हजार तीन सौ बीस से अधिक हैं। लगभग आधे विस्थापित दशरथ रंगशाला में पहुंचकर तीन पुस्ते लिखवा चुके हैं। काठमाडौं महानगर पुलिस के अनुसार मंगलवार तक १,१२४ परिवारों के ३,५८४ लोगों ने सुकुमबासी होने का आवेदन दिया है। आवेदन लेने का कार्य महानगर नेपाल तथा अधिकार सम्पन्न बागमती सभ्यता एकीकृत विकास समिति के कर्मी कर रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार आवेदन देने वाले लोगों की संख्या हाल के दिनों में बढ़ रही है। शनिवार को १८१ परिवार रंगशाला होल्डिंग सेंटर पहुंचे थे, सोमवार को यह संख्या ३७३ हो गई। ‘कितने आएंगे इसका कोई निश्चित आंकड़ा नहीं है, आवेदन लेने का कार्य जारी है,’ रंगशाला में तैनात एक अधिकारी ने कहा। होल्डिंग सेंटर में आवेदन करने वालों में से बहुत कम लोगों को ही महानगर धार्मिक आश्रम तथा काठमांडू के विभिन्न गेस्ट हाउसों में रख रहा है। उपत्यका विकास प्राधिकरण की विकास आयुक्त विमला ढकाल ने बताया कि विस्थापित अपने तरीके से रहना चाहते हैं इसलिए अस्थायी आवास में रहने वालों की संख्या कम है। ‘संपर्क कर आने वालों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन अधिकांश अपने तरीके से रहना चाहते हैं,’ ढकाल ने कहा। अचानक घर-बार टूटने के कारण अधिकांश विस्थापित अपने रिश्तेदारों के यहां शरण लिए हुए हैं या अलग कमरों की तलाश कर रहे हैं ऐसी माना जा रहा है। ध्वस्त होने के तुरन्त बाद रिश्तेदारों के यहां चले गए कई लोग अब रंगशाला पहुंच रहे हैं। लेकिन किसी सरकारी निकाय के पास आधिकारिक आंकड़े नहीं हैं। ‘प्रधानमंत्री के निर्देश पर ध्वस्त करने में समन्वय हुआ, लेकिन विस्थापितों के पुनःस्थापन के विषय में समन्वय नहीं हो पाया,’ एक सरकारी अधिकारी ने कहा। उनके अनुसार काठमाडौं महानगर, सहरी विकास मंत्रालय, गृह मंत्रालय, भूमि व्यवस्था मंत्रालय, अधिकार सम्पन्न बागमती सभ्यता एकीकृत विकास समिति, उपत्यका विकास प्राधिकरण और नेपाल पुलिस जैसे निकाय कार्यरत हैं। लेकिन नेतृत्व देने में ये निकाय उलझन में हैं। उपत्यका विकास प्राधिकरण की विकास आयुक्त ढकाल कहती हैं कि विस्थापितों के विवरण संग्रह अधूरा होने के कारण प्रक्रिया में विलंब स्वाभाविक है। ‘तीन पुस्ते प्राप्त कर रहे हैं, अब देखेंगे। अगर कहीं और पाए गए तो उन्हें वास्तविक सुकुमवासी नहीं माना जाएगा,’ ढकाल कहती हैं, ‘वास्तविक सुकुमवासियों के लिए प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।’ पहले घर-बार तोड़कर सुकुमवासी पहचानने की प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की शैली के प्रति विस्थापितों में गहरा आक्रोश है। कीर्तिपुर के धार्मिक आश्रम में रहने वाले कई विस्थापित प्रधानमंत्री बालेन के खिलाफ गुस्सा जता चुके हैं। ‘भोजन बांटने से पहले कैमरा घुमाते हैं, फिर आश्रम में खुश हैं सुकुमवासी हैं कहकर पोस्ट करते हैं,’ एक विस्थापित ने कहा, ‘घर तोड़कर जो दुःख दिया, वह कोई खुश कैसे हो सकता है?’ जवाबदेही निगरानी समूह के संयोजक और अधिकारकर्मी राजुप्रसाद चापागाईं ने सुकुमवासी बस्ती में डोजर चलाने के कार्य को अधिनायकवादी और अमानवीय बताया है। ‘संवैधानिक प्रावधान, कानूनी प्रक्रिया और मानवीय पक्षों को नजरअंदाज कर प्रधानमंत्री के आदेश पर लोगों को बेघर किया गया है, जो कि शत्रुराज्य के विरुद्ध भी ठीक नहीं है,’ उन्होंने कहा, ‘यह मानवता के खिलाफ अपराध के समान कार्य है।’ मेयर बालेन के दौरान उच्च अदालत के आदेशों की अवहेलना कर घर-बार तोड़ने और प्रमाणित करने की प्रक्रिया स्वच्छ नहीं रही, चापागाईं ने बताया।