
समाचार सारांश
- भारत में सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश की टिप्पणी के बाद युवाओं ने ‘कक्रोच जनता पार्टी’ की स्थापना की और सोशल मीडिया पर व्यापक प्रभाव डाला है।
- स्थापना के कुछ ही दिनों में इस समूह ने करोड़ों अनुयायी जुटाकर भारत की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ऑनलाइन मौजूदगी को भी पीछे छोड़ दिया।
- हालांकि सोशल मीडिया पर देखा गया यह उभार दीर्घकालिक राजनीतिक शक्ति में तब्दील होगा या नहीं, यह सवाल प्रासंगिक है।
११ जेठ, काठमांडू। भारत में सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश ने नवयुवाओं को ‘कक्रोच’ (तिलचट्टा) कह दिया, जिसके बाद एक नया राजनीतिक मोर्चा उभरा है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अदालत में की गई इस टिप्पणी से आहत युवा समुदाय ने व्यंग्यात्मक रूप से उस शब्द को अपनाकर ‘कक्रोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) की स्थापना की।
यह समूह मात्र कुछ ही दिनों में सोशल मीडिया पर करोड़ों अनुयायी जुटाने में सफल रहा और भारत के सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ऑनलाइन मौजूदगी को भी पीछे छोड़ दिया।
फिर भी, सोशल मीडिया पर दिख रही इस राजनीतिक लहर के दीर्घकालिक राजनीतिक शक्ति बनने की क्षमता पर प्रश्न चिह्न है। पिछले दो दशकों के वैश्विक राजनीतिक अनुभव बताते हैं कि ऐसे आवेग में जन्मे दलों का आयु काफी छोटा होता है।
तात्कालिक आक्रोश और विरोध भावना से उपजी ये पार्टियां आमतौर पर कुछ वर्षों में राजनीतिक मंच से गायब हो जाती हैं क्योंकि इनमें ठोस राजनीतिक कार्यक्रम, दर्शन और दूरदर्शिता का अभाव होता है।
सीजेपी के संस्थापक अभिजित दीपे ने कहा है कि पार्टी की स्थापना पूर्व योजना के तहत नहीं, बल्कि युवाओं के बीच बेरोजगारी और अवसरों की कमी से उत्पन्न निराशा और पीड़ा के कारण हुई है।
पार्टी के डिजिटल घोषणापत्र में न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी पदों से रोक लगाने, संसद में महिलाओं के लिए ५०% आरक्षण सुनिश्चित करने और बड़े कॉर्पोरेट मीडिया की अनुमति रद्द करने जैसे व्यंग्यात्मक प्रस्ताव शामिल हैं।
कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के ‘ग्लोबल प्रोटेस्ट ट्रैकर’ के अनुसार २०१७ से अब तक १४७ से अधिक देशों में ७०० से अधिक सरकार विरोधी प्रदर्शनों का आयोजन हुआ है, मगर इनमें से केवल १८% प्रदर्शन तीन महीने से अधिक समय तक चल पाए हैं।
कई देशों में ये प्रदर्शन राजनीतिक दलों में बदल गए, लेकिन उनकी सफलता और दीर्घायुता कम ही देखी गई।
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन ने सामाजिक आंदोलन और राजनीतिक दलों की संरचनात्मक भिन्नताओं से इन मोर्चों में आंतरिक संघर्ष की संभावना को दर्शाया है।
भारत में आप और केजरीवाल
भारत में २०११ के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन से जन्मी आम आदमी पार्टी (आप) इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन से अलग होकर अरविंद केजरीवाल ने २०१२ में आप की स्थापना की।

आप ने २०१३ के दिल्ली विधानसभा चुनाव में सफलता हासिल कर केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाया। लोकसभा चुनाव में २०१४ में ४ सीटें मिलीं, जबकि २०१९ में केवल ३ सीटों तक सीमित रह गई और वर्तमान में राष्ट्रीय संसद में इसकी स्थिति कमजोर है। दिल्ली में तीन बार सरकार चला चुके हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव सीमित रहा।
इटली: बप्पे ग्रिल्लो का फाइव स्टार मूवमेंट
इटली के हास्य कलाकार बप्पे ग्रिल्लो द्वारा स्थापित फाइव स्टार मूवमेंट भी तत्कालीन आक्रोश से जन्मी और मुख्यधारा की राजनीति में आने की कोशिश करने वाली पार्टी का उदाहरण है।
२०१३ के चुनाव में अप्रत्याशित २५% वोट मिले, लेकिन बाद के वर्षों में आंतरिक कलह और पहचान संकट से जूझ रही है। २०२४ में पार्टी ने ग्रिल्लो के साथ औपचारिक संबंध तोड़ दिए। विश्लेषकों के अनुसार यह कट्टर विरोध आंदोलन से परंपरागत वामपंथी राजनीतिक शक्ति में रूपांतरण प्रक्रिया है।
युगांडा: बॉबी वाइन का पिपुल पावर
युगांडा के लोकप्रिय गायक बॉबी वाइन ने २०१७ में स्थापित पिपुल पावर आंदोलन की शुरुआत में बड़ी युवा भागीदारी हुई। बाद में यह नेशनल यूनिटी प्लेटफॉर्म में बदल गया। लगभग एक दशक बाद इसका राजनीतिक प्रभाव कमजोर पड़ा।
अध्ययन बताते हैं कि आक्रामक भाषण और कार्यकर्ता परिचालन ने आंतरिक निराशा बढ़ाई, और अब पार्टी पारंपरिक संरचना में बदलने की स्थिति में है।
बांग्लादेश: छात्र आंदोलन से जन्मी एनसीपी
बांग्लादेश में छात्र आंदोलन से जन्मी नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) संघर्ष के बावजूद राजनीतिक यात्रा में चुनौतियों का सामना कर रही है। जुलाई २०२४ में सरकार-विरोधी आंदोलन ने प्रधानमंत्री शेख हसीना के शासन को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

शेख हसीना के इस्तीफे के बाद पार्टी राजनीतिक दल में परिवर्तित हुई, लेकिन राष्ट्रीय चुनाव के नजदीक कमजोर संगठन और संसाधनों के अभाव के कारण संघर्ष कर रही है। विरोध की मूल भावना रखने वाले छात्रों और पार्टी नेतृत्व में गहरा विभाजन दिखा। हालिया संसदीय चुनाव में एनसीपी सिर्फ ६ सीटों तक सीमित रह गई।
स्पेन: पोडेमोस के उतार-चढ़ाव
२०११ के विद्रोही आंदोलन लस इंडिगनाडोस से जन्मी पोडेमोस पार्टी ने २०१५ के आम चुनाव में अप्रत्याशित तीसरा स्थान हासिल करके मजबूत उपस्थिति दिखाई।
लेकिन सत्ता में आने के बाद पोडेमोस ने अपनी कट्टरपंथी पहचान खो दी। नेता पाब्लो इग्लेसियस ने इसे संगठनात्मक कमजोरी के रूप में देखा।
राजनीतिक विशेषज्ञ बताते हैं कि इस प्रकार के मोर्चे कम समय के कारण दीर्घकालिक अस्तित्व नहीं पा पाते।
पहला: विरोध थकावट या बर्नआउट। लगातार सक्रिय रहने से प्रतिभागी थक जाते हैं।
दूसरा: वैचारिक शून्यता। ऐसे दलों में ठोस वैचारिक आधार की बजाय अस्थायी क्रोध और प्रतिशोध रहता है।
तीसरा: संगठनात्मक संघर्ष। आंदोलन से दल बनने पर नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच आंतरिक टकराव होता है।
भारत में हाल उभरी कक्रोच जनता पार्टी इन चुनौतियों से अलग होगी या नहीं, यह सवाल चर्चा में है।
ये आंदोलन दीर्घकालीन सुधार के मंच बनेंगे, बिना विरासत के समाप्त होंगे, या शासकीय दबाव को आमंत्रित करेंगे, ये तीन संभावित परिणाम हैं।
नेपाल में: पारंपरिक राजनीति से अलग वैकल्पिक राजनीतिक प्रयास हुए हैं। विवेकशील दल, नयाँ शक्ति और विवेकशील साझा पार्टी तक नागरिकवाद संगठित करने में सफल नहीं हुए।
उज्ज्वल थापा के निधन और रवींद्र मिश्र के वैकल्पिक राजनीति से पलायन ने इस धारा को कमजोर किया। बाबुराम भट्टराई ने नई शक्ति बनाने के प्रयास में पुराने दलों के साथ सहयोग कर सीमित सफलता पाई।
स्वतंत्र उम्मीदवारों की सफलता के साथ राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) लगभग दो तिहाई बहुमत की सरकार चला रही है। काठमांडू के मेयर वालेंद्र शाह (बालेन) फिलहाल रास्वपा से जुड़े हैं और प्रधानमंत्री बने हैं। धरान के मेयर हर्क सांपांग ने श्रम संस्कृति पार्टी खोली और राष्ट्रीय दल के नेता बने हैं।
कक्रोच जनता पार्टी का भविष्य क्या होगा?
सामाजिक मीडिया पर लोकप्रिय होने के बावजूद, इस पार्टी के लिए राष्ट्रीय चुनावों में सफलता पाना चुनौतीपूर्ण है। वर्चुअल लाइक और फॉलोअर्स को वास्तविक मतों में परिवर्तित करना आसान नहीं है। बांग्लादेश की एनसीपी की असफलता इसे प्रमाणित करती है।
संस्थापक अभिजित दीपे कहते हैं कि पांच साल पहले मोदी सरकार के खिलाफ कोई तैयार नहीं था, लेकिन अब नया समय आया है।
फिर भी विभिन्न राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, आवेगी आंदोलन दीर्घकालिक प्रभाव सीमित रखते हैं। विरोध प्रदर्शन महत्वपूर्ण होते हैं, पर कमजोर संगठनात्मक संरचना और वैचारिक अस्पष्टता के कारण स्थायी परिवर्तन संभव नहीं होता।
कार्नेगी के अध्ययन से पता चलता है कि २०१७ से २०२४ के बीच हुए अधिकांश सरकार विरोधी प्रदर्शन का कोई स्थायी राजनीतिक प्रभाव नहीं पड़ा।
आवेग में बने दलों की आयु कम होती है। स्थायी राजनीतिक सफलता के लिए स्पष्ट विचार, दूरदर्शिता और संगठनात्मक शक्ति आवश्यक होती है। कक्रोच जनता पार्टी को भी इसी पर ध्यान देना होगा।
