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‘पोस्टमार्टम किया होता तो दरबार हत्याकांड के कई रहस्य खुलते’

समाचार सारांश

  • 2058 साल के दरबार हत्याकांड के बाद तत्कालीन मुमाबडामहारानी के निर्देश पर फोरेंसिक विशेषज्ञ डा. हरिहर वस्ती की टीम को पोस्टमार्टम करने नहीं दिया गया।
  • पर्याप्त चिकित्सा विवरण न होने के कारण गलत विश्लेषण की संभावना व्यक्त करते हुए डा. वस्ती ने जांच समिति को दरबार हत्याकांड की मेडिको-लीगल रिपोर्ट देने से इनकार किया।
  • अगर पोस्टमार्टम और लैब परीक्षण किए गए होते तो युवराज दीपेन्द्र की मृत्यु का समय, आत्महत्या या हत्या, तथा नशीले पदार्थ की मात्रा आसानी से पता चल सकती थी।

2058 जेठ 19 को दरबार हत्याकांड नेपाली इतिहास की सबसे दर्दनाक और रहस्यमय घटनाओं में से एक है। इस घटना के वास्तविक तथ्य उजागर करने के लिए वैज्ञानिक जांच (फोरेंसिक जांच) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। हालांकि, उस समय फोरेंसिक विशेषज्ञ डा. हरिहर वस्ती सहित टीम को छाउनी अस्पताल लाने के बाद भी अंतिम समय पर पोस्टमार्टम करने नहीं दिया गया।

प्रधान न्यायाधीश केशवप्रसाद उपाध्याय की अध्यक्षता में सभामुख तारानाथ रानाभाट सदस्यता वाली दो सदस्यीय जांच समिति ने सात दिन में जो रिपोर्ट तैयार की, उस निष्कर्ष पर कई लोगों को भरोसा नहीं था। रिपोर्ट में कहा गया था कि युवराज दीपेन्द्र ने सभी की हत्या की और फिर आत्महत्या की।

करीब साढ़े दो दशक बाद यदि उस समय पोस्टमार्टम कराया जाता तो क्या होता? क्या युवराज दीपेन्द्र ने आत्महत्या की थी या नहीं, उन्होंने कौन से नशीले पदार्थ लिए थे, तथा राजा वीरेन्द्र की मृत्यु कब हुई – जैसे वैज्ञानिक तथ्य कैसे सामने आते? पोस्टमार्टम के माध्यम से इस घटना के कौन-कौन से पहलू उजागर होते? इन सवालों के इर्द-गिर्द फोरेंसिक विशेषज्ञ डा. हरिहर वस्ती के साथ संत गाहा मगर और पुष्प चौलागाईं ने की गई बातचीत का संपादित अंश प्रस्तुत है:

हम करीब साढ़े दो दशक पुरानी घटना याद करना चाहते हैं। 2058 जेठ 19 को दरबार में हुई घटना के समय आप कहां थे? आपको यह घटना कैसे पता चली?

दरबार हत्याकांड की उस रात: फोरेंसिक विशेषज्ञ डा. वस्ती को क्यों रातों-रात छुपाकर घर ले जाया गया?

जांच के संदर्भ में मेरी कहानी कुछ अलग थी। हम तीन फोरेंसिक मेडिसिन विशेषज्ञ, काठमाडौ पुलिस के डीएसपी और इंस्पेक्टर, सरकारी वकील व सीडीओ एक साथ शाम के समय ठमेल के एक होटल में बैठक के लिए इकट्ठे हुए थे।

बैठक देर से साढ़े सात बजे शुरू हुई और बाद में खाना खाया। कार्यक्रम के समाप्ति के समय हमें अजीब सा एहसास हुआ, जिसका बाद में पता चला।

अचानक पुलिस अधिकारी गायब हो गए। खाना खाते-खाते वे जल्दी से निकल गए। सीडीओ भी चले गए। सरकारी वकील और हम ही वहां रह गए।

जब पूछा गया, तो जूनियर पुलिस अधिकृत ने बताया, ‘सालों को घर भेजने का आदेश मिला है।’ हमें कुछ नहीं पता था। अंततः हमें गाड़ी में बैठाकर घर भेज दिया गया।

हम तीन फोरेंसिक विशेषज्ञ थे – डा. प्रमोद श्रेष्ठ, डा. तुलसी कंडेल और मैं। हमारा उद्देश्य पुलिस जांच को और प्रभावी बनाने की चर्चा करना था। पर उस रात हमें घर भेज दिया गया और हमें कुछ पता नहीं चला।

रात लगभग 3 बजे मेरे करीबी ने कनाडा से फोन किया और बताया कि बीबीसी पर राजदरबार और छाउनी अस्पताल के दृश्य दिखाए गए हैं। तब जाकर पूरी घटना की वास्तविकता सामने आई।

आपको बार-बार वीरेन्द्र सैनिक अस्पताल ले जाकर भी पोस्टमार्टम करने नहीं दिया गया, सही है?

उससे पहले की बात करनी होगी। यह मेरा पेशे से जुड़ा एक जटिल मामला है।

पहले दिन सुबह पुलिस ने हमें कहा कि 9-10 बजे छाउनी अस्पताल ले जाएंगे, वहां पोस्टमार्टम करना है। बताया गया कि शव टिचिंग अस्पताल ले जाने की बात नहीं है, वहीं काम करना होगा।

हमने तैयारी पूरी कर ली थीं। सोचा काम हो जाएगा। लेकिन करीब 3 बजे जब शव रखने की तैयारी थी, आर्मी के वरिष्ठ अधिकारियों ने सूचना दी कि मुमाबडामहारानी ने मना किया है इसलिए पोस्टमार्टम न करें।

दिन बितने के बाद हमें घर भेज दिया गया। चार दिन बाद भी हम काम नहीं कर पाए।

जेठ 22 की सुबह पांच बजे राजा घोषित युवराज दीपेन्द्र के निधन की खबर आई। हमें फिर सुबह 8 बजे छाउनी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन भीड़ इतनी बड़ी थी कि अस्पताल तक पहुंचना संभव नहीं था। भीड़ में दबाव और उत्तेजना दोनों थे।

बेकाबू भीड़ ने ‘डॉक्टर्स पोस्टमार्टम करने आए हैं’ कहते हुए शव की सही जांच की मांग की।

फिर हम वहीं कमरे में बैठे थे जब करीब चार बजे आर्मी अधिकारी ने दोबारा सूचना दी कि मुमाबडामहारानी ने मना किया है, वापिस जाएं।

दिन भर हम वहीं रुके रहे लेकिन काम नहीं कर सके।

दरबार हत्याकांड के अनुत्तरित सवाल: जिनका वैज्ञानिक जवाब फोरेंसिक जांच ने रोका:

तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश केशवप्रसाद उपाध्याय के संयोजन में बनी जांच समिति ने आपकी राय क्यों मांगी थी?

उस समय आयोग दो सदस्यीय था। मुझे एक पत्र आया और सिर्फ मुझे बुलाया गया। मैं उस वक्त टिचिंग अस्पताल में था। ‘आयोग में उपस्थित होना’ एक अनौपचारिक अनुरोध था।

मैं गया। डा. खगेन्द्र श्रेष्ठ ने मुझे सिंहदरबार के अंदर कार्यालय में ले जाकर स्वागत किया। वे शाही चिकित्सक और कार्डियोलॉजिस्ट थे। उन्होंने कहा कि मेडिकल रिकार्ड्स के साथ मेडिको-लीगल राय देनी होगी।

मैंने कहा – ‘यह मैं नहीं कर सकता। इलाज करने वाले डॉक्टरों ने जरूरी विवरण नहीं दिए, इस तरह रिपोर्ट बनाना संभव नहीं।’

उन्होंने मुझसे कहा कि वे मनाने लगे, पर मैंने स्पष्ट कह दिया कि यह चीज मुझसे संभव नहीं।

मैंने औपचारिक रूप से सवालों के जवाब देते हुए कहा कि हमें जांच करने नहीं दिया गया, केवल बैठने और प्रतीक्षा करने को कहा गया।

मैंने अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स एफ. केनेडी की हत्या के मामले की गलत रिपोर्टिंग और रिकॉर्ड न होने को याद किया और विश्व के ज्ञात उदाहरण दिए।

मुझसे पूछा गया, ‘पोस्टमार्टम करना है या नहीं?’ मैंने प्रसिद्ध केस के आधार पर उसका उत्तर दिया।

क्या गोली लगी थी? कितनी गोली लगी? किस बंदूक से लगी? इसका पता लगाना जरूरी था। बैलेस्टिक विशेषज्ञ इसकी पहचान कर सकते थे।

लेकिन पोस्टमार्टम नहीं हुआ और काम रोक दिया गया।

पोस्टमार्टम होने पर क्या-क्या खुलता?

नशीले पदार्थों की उपस्थिति, मृत्यु का समय, आत्महत्या या हत्या करना, गोली की संख्या और दूरी – ये सब प्रमाण होते।

दीपेन्द्र और परिवार के अन्य सदस्यों की मृत्यु सही तारीख पर पता लग सकती थी।

विज्ञान के माध्यम से कई तथ्य स्पष्ट हो सकते थे।

शराब या अन्य नशीले पदार्थों से व्यक्ति पर क्या प्रभाव पड़ा यह भी जाना जा सकता था।

पोस्टमार्टम न होने से क्या समस्या हुई?

पर्याप्त तथ्य न होने से गलत निष्कर्ष निकलने की संभावना थी। शव और जांच स्थल के तथ्य मेल नहीं खा सके।

घटना सही तरीके से जांच नहीं हो सकी, सत्य अंधेरे में रह गया।

अगर पोस्टमार्टम कराया जाता तो अब उन्नत तकनीकों के चलते कुछ विश्लेषण संभव होते, लेकिन इतने समय बाद घटना स्थल और वस्तु का अभाव कठिनाई पैदा करता।

तस्वीर/वीडियो: शंकर गिरि