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लेखक: space4knews

गणेश ने मलेशिया ओपन अंतरराष्ट्रीय तेक्वांडो में जीता स्वर्ण पदक

नेपाल के गणेशबहादुर खड़का ने नवम मलेशिया ओपन अंतरराष्ट्रीय तेक्वांडो प्रतियोगिता में शनिवार को स्वर्ण पदक जीता है। इसी प्रतियोगिता में नेपाली खिलाड़ी मुहम्मद उमर खान, संदीप न्यौपाने और सरोज भुजेल ने क्रमशः तीन कांस्य पदक भी हासिल किए हैं। टीम प्रमुख दिवाकर केसी ने इस जानकारी की पुष्टि की है। यह प्रतियोगिता 3 मई तक चलेगी।

गणेश की इस सफलता ने नेपाली तेक्वांडो को और ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। स्वर्ण पदक जीतने के लिए उन्होंने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। वहीं, तीनों खिलाड़ियों ने कांस्य पदक जीतकर नेपाल का मान बढ़ाया है। इस प्रतियोगिता का आयोजन दो दिनों तक चला और इसका समापन 3 मई को होगा।

संक्रमणकालीन न्याय हेर्ने दुवै आयोगका पदाधिकारी पनि पदमुक्त हुने

संक्रमणकालीन न्याय आयोग के दोनों पदाधिकारी पदमुक्त किए जाएंगे

सरकार ने संक्रमणकालीन न्याय से संबंधित सत्य निरुपण तथा मेलमिलाप आयोग और बेपत्ता व्यक्तियों की छानबीन आयोग के पदाधिकारियों को पदमुक्त करने का अध्यादेश जारी किया है। राजपत्र में इस अध्यादेश के प्रकाशन के साथ ही दोनों आयोगों के 5-5 पदाधिकारी पदमुक्त हो जाएंगे। इन पदाधिकारियों की नियुक्ति प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार ने की थी। दोनों आयोग द्वंद्वकालीन घटनाओं की छानबीन और जांच को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने में सक्षम नहीं थे और द्वंद्व पीड़ितों ने भी असहमति जताई थी।

19 वैशाख, काठमाडौं। सरकार ने संक्रमणकालीन न्याय से जुड़े इन दोनों आयोगों के पदाधिकारियों को पदमुक्त करने के लिए नया अध्यादेश जारी किया है। शनिवार को जारी राजनीतिक नियुक्ति से संबंधित पदाधिकारी पदमुक्त करने वाले इस अध्यादेश में सत्य निरुपण तथा मेलमिलाप आयोग और बेपत्ता व्यक्तियों की छानबीन आयोग के पदाधिकारियों को पदमुक्त करने का प्रावधान शामिल किया गया है। राजपत्र में इसके प्रकाशित होते ही दोनों आयोगों के पांच-पांच पदाधिकारी मुक्त हो जाएंगे। इन पदाधिकारियों की नियुक्ति ओली सरकार ने की थी।

दोहों आयोग के पदाधिकारियों के चयन पर द्वंद्व पीड़ितों ने असहमति व्यक्त की थी। साथ ही, ये आयोग द्वंद्वकालीन घटनाओं की छानबीन और जांच की प्रक्रिया को प्रभावशाली ढंग से आगे नहीं बढ़ा पाए थे। सत्य निरुपण तथा मेलमिलाप आयोग के अध्यक्ष महेश थापा हैं, जबकि सदस्य हैं अच्युत प्रसाद भण्डारी, टीकाप्रसाद ढकाल, पदमबहादुर शाही और कुमारी कौशल्या ओझा। वहीं, बेपत्ता व्यक्तियों की छानबीन आयोग के अध्यक्ष लिलादेवी गड्तौला हैं और सदस्य हैं गोपालनाथ योगी, अग्नी प्रसाद थपलिया, श्रृजना पोखरेल तथा विनिता नेपाली।

खुकुरी खोजने गए दो व्यक्ति भिरी से गिर कर मौत

१९ वैशाख, खोटाङ। खोटाङ में भिरी से गिरने से दो व्यक्तियों की मृत्यु हो गई है। बराहपोखरी गाउँपालिका–५ पौवासेरा क्षेत्र के ५२ वर्षीय बमहादुर राई और ४० वर्षीय मनीकुमार राई घटना स्थल पर ही भिरी से गिरकर मृत पाए गए हैं। शनिवार दोपहर दोनों की स्थानीय ढकालेखोला भिरी से गिरने से मृत्यु हुई, इसकी जानकारी बराहपोखरी–५ के वार्ड अध्यक्ष फौदराज राई ने दी है।

शुक्रवार को बमबहादुर घोड़ा घास काटने गए थे और उनकी खुकुरी खो गई थी। उसी खुकुरी को खोजने के लिए शनिवार को पड़ोसी मनीकुमार राई भी अपने दोस्त के साथ गए थे। स्थानीय लोगों के अनुसार, जब एक व्यक्ति भिरी से पांव फिसला गया, तो दूसरा उसे पकड़ने की कोशिश में दोनों ही भिरी से गिर गए। पुलिस ने बताया कि दोनों शवों को उदयपुर के बेलटार ले जाकर पोस्टमार्टम करने की तैयारी की जा रही है।

पुष्पराज स्मृति टेबलटेनिस प्रतियोगिता में संयोग और नविता विजेता घोषित

समाचार संक्षेप परिष्कृत बाद प्रस्तुत किया गया है। संयोग कपाली और नविता श्रेष्ठ ने दूसरे पुष्पराज स्मृति राष्ट्रीय खुला टेबलटेनिस प्रतियोगिता के खुला सिंगल्स में पुरुष और महिला चैंपियनशिप जीती हैं। पुरुष फाइनल में संयोग ने रुविन महर्जन को पाँच सेट में हराया जबकि महिला फाइनल में नविता ने इवाना थापा को पराजित किया। प्रतियोगिता में 200 खिलाड़ियों ने 6 विभागों में प्रतिस्पर्धा की और विजेताओं को कुल 2 लाख रुपये नकद पुरस्कार दिया गया। 19 वैशाख, काठमांडू। संयोग कपाली और नविता श्रेष्ठ ने दूसरे पुष्पराज स्मृति राष्ट्रीय खुला टेबलटेनिस प्रतियोगिता के खुला सिंगल्स में शनिवार को चैंपियन के रूप में अपना दांव जमा लिया। संयोग पुरुष वर्ग में जबकि नविता महिला वर्ग में विजेता बनीं। दोनों नेपाल पुलिस के खिलाड़ी हैं। लैनचौर स्थित राष्ट्रीय टेबलटेनिस प्रशिक्षण केंद्र में हुए पुरुष फाइनल में संयोग ने एभीएम के रुविन महर्जन को 8-11, 17-15, 11-9, 6-11 और 11-9 के सेट स्कोर से परास्त किया। पुलिस के गणन्जय दाहाल और विजन टेबलटेनिस अकादमी के हिमाल विष्ट ने तीसरा स्थान प्राप्त किया। ललितपुर महानगरपालिका वडा 11 के मुख्य प्रायोजन में खोल्चा पुखु खेलकूद उपसमिति द्वारा आयोजित महिला सिंगल्स प्रतियोगिता में 9 बार की राष्ट्रीय चैंपियन नविता ने एभीएम की इवाना थापा को 11-8, 12-14, 11-6, 7-11 और 15-13 के रुझान से हराया। एभीएम की वियांका राय और विजन की यूंगी पौडेल तीसरे स्थान पर रहीं। 40 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के पुरुष सिंगल्स वेटरंस प्रतियोगिता में काठमांडू महानगरपालिका वडा 25 के महेश श्रेष्ठ ने प्रथम स्थान हासिल किया। एभीएम के राजकुमार शाही दूसरे और इखाछेन के मुकेश महर्जन तथा काठमांडू के उमेश मानन्धर ने तीसरा स्थान पाया। 50 वर्ष से ऊपर पुरुष सिंगल्स में एभीएम के जय महर्जन ने स्वर्ण पदक जीता। नक्साल के रक्त मानन्धर को रजत पदक प्राप्त हुआ जबकि खोल्चा पुखु के नदीमरत्न शाक्य और इखाछेन के राजेन्द्र वज्राचार्य ने कांस्य पदक से सम्मानित हुए। ललितपुर जिला टेबलटेनिस संघ के सहयोग और स्पिन इवेंट्स प्रालि के प्रबंधन में हुए 60 वर्ष से ऊपर के पुरुष सिंगल्स वेटरंस वर्ग में काठमांडू 2 के अशोक शर्मा ने प्रथम, होप्स के राजन सुब्बा ने द्वितीय तथा खोल्चा पुखु के प्रकाश धाक्वा और इखाछेन के शरदमान श्रेष्ठ ने तृतीय स्थान हासिल किया। यू-16 मिक्स यूथ स्पर्धा में एभीएम के आरभ मल्ल, इखाछेन के सोयम महर्जन, इखाछेन के सुप्रिन्स महर्जन और खोल्चा पुखु के निर्भिक शाक्य ने क्रमशः शीर्ष तीन स्थान प्राप्त किए। इस स्पर्धा में केवल ललितपुर महानगरपालिका वडा 11 के प्रतियोगी शामिल थे। विजेताओं को ललितपुर महानगरपालिका के मेयर चिरीबाबु महर्जन, वडा 11 के अध्यक्ष अरोजकुमार खड्गी, अखिल नेपाल टेबलटेनिस संघ के उपाध्यक्ष पूर्णशंकर श्रेष्ठ, प्रदेश खेलकूद विकास परिषद् बागमती प्रदेश के सदस्य रवि महर्जन, टेबलटेनिस के मुख्य प्रशिक्षक मोहनदास बासु समेत अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने एक समारोह में पुरस्कार प्रदान किए। दो दिवसीय प्रतियोगिता में 200 खिलाड़ी विभिन्न 6 स्पर्धाओं में शामिल हुए। सभी स्पर्धाओं के पदक विजेताओं को कुल 2 लाख रुपये नकद पुरस्कार बांटा गया।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोगका अध्यक्ष अधिकारीले पनि दिए राजीनामा

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष प्रा. डॉ. देवराज अधिकारी ने दिया इस्तीफा

समाचार सारांश: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष प्रा. डॉ. देवराज अधिकारी ने अध्यादेश जारी होने से पहले शुक्रवार को इस्तीफा दे दिया है। सरकार ने राजनीतिक नियुक्तियों को समाप्त करने के उद्देश्य से 110 कानूनों में संशोधन कर 1,500 से अधिक नियुक्तियां रद्द करने वाला अध्यादेश जारी किया है। त्रिभुवन विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रा. डॉ. दीपक अर्याल समेत अन्य पदाधिकारियों ने भी इस्तीफा दिया है। 19 वैशाख, काठमांडू।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष प्रा. डॉ. देवराज अधिकारी ने भी अध्यादेश जारी होने से पहले शुक्रवार को इस्तीफा दिया था। उन्होंने कहा, ‘अध्यादेश जारी होने से पहले ही मैंने कल ही इस्तीफा दे दिया है।’ वे २०७९ माघ में अध्यक्ष पद पर नियुक्त किए गए थे। सरकार ने पूर्ववर्ती सरकार के दौरान हुई राजनीतिक नियुक्तियों को समाप्त करने के लिए यह अध्यादेश जारी किया है। राष्ट्रपति कार्यालय के अनुसार, विभिन्न 110 कानूनों में संशोधन कर 1,500 से अधिक राजनीतिक नियुक्तियों को निरस्त करने के लिए यह अध्यादेश जारी किया गया है। राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने उक्त अध्यादेश आज ही जारी कर दिया है।

अध्यादेश के लागू होने से पहले त्रिभुवन विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रा. डॉ. दीपक अर्याल समेत अन्य पदाधिकारियों ने भी इस्तीफा दिया था। 17 वैशाख को उपकुलपति अर्याल के साथ-साथ शिक्षाध्यक्ष प्रा. डॉ. खड्ग केसी और रजिस्ट्रार प्रा. डॉ. केदारप्रसाद रिजाल ने इस्तीफा दिया था। इसी तरह, शुक्रवार को संस्कृत विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रा. डॉ. धनेश्वर नेपाल ने भी इस्तीफा दिया। उसी तरह त्रिवि सेवा आयोग के अध्यक्ष प्रा. डॉ. धनश्याम भट्टराई ने भी इस्तीफा दिया है।

त्रिवि सेवा आयोग के अध्यक्ष भट्टराई ने पद से इस्तीफा दिया

१९ वैशाख, काठमाडौं। त्रिभुवन विश्वविद्यालय सेवा आयोग के अध्यक्ष प्रा.डा. धनश्याम भट्टराई ने पद से इस्तीफा दिया है। शनिवार को उन्होंने अपने इस्तीफे की जानकारी दी। ‘मैंने आज पद से इस्तीफा दिया है,’ उन्होंने बताया। त्रिभुवन विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति और तत्कालीन प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड’ ने उन्हें त्रिवि सेवा आयोग के अध्यक्ष के पद पर नियुक्त किया था।

बालेन्द्र शाह के नेतृत्व वाली वर्तमान सरकार पूर्ववर्ती सरकार के दौरान हुई राजनीतिक नियुक्तियों को रद्द करने की तैयारी कर रही है। इसी के तहत तैयार की गई अध्यादेश सरकार द्वारा राष्ट्रपति कार्यालय को भेजी गई थी, जिसे राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने आज जारी कर दिया है। इससे पहले त्रिभुवन विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रा.डा. दीपक अर्याल समेत अन्य पदाधिकारियों ने भी इस्तीफा दिया है। १७ वैशाख को उपकुलपति अर्याल, शिक्षाध्यक्ष प्रा.डा. खड्ग केसी और रजिस्ट्रार प्रा.डा. केदारप्रसाद रिजाल ने इस्तीफा दिया था। इसी प्रकार, शुक्रवार को संस्कृत विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रा.डा. धनेश्वर नेपाल ने भी इस्तीफा दिया।

एनसेल बाह्रखरी गोल्फ प्रतियोगिता में उज्ज्वल और विपना ने उपाधि जीत ली

एनसेल बिजनेस बाह्रखरी गोल्फ प्रतियोगिता के नौवें संस्करण में पुरुष वर्ग में उज्ज्वल प्रधानांग और महिला वर्ग में विपना श्रेष्ठ ने उपाधि जीती है। प्रतियोगिता में 105 महिला और पुरुष खिलाड़ियों ने भाग लिया था और विजेताओं को पुरस्कार स्वरूप सोने का बॉल दिया गया।

सीनियर वर्ग 60 वर्ष से ऊपर के खिलाड़ियों के लिए था, जिसमें विजय बहादुर श्रेष्ठ ने उपाधि हासिल की। 19 वैशाख को काठमांडू के गोकार्ण गोल्फ क्लब में शनिवार को आयोजित प्रतियोगिता में प्रधानांग ने 40 अंक और श्रेष्ठ ने 37 अंक प्राप्त किए।

प्रतियोगिता के विजेताओं को सम्मानित करने हेतु प्रमुख न्यायाधीश सपना मल्ल प्रधान, प्रधानमंत्री बालेन शाह की पत्नी (फर्स्ट लेडी) सबिना काफ्ले, साइमेक्स इंक की प्रबंध निदेशक यमुना श्रेष्ठ, नेपाल डिस्टिलरी के सीईओ रमेश कृष्णन, बाह्रखरी मीडिया के प्रबंध निदेशक ज्ञानेश्वर आचार्य तथा अध्यक्ष एवं प्रधान संपादक प्रतीक प्रधान ने संयुक्त रूप से पुरस्कार प्रदान किए।

प्रतियोगिता का एक विशेष आकर्षण ‘होल इन वन’ इस वर्ष भी किसी खिलाडी द्वारा हासिल नहीं किया जा सका, जिससे आयोजकों ने अवगत कराया है।

चान्सलरले युद्धको आलोचना गरेको आक्रोशमा जर्मनबाट ५ हजार सैनिक फिर्ता गर्दै ट्रम्प

ट्रम्प ने जर्मनी से 5,000 सैनिक वापस बुलाने का निर्णय, चांसलर की युद्ध आलोचना से जुड़ा

अमेरिका ने आगामी 6 से 12 महीनों के भीतर जर्मनी से लगभग 5,000 सैनिक वापस बुलाने का निर्णय लिया है। यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प और जर्मन चांसलर मर्ज की विवादपूर्ण टिप्पणियों के बाद आया है। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सैन्य वापसी से नाटो की एकता कमजोर हो सकती है और यूरोप में अमेरिकी प्रभाव कम हो सकता है।

अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह प्रक्रिया अगले 6 से 12 महीनों के भीतर पूरी होगी। मर्ज ने पिछले महीने एक कार्यक्रम में कहा था कि अमेरिका के पास कोई स्पष्ट योजना नहीं है और इस युद्ध से कैसे बाहर निकला जाए यह ज्ञात नहीं है। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने ईरान समझौते को सफलतापूर्वक लागू नहीं किया और इस कारण बिना किसी नतीजे के इस्लामवाद से निपटना पड़ रहा है, जिससे अमेरिका ईरान के सामने अपमान के स्थिति में है।

जर्मनी में 36,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। दिसंबर तक वहां 36,000 से अधिक अमेरिकी सैनिक मौजूद थे। ट्रम्प ने यूरोपीय देशों को ‘कागजी बाघ’ कहते हुए आरोप लगाया कि जरूरत पड़ने पर ये देश अनावश्यक और असहाय साबित होते हैं। सैनिकों की वापसी का यह प्रयास राष्ट्रपति ट्रम्प की जर्मनी से सैनिकों की वापसी की सार्वजनिक योजना का हिस्सा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका ने जर्मनी से सैनिक वापस बुलाए तो इससे नाटो की एकता कमजोर होगी। अमेरिकी संसद में भी इस निर्णय की आलोचना हो रही है। कई नेताओं ने इसे जिम्मेदारीहीन कदम बताया है और कहा है कि इससे यूरोप में अमेरिकी प्रभुत्व कमजोर हो सकता है।

अमिताभ कान्त ने नेपाल की आर्थिक समृद्धि के लिए नई नीतियों का सुझाव दिया

२० वैशाख, काठमाडौँ । भारतीय नीति विश्लेषक अमिताभ कान्त ने नेपाल की आर्थिक समृद्धि के लिए साहसिक नीतिगत सुधार, डिजिटल पूर्वाधार में निवेश और उच्च मूल्य वाले पर्यटन को बढ़ावा देने पर जोर दिया है। बाह्रखरी मीडिया द्वारा शनिवार को काठमाडौँ में आयोजित ‘‘नेपाल की अर्थव्यवस्था: संभावनाओं का खुलासा’’ विषयक विचार गोष्ठी में उन्होंने कहा कि सरकार को नियामक नहीं, बल्कि सहजकर्ता की भूमिका निभानी चाहिए। ‘‘अधिकाधिक लाइसेंस, निरीक्षण और कर्मचारी प्रशासनिक अधिकार भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं,’’ कान्त ने कहा, ‘‘सरकार को नियामक नहीं, बल्कि सहजकर्ता बनना चाहिए। नेपाल को व्यवसायों के लिए विश्व का सबसे सरल देश बनाना होगा।’’ उन्होंने कहा कि नेपाल को आने वाले तीन दशकों में वार्षिक ९ से १० प्रतिशत आर्थिक वृद्धि का लक्ष्य रखना चाहिए। हाल की चुनाव प्रक्रिया और युवा पीढ़ी की आकांक्षाओं को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी सुशासन, ईमानदारी और आर्थिक परिवर्तन की मांग कर रही है। प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह को प्राप्त जनादेश के सफल कार्यान्वयन के लिए शुभकामनाएँ देते हुए कान्त ने नेपाल और भारत के बीच मित्रता एवं सहयोग को और मजबूत करने पर बल दिया।

लगभग एक दशक पहले भारत विश्व के पांच कमजोर अर्थव्यवस्थाओं (फ्रैजाइल फाइव) में से एक था, याद दिलाते हुए कान्त ने कहा कि संरचनात्मक सुधारों, व्यापक डिजिटलाइजेशन और अवसंरचना निर्माण की बदौलत भारत आज विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। उन्होंने कहा कि ये अनुभव नेपाल के लिए भी प्रासंगिक हो सकते हैं। नेपाल की भौगोलिक जटिलताओं को आसान बनाने में डिजिटल पूर्वाधार सबसे प्रभावकारी माध्यम होगा। उन्होंने भारत के ‘डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर’ के उदाहरण के रूप में बताया कि इससे ७१० से अधिक सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे आम नागरिकों के बैंक खातों तक राज्य ने पहुँचाया है, जिससे भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार के रिसाव को लगभग समाप्त किया जा सका है। नेपाल को भी टेलिकॉम और आईटी क्षेत्र को प्राथमिकता देते हुए फाइव-जी तकनीक में तेजी से उन्नति करनी होगी, जिससे स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव आएगा, कान्त ने कहा।

नेपाल के विकास में बाधक पुराने कानून, नियम और जटिल प्रक्रियाओं को समाप्त करने के लिए उन्होंने नियामकीय कटौती की अवधारणा पेश की। पर्यटन को नेपाल की ‘फ़ोर्स मल्टिप्लायर’ के रूप में परिभाषित करते हुए कान्त ने सुझाव दिया कि नेपाल को ‘‘बजट ट्रेकिंग डेस्टिनेशन’’ से ऊपर उठाकर ‘‘लक्ज़री’’ पर्यटन स्थल बनाना चाहिए। ‘‘नेपाल जैसे अद्वितीय पर्यटन क्षेत्र को कम कीमत पर बेचना उचित नहीं है,’’ उन्होंने कहा, ‘‘हमें कम से कम प्रति रात १५०० डॉलर खर्च करने वाले पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए पूर्वाधार और ब्रांडिंग पर ध्यान देना होगा।’’ उन्होंने अयोध्या और जनकपुर को जोड़ने वाले ‘‘रामायण सर्किट’’ जैसे अंतरराष्ट्रीय पर्यटन परियोजनाओं से लाभ उठाने की बात कही। इसके अतिरिक्त, नेपाल को १०० प्रतिशत इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग पर जोर देते हुए विश्व में स्थायी और हरित विकास का उदाहरण बनना चाहिए। उन्होंने जलविद्युत, कृषि प्रसंस्करण और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे तुलनात्मक लाभ वाले क्षेत्रों पर केंद्रित होने का आग्रह किया। आर्थिक विकास का नेतृत्व निजी क्षेत्र को करना चाहिए, परंतु इसके साथ ईमानदारी अनिवार्य है, कान्त ने कहा। राजनेताओं और व्यवसायियों के बीच अपारदर्शी गठजोड़ देश के विकास में बाधा डालता है, इसलिए उन्होंने युवा उद्यमियों को प्रोत्साहित करने और महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने की सलाह दी। नेपाल के विकास में भारत का पूर्ण समर्थन रहेगा, यह भरोसा दिलाते हुए कान्त ने नेपाल की भौगोलिक और सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक प्रौद्योगिकी के साथ जोड़कर आगे बढ़ने का सुझाव दिया।

लिपुलेक: भारत इस साल कालापानी रास्ते ५०० यात्रियों को मानसरोवर तीर्थयात्रा के लिए भेजेगा, नेपाल क्या करेगा?

भारत ने अगले महीने से लिपुलेक मार्ग से कैलाश मानसरोवर यात्रा शुरू करने की घोषणा की है, जिसके बाद विशेषज्ञों ने काठमांडू की तीखी प्रतिक्रिया के बजाय कूटनीतिक समझदारी के माध्यम से समाधान खोजने पर ज़ोर दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस सप्ताह के भीतर यह निर्णय सार्वजनिक किया कि लिपुलेक रास्ते से ५०० भारतीय तीर्थयात्रियों को १० समूहों में जून से अगस्त तक मानसरोवर यात्रा के लिए भेजा जाएगा। यह विवरण प्रधानमंत्री वालेन्द्र शाह के सरकार गठन के एक महीने के भीतर आया है। दिल्ली से शुरू की जाने वाली इस यात्रा के सातवें दिन, तीर्थयात्री ५ हजार मीटर से ऊपर स्थित लिपुलेक पास पार करके ताक्लाकोट पहुंचेंगे। चीन में प्रवेश करने के बाद इस दल का प्रबंधन चीनी पक्ष द्वारा किया जाएगा, जैसा कि भारतीय विदेश मंत्रालय ने २०२५ के मानसरोवर दर्शन संबंधित प्रकाशन में उल्लेख किया है।

नेपाल-भारत संबंधों में सीमा विवाद एक संवेदनशील विषय है और दोनों देशों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। हालांकि, इन मुद्दों पर औपचारिक बातचीत अभी तक नहीं हो पाई है। भारतीय विदेश मंत्रालय के दिहाड़े जारी सूचना के अनुसार, इस बार उत्तराखंड के १० और सिक्किम के १० समूह कैलाश मानसरोवर यात्रा करेंगे। आवेदन १९ मई तक लिए जाएंगे, और इण्डो-तिब्बती बॉर्डर पुलिस फोर्स भारतीय क्षेत्र में यात्रियों की सहायता करेगी। इस महीने के शुरू में, भारत के विदेश राज्यमंत्री कृति विजय सिंह ने कहा था कि कोविड के कारण २०२० से २०२४ तक यात्रा बंद थी, और चीनी अधिकारियों के साथ चर्चा के बाद पिछले साल से यात्रा पुनः शुरू हुई है।

भारतीय विदेश मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार, पहला समूह ३० जून को दिल्ली में जमा होगा, जहां वह स्वास्थ्य जांच, पासपोर्ट, वीजा संग्रहण और शुल्क भुगतान जैसी प्रक्रियाएँ पूरी करेगा, और ४ जुलाई को मानसरोवर के लिए प्रस्थान करेगा। पहला समूह २१ जुलाई को दिल्ली लौटेगा, और अगला समूह ५ अगस्त को दिल्ली में मिलेगा तथा २६ अगस्त को यात्रा समाप्त होगी। लिपुलेक मार्ग से जाने वाले तीर्थयात्री कालापानी मंदिर में भी दर्शन करेंगे। २०२५ की यात्रा के पांचवें दिन गुञ्जी से नाभीढांग होकर कालापानी मंदिर दर्शन की योजना है। भारत के सुरक्षा बल ने कालापानी क्षेत्र में पोस्ट स्थापित किया है, जिसे नेपाल बार-बार अपना भूभाग मानता है।

छठे दिन आराम के बाद सातवें दिन तीर्थयात्री संकरे और खतरनाक मार्ग से लिपुलेक पहुंचेंगे, जो १६,७३० फीट की ऊँचाई पर स्थित है। वहां चीनी गाइड यात्रियों का मार्गदर्शन करेंगे। वनस्पति कम होने के कारण, खच्चर या कुली उपलब्ध नहीं होंगे, यात्रियों को लगभग ७ किलोमीटर चढ़ाई करनी होगी। सफलतापूर्वक चढ़ाई के बाद चीनी अधिकारी उन्हें अन्य ओरालो मार्ग की दिशा देंगे। इस बार की यात्रा के गाइड अभी घोषित नहीं हुए हैं, इसलिए पिछले नियम लागू होंगे या नहीं स्पष्ट नहीं है। नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास की प्रवक्ता ने एक्स (सामाजिक मीडिया) पर घोषणा की है कि २०२६ में १००० भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए मानसरोवर यात्रा को सहज बनाया जाएगा।

कूटनीतिक मामलों के जानकार क्या कहते हैं? पिछले महीने उत्तराखंड सरकार के अधिकारी बताते हैं कि छह वर्षों बाद भारत और चीन ने लिपुलेक मार्ग से सीमा व्यापार पुनः शुरू करने की सूचना दी है। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि सरकार को लिपुलेक मामले में संवेदनशील होकर कूटनीतिक संवाद से समाधान करना चाहिए। नेपाल के पूर्व राजदूत जयराज आचार्य ने कहा, “नक्शा संसद द्वारा जारी करना एक तरह की हिम्मत है। नेपाल जैसे देश को कूटनीति में सावधानी से कदम बढ़ाना चाहिए। सभी मुद्दे बातचीत से ही सुलझाने चाहिए।” उन्होंने पंचायती युग का उदाहरण देते हुए कहा, “उस वक़्त भारत से भारतीय वायरलेस ऑपरेटर वापस किए गए थे, राजा महेन्द्र को चेतावनी मिली थी।” उन्होंने आगे कहा, “अब केवल बयानबाज़ी से काम नहीं चलेगा। संयम के साथ संवाद जरूरी है। क्योंकि हम पड़ोसी हैं, इसलिए छोटे देश को असर पड़ता है, अतः विवाद को समाधान करने के लिए महत्वपूर्ण सलाह चाहिए।”

भारत के पूर्व नेपाली राजदूत नीलाम्बर आचार्य भी संवाद और चर्चा के माध्यम से ही समाधान संभव मानते हैं। उन्होंने कहा, “हम दोनों मित्र राष्ट्र हैं। बीच में विवाद और असहमति हैं, उनका समाधान बातचीत के जरिए होना चाहिए। पहले बात शुरू करें।” पूर्व राजदूत आचार्य ने कहा, “शैली भले अलग हो, पर संवाद से ही समस्या का समाधान होना चाहिए। जब तक मामला तय न हो, संवाद जारी रखना चाहिए। विवाद हो तो वर्तमान स्थिति पर रखा जाए, जवाब कैसे आता है देखें। सभी पक्षों को तथ्य सुनना चाहिए।” लिपुलेक संदर्भ में २०१५ से नेपाल बार-बार भारतीय और चीनी सरकारों को कूटनीतिक नोट भेज चुका है। पिछले अगस्त में भारत-चीन के समझौते पर नेपाल ने प्रतिक्रिया देते हुए परराष्ट्र मंत्रालय ने कहा कि महाकाली नदी पूर्व के लिम्पियाधुरा, लिपुलेक और कालापानी नेपाल के अभिन्न भूभाग हैं। इस दावे पर भारत ने असहमति जताई और दावे को ‘तर्कसंगत साबित न होने वाला’ और ‘ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं’ बताया।

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने नेपाल के दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए कहा कि किसी भू-भाग में एकतरफा विस्तार संबंधी दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। भारत १९५४ से लिपुलेक मार्ग से चीन के साथ व्यापार कर रहा है। क्या तीन देशों के त्रिकोणीय सीमा बिंदु तय करना संभव है? सीमाविद बुद्धिनारायण श्रेष्ठ के अनुसार, नेपाल ने भारत और चीन को त्रिकोणीय सीमा प्रस्ताव भेजा है, जिससे समस्या हल हो सकती है। उन्होंने कहा, “जहां तीनों देशों की सीमा मिलती है, वहां त्रिकोणीय बिंदु तय करने से लिपुलेक विवाद अपने आप हल हो जाएगा।” १९६१–६२ में नेपाल और चीन ने अंतरराष्ट्रीय सीमांकन किया था, उस समय भारत से भी त्रिकोणीय बिंदु पर चर्चा हुई थी। उन्होंने बताया, “चीन ने नेपाल को भारत को पत्र भेजने को कहा क्योंकि भारत के साथ युद्ध के तनाव थे। नेपाल ने पत्र भेजा, लेकिन भारत ने भाग नहीं लिया। इसलिए, त्रिकोणीय बिंदु तय नहीं हो सका और समस्या बनी।” भारत और चीन के बीच भी कई सीमा विवाद हैं। नेपाल के साथ त्रिकोणीय बिंदु निर्धारण पर फिलहाल बातचीत की संभावना कम दिखती है। दोनों देश व्यापार और आर्थिक संबंधों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। भारत को द्विपक्षीय व्यापार में १०० अरब डॉलर से अधिक घाटा बताया जाता है। पिछले महीने भारतीय समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने पिथौरागढ़ जिले के अधिकारियों के हवाले से बताया कि केंद्र सरकार के निर्देश पर जून से सितंबर तक व्यापारिक गतिविधियां शुरू करने की तैयारी चल रही है।

नेपाल ने यूएई पर संघर्षपूर्ण जीत दर्ज की

नेपाल ने यूएई के खिलाफ संघर्षपूर्ण जीत हासिल की है।

समाचार सारांश

  • नेपाल ने यूएई के खिलाफ संघर्षपूर्ण जीत हासिल की है।

१८ वैशाख, काठमांडू। नेपाल ने यूएई के खिलाफ संघर्षपूर्ण जीत प्राप्त की है।

आईसीसी विश्वकप क्रिकेट लीग-2 के अंतर्गत घरेलू श्रृंखला में नेपाल ने यूएई को 6 रन से हराया। वर्षा के कारण डीएल मेथड के तहत, यूएई को 38 ओवरों में 255 रन का लक्ष्य मिला, लेकिन वे 8 विकेट खोकर केवल 248 रन ही बना सके।

यूएई के मोहम्मद शाहदाद ने सर्वाधिक 65 रन बनाए, लेकिन यह टीम की जीत के लिए पर्याप्त नहीं था। शाहदाद ने हर्पित सिंह के साथ तीसरे विकेट के लिए 80 रन की साझेदारी की, जबकि सिंह ने 41 रन बनाए। आर्यशं शर्मा ने 33, अदीब उसमानी 14, मोहम्मद जुहैब 1, और कप्तान मोहम्मद वासिम बिना कोई रन बनाए आउट हुए। खैजइमा विन तन्विर ने 26 गेंदों में 49 रन बनाए, जबकि अक्षदीप नाथ 32 गेंदों में 26 रन नाबाद रहे।

बॉलिंग में नेपाल के सन्दीप लाछिमाने ने 3 विकेट लिए, जबकि सोमपाल कामी और नन्दन यादव ने दो-दो विकेट हासिल किए।

त्रिभुवन क्रिकेट मैदान में टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए नेपाल ने निर्धारित 50 ओवरों में 7 विकेट खोकर 289 रन बनाए। उपकप्तान दीपेन्द्रसिंह ऐरी ने शतकीय पारी खेली।

दीपेन्द्र ने 94 गेंदों में 100 रन बनाए, जिनमें 13 चौके और एक छक्का शामिल था। करीब 4 साल बाद राष्ट्रीय टीम में लौटे विनोद भण्डारी ने पहले मैच में अर्धशतक लगाया। भण्डारी ने 79 गेंदों में 56 रन का योगदान दिया।

गुल्सन झा ने 44, ओपनर अर्जुन कुमाल 11, कप्तान रोहित पौडेल ने 39, भीम सार्की शून्य और अरिफ शेख 11 रन बनाकर आउट हुए। सोमपाल कामी नाबाद रहे।

बॉलिंग में यूएई के अजय कुमार और जुनैद सिद्दिकी ने दो-दो विकेट लिए, जबकि हैदर अली और खैजइमा विन तन्विर ने एक-एक विकेट चटकाया। अब नेपाल अपना चौथा मैच मंगलवार को ओमान के खिलाफ खेलेगा।

पेपालले भेन्मोलाई छुट्टै इकाई बनाउदै, व्यापार पुनर्गठनको घोषणा

पेपाल ने वेनमो को अलग इकाई के रूप में पुनर्गठन का ऐलान किया

पेपाल ने अपनी कंपनी को तीन संचालन इकाइयों में पुनर्गठित करने की घोषणा की है, जिसमें लोकप्रिय भुगतान एप ‘वेनमो’ के लिए एक अलग विभाग शामिल किया गया है। नए सीईओ इनरिक लोरेस ने कंपनी की संरचना को सरल बनाने और वृद्धि पर अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए यह कदम उठाया है। वेनमो को एक अलग खंड बनाने से इसके प्रदर्शन को ट्रैक करना आसान होगा और भविष्य में इस व्यवसाय को बेचने की संभावनाओं को भी मजबूत किया जाएगा, ऐसा विश्लेषण किया गया है। “विकास को गति देने और हमारी पूरी क्षमता को उजागर करने के लिए, हमें अपनी बुनियादी बातों पर पुनः प्रतिबद्ध होना आवश्यक है,” लोरेस ने एक विज्ञप्ति में कहा।

मार्च में धीमी ग्रोथ और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच तत्कालीन सीईओ एलेक्स क्रिसलाई को हटाए जाने के बाद कंपनी ने लोरेस को नियुक्त किया था। पुनर्गठित संरचना में वेनमो के अलावा अन्य दो इकाईयां पेपाल की उपभोक्ता और व्यापारी शाखाओं के साथ ही भुगतान सेवाओं (जिसमें ब्रेनट्री और क्रिप्टो डिवीज़न शामिल हैं) को समाहित करेंगी। यह पुनर्गठन ऐसे समय में आया है जब भुगतान सेवा प्रदाता कंपनी ‘स्ट्राइप’ के पेपाल या इसके कुछ हिस्से को खरीदने की चर्चाएं हो रही हैं। विश्लेषकों के अनुसार, पेपाल के बड़े आकार के कारण पूरी कंपनी की खरीदारी की तुलना में कुछ संपत्तियों की बिक्री की संभावना ज्यादा है।

पेपाल अगले सप्ताह सार्वजनिक होने वाले अपने ‘अर्निंग्स कॉल’ में इस पुनर्गठन के बारे में और अधिक विस्तार से जानकारी देगा। इस वर्ष बड़ी टेक कंपनियों और नए फिनटेक प्रतिस्पर्धियों के दबाव के चलते पेपाल के शेयर मूल्य में लगभग 12.7 प्रतिशत की गिरावट आई है। हालांकि, बुधवार को व्यापार पुनर्गठन की घोषणा के बाद कंपनी के शेयर की कीमत 2.6 प्रतिशत बढ़ गई है। कैलिफोर्निया के सैन जोसे में स्थित यह कंपनी वर्ष 2026 के लिए जो लाभ का पूर्वानुमान रखती है, वह वॉल स्ट्रीट की उम्मीद से कम था, जिसे सुधारने के लिए यह नई रणनीति अपनाई गई है।

घरधनी द्वारा लालपूर्जा दिखाने पर रुकी हुई डोजर ने पुनः तोड़फोड़ शुरू की

नया बसपार्क के समीप विष्णुमती नदी के किनारे अनधिकृत संरचनाओं को हटाने के लिए डोजर ने पुनः कार्य शुरू कर दिया है। सरकारी टीम ने नदी किनारे से ही जमीन उठाकर घर बनाने का निष्कर्ष निकाला है। अगर घरधनी की वैध जमीन पाई गई तो वह जमीन वापस कर दी जाएगी। १९ वैशाख, काठमांडू।

नदी किनारे की अनाधिकृत संरचनाओं को हटाने के दौरान नया बसपार्क के पास विष्णुमती नदी के किनारे पहुंचकर डोजर को रोक दिया गया था, लेकिन अब डोजर ने फिर से काम शुरू कर दिया है। उस क्षेत्र के लगभग १०-१२ घरधनियों ने अपनी लालपूर्जा होने का दावा किया था, जिसके कारण डोजर रोका गया था। काठमांडू के प्रमुख जिला अधिकारी (सीडीओ) ईश्वरराज पौडेल के अनुसार, जांच के लिए भेजी गई सरकारी टीम ने उस क्षेत्र के घरों को तोड़ने का निष्कर्ष निकाला है।

“टीम ने बताया है कि नदी के किनारे से ही जमीन उठा कर घर बनाया गया है,” सीडीओ पौडेल ने कहा, “अब उन घरों को डोजर से तोड़ने का कार्य शुरू किया गया है।” उनके अनुसार, ये घर मानकों के विपरीत बनाए गए हैं। बाद में पर्याप्त जांच के बाद यदि नदी किनारे की जमीन के अलावा घरधनी की अपनी वैध जमीन पाई गई तो वह जमीन लौटाई जाएगी। घरधनी यह दावा करते हुए कि उनके पास वैध लालपूर्जा है, किसी भी हालत में घर तोड़ने की अनुमति नहीं देंगे का मन बना चुके थे, जिस कारण सरकारी टीम भेजी गई थी। ८ सदस्यों वाली सरकारी टीम ने जमीन की वास्तविकता पता लगाने के बाद अब पुनः डोजर चलाया जा रहा है, सीडीओ पौडेल ने बताया।

ममता बनर्जी: पश्चिम बंगाल की ‘दिदी’

१९ वैशाख, काठमांडू। भारतीय राजनीति में पश्चिम बंगाल एक अनोखा प्रयोगशाला है। यहां विचारधारा और व्यक्तित्व की टक्कर सदैव नया इतिहास रचती है। तीन दशक से अधिक समय तक जड़ें जमाये कम्युनिस्ट शासन को एक जुझारू महिला के साहस ने गिरा दिया। वे हैं – ममता बनर्जी।

आज पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘दिदी’ शब्द केवल एक संबोधन नहीं, बल्कि ममता के साम्राज्य का पर्याय बन चुका है।

कॉलेज के साधारण धरने और छात्र राजनीति से शुरू हुई उनकी यात्रा केंद्रीय मंत्रालयों के बड़े कार्यालयों से होकर राज्य की मुख्यमंत्री तक पहुँची।

सन् २०११ में वामपंथी किले को ढहाकर सत्ता में आई ममता बनर्जी ने तब से लगातार तीन कार्यकाल राज्य का नेतृत्व किया है। अब वे चौथी बार सत्ता में लौटने के इरादे से चुनावी मैदान में खड़ी हैं।

३४ वर्षों के वाम किले का पतन

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में वाम मोर्चा का शासन एक दुर्लभ और शक्तिशाली अध्याय रहा है। सन् १९७७ से २०११ तक लगातार ३४ वर्षों तक राज्य की सत्ता पर काबिज कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) सरकार ने भारत के सबसे लंबे एकल विचारधारा शासन का कीर्तिमान स्थापित किया था।

ज्योति बसु के नेतृत्व में शुरू हुए इस शासनकाल ने प्रारंभिक दिनों में ‘भूमि सुधार’ और ‘पंचायती राज’ के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में अभूतपूर्व पकड़ बनाई। हजारों भूमिहीन किसानों को जमीन का मालिक बनाया और राजनीतिक चेतना की नई लहर लाई।

हालांकि शासन जितना लंबा होता गया, उसकी पद्धति में उतनी ही कठोरता और विसंगतियां दिखने लगीं। स्कूल, अस्पताल और सरकारी प्रशासन में स्थानीय पार्टी कार्यालयों का सीधा हस्तक्षेप और नियंत्रण सामान्य प्रक्रिया जैसा बन गया।

अचल संपत्ति व्यवसायी और पार्टी के शीर्ष नेताओं के बीच अपारदर्शी संबंधों ने भ्रष्टाचार की नई संस्कृति को जन्म दिया, जिसके कारण पूर्व मंत्री अशोक भट्टाचार्य जैसे प्रभावशाली नेता भी गंभीर आरोपों के घेरे में आए। बढ़ती बेरोजगारी और अवसरों की कमी से शिक्षित युवा पीढ़ी राज्य से पलायन करने लगी। राजनीतिक संरक्षण में हो रही धांधली और भय के माहौल से आम जन और अधिक क्रोधित हुआ।

अंततः सन् २०११ के विधानसभा चुनाव पश्चिम बंगाल के लिए ‘परिवर्तन’ का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। वर्षों से मौन जनता ने स्वतंत्र रूप से अपने मताधिकार का प्रयोग किया। नतीजतन, अजेय माना जाने वाला ३४ साल पुराना लाल किला गिरा। ममता बनर्जी के नेतृत्व में बंगाल ने नई राजनीतिक दिशा पाई।

सिंगुर और नंदीग्राम से ‘दिदी’ का उदय

पश्चिम बंगाल की राजनीतिक इतिहास में ममता बनर्जी को ‘शक्तिशाली विद्रोही’ के रूप में स्थापित करने के दो मुख्य आधार थे – सिंगुर और नंदीग्राम की भूमि आंदोलने।

सन् २००६ में तत्कालीन वामपंथी मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने राज्य में औद्योगिकीकरण की लहर लाने के मकसद से टाटा मोटर्स की ‘नैनो’ कार फैक्ट्री के लिए हुगली जिले के सिंगुर में उपजाऊ जमीन अधिग्रहण का फैसला किया। अपनी आजीविका का मुख्य स्रोत छिनने के डर से किसान आक्रोशित हो उठे और ममता बनर्जी उनके लिए एक मजबूत सहारा बनीं।

सिंगुर का संघर्ष केवल धरना-प्रदर्शन तक सीमित न रहकर, पुलिस की लाठीचार्ज और राजनीतिक दबावों के बीच ममता ने आन्दोलन जारी रखा। तीव्र विरोध के कारण सन् २००८ अक्टूबर ३ को टाटा मोटर्स ने अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना बंगाल से गुजरात स्थानांतरित करने की घोषणा की। यह ममता के लिए एक बड़ी राजनीतिक जीत और वामपंथी सरकार के लिए नैतिक हार की शुरुआत थी।

और भी निर्णायक मोड़ बना – नंदीग्राम का मामला। पूर्वी मेदिनीपुर के नंदीग्राम में ‘रासायनिक हब’ बनाने के लिए जमीन अधिग्रहण की सरकारी योजना के खिलाफ ग्रामीण जनता सड़कों पर उतरी। १४ मार्च २००७ को प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने अंधाधुंध गोली चलाई जिसमें दो महिलाएं समेत १४ लोगों की जान गई। यह खूनी घटना पूरे बंगाल को स्तब्ध कर गई और ममता के नारों ने गांव-गांव में गूँज बनाई – ‘जमि अमरा छार्बुनी’ (हम अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे)।

सिंगुर और नंदीग्राम के आंदोलन ने वाममोर्चा की ३४ साल की सत्ता के खिलाफ जनमत को एकजुट करने की साझा राजनीतिक भाषा दी। उसी विद्रोह की आग में पनप कर ममता बनर्जी ने सन् २०११ में ऐतिहासिक सफलता हासिल की।

‘जायंट किलर’ से पहली महिला मुख्यमंत्री तक

सन् १९५५ में कोलकाता के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा छात्र राजनीतिसे शुरू हुई।

कोलकाता विश्वविद्यालय से कानून में स्नातक उन्होंने स्थानीय मुद्दों पर सड़क पर उतर कर आंदोलन करने की शैली को अपनी पहचान बनाया।

उनके राजनीतिक जीवन का पहला बड़ा मोड़ १९८४ में आया, जब २९ वर्ष की उम्र में जादवपुर लोकसभा सीट से वाममोर्चा के कद्दावर नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर उन्होंने ‘जायंट किलर’ की छवि बनाई और राष्ट्रीय राजनीति में तहलका मचाया।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में एक प्रभावशाली युवा चेहरा के रूप में उभरी बनर्जी का स्वाभिमानी स्वभाव और वामपंथी शासन के खिलाफ कड़ा रुख कांग्रेस में टिकने नहीं दिया। अंततः सन् १९९८ में उन्होंने ‘अखिल भारत तृणमूल कांग्रेस’ की स्थापना की और अलग राजनीतिक राह चलीं। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में रेल मंत्री और बाद में मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में मंत्री रह चुकीं, उन्होंने राष्ट्रीय अनुभव भी हासिल किया।

सन् २०११ के विधानसभा चुनाव ने बंगाल के इतिहास में एक युग का अंत और नया युग शुरू किया। कांग्रेस के साथ गठबंधन में लड़े गए इस चुनाव में तृणमूल ने अकेले १८४ सीटें जीतीं और गठबंधन ने कुल २२७ सीटें जीतकर ३४ वर्ष के वाम किले को गिरा दिया। इसके साथ-साथ ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।

यह जीत केवल वामपंथियों के प्रति नकारात्मकता नहीं थी, बल्कि ममता द्वारा प्रस्तावित ‘माटी, मानुष और मान्छे’ (माटी, मानव, और इंसानियत) के एजेंडे को जन समर्थन मिला। उन्होंने किसान, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों को एक सूत्र में बांधा। वामपंथी वैचारिक पेचीदगियों की जगह मानवीय संवेदनशीलता और सीधा जन संपर्क लेकर आईं।

हालांकि सरकार गठन के तीन माह के भीतर कांग्रेस को बाहर निकाल कर उन्होंने बंगाल में अपना ‘एकलौता नेतृत्व’ साफ किया।

२०१६ से २०२४ तक अजेय यात्रा

पश्चिम बंगाल राजनीति में ममता बनर्जी की पकड़ सन् २०११ के बाद और मजबूत होती गई। सन् २०१६ के विधानसभा चुनाव उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता और एकल शक्ति की कड़ी परीक्षा थी। विपक्ष ने सत्ता परिवर्तन की भविष्यवाणी की, पर तृणमूल ने २९४ में से २११ सीटें जीतीं। गठबंधन के वाम और कांग्रेस केवल ७७ सीटों पर सिमटे और सीपीआई(एम) का वोट प्रतिशत १९.७ तक गिर गया। ममता ने इसे ‘अपवित्र गठबंधन के खिलाफ जनता की हिफाजत’ करार दिया और राजनीतिक ऊँचाई पकड़ी।

सन् २०२१ का चुनाव भारतीय राजनीति का एक बड़ा ‘बैटल ग्राउंड’ बना। भाजपा ने पूरा केन्द्रीय तंत्र लगाकर ‘परिवर्तन’ का नारा दिया, लेकिन ममता के ‘बंगाल की बेटी’ कार्ड ने भाजपा की रणनीति कमजोर साबित कर दी।

परंतु नंदीग्राम में व्यक्तिगत मुकाबले में ममता अपनी पूर्व सहयोगी सुवेंदु अधिकारी से हार गईं। पार्टी ने २१५ सीटें जीतीं और भारी बहुमत पाया। इसके बाद के २१ उप-चुनाव में २० में तृणमूल की जीत ने राज्य में ‘दिदी’ के विकल्प की कमी साफ कर दी।

सन् २०२४ के लोकसभा चुनाव के नतीजे ने राष्ट्रीय राजनीति को हिला दिया। राज्य की ४२ में से २९ सीटें जीतकर तृणमूल ने भाजपा को मात्र १२ सीटों तक सीमित कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आक्रामक प्रचार के बावजूद ममता बंगाली जनमत को अपने पक्ष में करने में सफल रहीं। विशेषकर ५३ प्रतिशत महिला मतदाताओं का समर्थन उनकी सफलता की मुख्य कड़ी बना।

कल्याणकारी शासन के स्तंभ

ममता बनर्जी के शासन का सबसे मजबूत पक्ष उनकी ‘लोकप्रिय’ और ‘कल्याणकारी’ योजनाएं हैं। ये योजनाएं केवल सरकारी फाइलों तक सीमित न रहकर ग्रामीण और शहरी जनता के रोजमर्रा के जीवन पर गहरा प्रभाव डालती हैं। उनके शासन में शुरू हुए दर्जनों से अधिक सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम उनके जनाधार की मेरुदंड बन चुके हैं।

विशेषकर महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उनके कदम भारतीय राजनीति में उदाहरणीय माने जाते हैं। महिलाओं के जीवन स्तर सुधारने वाली ‘कन्याश्री योजना’ एक मील का पत्थर साबित हुई, जिसने लगभग एक करोड़ बालिकाओं को स्कूल में बनाए रखा और बालविवाह रोकने में सफल रही। १८ वर्ष तक अविवाहित रहकर शिक्षा पूरी करने वालों को एकमुश्त २५ हजार रुपए दे रही है।

इसी तरह, ‘लक्ष्मी और भंडार’ योजना ममता के राजनैतिक ‘गेम चेंजर’ के रूप में उभरी। राज्य की लगभग ७१ लाख महिलाओं को मासिक ५०० से १००० रुपये निश्चित आय देकर उनकी आर्थिक स्वालंबन और घर के निर्णय प्रक्रियाओं में बड़ा योगदान दिया है।

साथ ही, ‘रूपश्री प्रकल्प’ के माध्यम से गरीब परिवारों के बेटियों के विवाह हेतु एकमुश्त २५ हजार रुपये आर्थिक सहायता देकर २२ लाख से अधिक परिवारों का भारी सामाजिक और आर्थिक बोझ कम किया गया है।

किसानों के लिए ‘कृषक बंधु’ और पूर्ण सरकारी अनुदान वाली ‘बंगाला शस्य बीमा’ योजनाओं ने कृषि संकट के वक्त सुरक्षा कवच का काम किया। ‘दुआरे सरकार’ (द्वार पर सरकार) अभियान द्वारा सरकारी सेवाओं को लोगों के घर-घर तक पहुंचाकर कर्मचारियों की सुस्ती को चुनौती दी। ‘खाद्य साथी’ योजना से राज्य के ९.५ करोड़ नागरिक लाभान्वित हो रहे हैं।

ममता की सादी सुतली साड़ी, हवाई चप्पल और सड़कों पर उतरने वाली विद्रोही छवि ने उन्हें साधारण बंगाली महिलाओं के बीच आत्मीयता दिलाई है। वे खुद को मुख्यमंत्री से ज्यादा ‘बंगाल की बेटी’ के रूप में प्रस्तुत करती हैं। यही विश्वास के कारण सन् २०२४ के लोकसभा चुनाव में तृणमूल की ११ महिला उम्मीदवार ने मैदान में उतर कर सब जीत हासिल की, जहाँ ५३ प्रतिशत महिला मतदाता ममता के पक्ष में थे।

शासन की चुनौती: उद्योग, रोजगार और बुनियादी ढांचा

ममता के शासनकाल में कल्याणकारी योजनाओं के व्यापक विस्तार और औद्योगिकीकरण की कमी के बीच एक गंभीर अंतराल उत्पन्न हुआ है।

सिंगुर और नंदीग्राम के भूमि आंदोलनों ने उन्हें सत्ता की चोटी तक पहुंचाने में मदद की, लेकिन उन्हीं विरासतों की वजह से राज्य में बड़े उद्योग स्थापित करने और उद्योग-मैत्री माहौल बनाने में जोखिम लेने से उन्होंने बचा।

राज्य से पूंजी के बहिर्गमन, नई फैक्ट्रियों की कमी और युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों में गिरावट आज के बंगाल के प्रमुख संकट हैं। यह राजनीति का एक दिलचस्प विरोधाभास है कि जहां सिंगुर के पुरुष औद्योगिक अवसर खोने से चिंतित हैं, वहीं महिलाएं ‘दिदी’ की कल्याणकारी योजनाओं के कारण उनके समर्थन में खड़ी हैं। बुनियादी ढांचे में कोलकाता मेट्रो, सड़क नेटवर्क और स्वास्थ्य केंद्रों के विस्तार सहित कुछ सकारात्मक कार्य हुए, पर शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में असंतुलन अभी भी दूर नहीं हुआ है।

विवादों में घिरी ममता

ममता बनर्जी के शासन को उनकी कल्याणकारी योजनाओं के लिए सराहा जाता है, वहीं भ्रष्टाचार के कई गंभीर मामलों और राजनीतिक हिंसा की घटनाओं ने इसे विवादित भी बनाया है। सन् २०१३ के ‘सारदा चिट फंड’ घोटाले से लेकर ‘नारदा स्टिंग ऑपरेशन’ तक ऐसी घटनाओं ने तृणमूल के शीर्ष नेताओं की छवि पर प्रश्नचिन्ह लगाए।

२०२१ के बाद सतह पर आए ‘शिक्षक नियुक्ति घोटाले’ में प्रभावशाली मंत्री पार्थ चटर्जी की गिरफ्तारी और उनके सहयोगी के घर से करोड़ों नकद बरामदगी ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया। इसके साथ ही राशन वितरण और पशु तस्करी जैसे मामलों में केन्द्रीय एजेंसियों की कड़ी जांच जारी है।

हाल ही में सन् २०२६ में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कोयला तस्करी मामले में २७०० करोड़ रुपए के अवैध लेनदेन का खुलासा किया। ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में इस हवाला कांड की विस्तृत रिपोर्ट पेश की और इसमें सबूत मिटाने की कोशिशें होने का दावा किया, जिससे मामला और भी गर्मा गया।

भ्रष्टाचार के अलावा पश्चिम बंगाल की राजनीतिक हिंसा ममता सरकार की सबसे आलोचित बात है। आंकड़ों के अनुसार, भारत के अन्य राज्यों के मुकाबले बंगाल में चुनावी और राजनीतिक हिंसा की घटनाएं भयावह रूप से बढ़ रही हैं।

२०१६ की तुलना में २०२१ के चुनाव में हिंसा की घटनाओं में ६१% से अधिक की वृद्धि देखी गई और चुनाव बाद सैकड़ों कार्यकर्ताओं को पड़ोसी असम में शरण लेनी पड़ी। यह राज्य की कानूनी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। तीसरे कार्यकाल की शपथ लेने के बाद चुनाव आयोग द्वारा हटाए गए अधिकारियों को ममता द्वारा पुनः बहाल करने से केंद्र और राज्य के बीच संवैधानिक टकराव और भी बढ़ गया।

हाल के ‘दुर्गापुर कांड’ जैसे संवेदनशील मामलों में मुख्यमंत्री के विवादास्पद बयानों ने उन्हें आलोचनाओं के केंद्र में ला दिया। एक मेडिकल छात्रा पर हुए सामूहिक दुष्कर्म के मामले में ‘रात को महिलाएं बाहर नहीं निकलनी चाहिए’ जैसी टिप्पणी पर अधिकारकर्मियों और विपक्ष ने उन्हें ‘पीड़ितों को और आघात पहुँचाने वाला’ कहा।

इन भ्रष्टाचार और हिंसा के काले अध्यायों ने २०२६ के चुनाव में ममता के लिए सबसे बड़ी चुनौतियां पैदा की हैं, वहीं भाजपा के मुख्य चुनावी हथियार भी बने हैं।

२०२६ की परीक्षा

सन् २०२६ का विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी के लिए अब तक का सबसे कठिन और जटिल मुकाबला साबित हो रहा है। इस बार भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, केन्द्रीय एजेंसियों का बढ़ता दबाव, मतदाता सूची विवाद और भाजपा के आक्रामक ‘हिंदुत्व’ एजेंडा को एक साथ टक्कर देनी है।

विशेष तौर पर मतदाता सूची विवाद इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक ‘फ्लैशपॉइंट’ बन गया है। चुनाव आयोग की विशेष गहन समीक्षा (एसआईआर) के तहत लगभग ९१ लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने पर ममता ने इसे अल्पसंख्यक और सीमांत समुदायों के खिलाफ भाजपा की साजिश बताया और तीखा विरोध किया।

भवानीपुर जैसे इलाकों में बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं के नाम काटे जाने का दावा करते हुए उन्होंने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया। इसके अलावा चुनाव आयोग ने मुख्य सचिव, गृह सचिव और डीजीपी समेत ५०० से अधिक अधिकारियों का स्थानांतरण किया, जिसे ममता ने ‘दिल्ली की बंगाल कब्जा करने की योजना’ बताया।

भाजपा ने इस चुनाव में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण और ‘अवैध घुसपैठ’ को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया है। वे राज्य की जनसांख्यिकीय परिवर्तन की चिंता दिखा कर ‘बहुमत’ का जादुई आंकड़ा (१५३ सीट) छूने की रणनीति पर हैं। इसके मुकाबले में ममता ने अपने ‘१० वादे’ जारी किए हैं, जिनमें ‘लक्ष्मी भंडार’ की मासिक सहायता बढ़ाना (सामान्य के लिए १५०० और एससी/एसटी के लिए १७०० रुपये), बेरोजगार युवाओं को मासिक भत्ता देना और ‘दुआरे चिकित्सा’ (घर-घर स्वास्थ्य सेवा) प्रदान करना हैं।

मतदान के बाद आए एग्जिट पोलों ने बंगाल के राजनीतिक भविष्य को लेकर विरोधाभासी और अस्थिर तस्वीर दिखाई है। कुछ सर्वेक्षणों ने भाजपा को १८० से १९० सीटों के साथ ‘सुनामी’ आने का अनुमान लगाया है, जबकि कुछ ने तृणमूल और भाजपा के बीच कड़ा मुकाबला माना है।

ममता बनर्जी ने इन एग्जिट पोलों को ‘भाजपा कार्यालय से निर्देशित’ करार दिया और पूरी तरह खारिज किया। निर्वाचन की पूर्व संध्या पर उन्होंने खुद ‘स्ट्रांग रूम’ जाकर ईवीएम सुरक्षा पर कड़ी नजर रखी। ऐतिहासिक ९२ प्रतिशत मतदान और एग्जिट पोल के इस टकराव ने ४ मई के परिणाम को रोमांचक और निर्णायक होने का संकेत दिया है।

भवानीपुर: सम्मान का द्वंद्व और भविष्य का फैसला

पश्चिम बंगाल के २०२६ के चुनाव में सबसे चर्चित ‘रणभूमि’ भवानीपुर बनी है। यह सिर्फ एक निर्वाचन क्षेत्र नहीं, बल्कि ममता बनर्जी और भाजपा के सुवेंदु अधिकारी के बीच व्यक्तिगत और राजनीतिक अस्तित्व की टक्कर है।

पिछले चुनाव में नंदीग्राम में मिली हार का बदला लेने और अपने राजनीतिक रंग को पुनः स्थापित करने के लिए ममता इस बार भवानीपुर से चुनावी लड़ाई लड़ रही हैं। मतदाता सूची विवाद, कार्यकर्ताओं के बीच लगातार झड़पें और पुलिस की लाठीचार्ज ने भवानीपुर का माहौल बेहद तनावपूर्ण बना दिया।

सुवेंदु लगातार ‘हिंदू मत की ध्रुवीकरण’ होने का दावा कर रहे हैं, जबकि ममता ने ‘केन्द्रीय सुरक्षा बलों के दमन’ का कड़ा विरोध किया। इस सीट का परिणाम निश्चित रूप से ममता के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करेगा।

नेपाल क्रिकेट: ‘जिद्दी’ विनोद का अप्रत्याशित ‘कंबैक’

विनोद भण्डारी

तस्बिर स्रोत, CAN

विनोद भण्डारी का फिर से राष्ट्रीय टीम की जर्सी पहनकर खेल में वापसी करने की उम्मीद शायद ही किसी ने की होगी।

4 साल पहले वनडे से संन्यास ले चुके और पिछले 2 सालों में टी-20 फॉर्मेट से भी दूर हो चुके इस ‘वेटरन’ खिलाड़ी के लिए राष्ट्रीय टीम में वापसी करना आसान नहीं था।

लेकिन ‘जिद्दी’ विनोद ने लगातार प्रयास किया।

फ्रेंचाइजी टूर्नामेंट NPL में या त्रिभुवन आर्मी क्लब को लगातार प्रतियोगिताओं में सफलता दिलाकर, या नेपाल ‘ए’ टीम के कप्तान के रूप में टीम का नेतृत्व करते हुए, उनके बल्ले से लगातार रन की बारिश होती रही।

इसका परिणाम यह हुआ कि उनकी लगन देखकर राष्ट्रीय टीम के चयनकर्ताओं को प्रभावित किया और विनोद को ICC वर्ल्ड कप लीग-2 के लिए राष्ट्रीय टीम में पुनः बुलाया गया।