समाचार सारांश
तैयार किया गया। संपादकीय समीक्षा की गई।
- सरकार ने शासकीय सुधार के लिए 100 कार्यसूची जारी की हैं, जिसके तहत मंत्रालयों की संख्या कम कर प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका बढ़ाने का निर्णय लिया गया है।
- प्रधानमंत्री कार्यालय के अंतर्गत अधिकारसंपन्न संपत्ति जांच समिति का गठन कर सार्वजनिक पदाधिकारियों की संपत्ति जांच की योजना आगे बढ़ाई गई है।
- संविधान संशोधन बहस का नेतृत्व प्रधानमंत्री कार्यालय करेगा और राष्ट्रीय प्रतिबद्धता तैयार करने का कार्य भी इस कार्यालय द्वारा किया जाएगा।
१५ चैत्र, काठमांडू। सरकार ने शासकीय सुधार के लिए शनिवार को १०० कार्यसूची सार्वजनिक की है। इन कार्यसूचियों के क्रियान्वयन से प्रधानमंत्री के पास और अधिक शक्तियां केंद्रित होंगी।
१०० कार्यसूचियों में से १३ प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद् कार्यालय के क्षेत्राधिकार से संबंधित हैं। इसके तहत पुरानी संरचनाओं को हटाकर नई संरचना बनाने की योजना एक साथ आगे बढ़ाई जा रही है।
संविधान संशोधन बहस की अगुवाई करने से लेकर भ्रष्टाचार नियंत्रण, सार्वजनिक पद पर नियुक्त व्यक्तियों की संपत्ति जांच जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक और प्रशासनिक विषय भी प्रधानमंत्री के अधीन संचालित होंगे।
कार्ययोजना के लागू होने पर सरकार की नीति निर्माण, कार्यान्वयन, निगरानी और सुधार में प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषदकार्यलय की भूमिका और अधिक विस्तार पाएगी।
कार्यसूची के बिंदु संख्या ९ में कहा गया है कि मंत्रालयों की संख्या आवश्यकता से अधिक होने के कारण चालू खर्च बढ़ रहा है। इसे नियंत्रित करने के लिए ३० दिन के भीतर मंत्रालयों की संख्या कम करने का निर्णय लिया गया है, जिसके तहत नेपाल सरकार (कार्य विभाजन) नियमावली संशोधित कर संघीय मंत्रालयों की संख्या १७ कर दी जाएगी।
मंत्रालय संख्या के पुनरावलोकन के बाद दीर्घकालीन प्रबंधन करते हुए सेवा प्रवाह प्रभावित न हो, इस पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इसके लिए प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद कार्यालय में ‘पुनर्संरचना प्रबंधन सचिवालय’ बनाया जाएगा जो जनशक्ति, बजट और कार्यक्रम प्रबंधन के लिए मार्गदर्शन देगा।
कार्यसूची के बिंदु ११ के अनुसार अनुत्पादक, दोहराए गए कार्य क्षेत्र वाले तथा अनावश्यक वित्तीय बोझ पैदा करने वाले बोर्ड, समितियों, योजनाओं और संस्थागत संरचनाओं का जमीनी मूल्यांकन कर उन्हें समाप्त किया जाएगा।
प्रधानमंत्री कार्यालय, अर्थ मंत्रालय, उद्योग, वाणिज्य एवं आपूर्ति मंत्रालय और संघीय मामिला तथा सामान्य प्रशासन मंत्रालय के प्रतिनिधियों से उच्चस्तरीय कार्यदल बनाएगा, जो एक माह में स्पष्ट सिफारिशों के साथ रिपोर्ट सौंपेगा।
इस प्रकार नई सरकार सरकारी संरचनाओं को संक्षिप्त करते हुए निर्णय प्रक्रिया में प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद् कार्यालय की भागीदारी अनिवार्य कर रही है, जिससे प्रधानमंत्री अधिक सशक्त होंगे।
मंत्रालयों पर नजर
कार्यसूची के बिंदु २ में बताया गया है कि सरकार समग्र कार्य प्रदर्शन को परिणाममुखी, प्रभावी, मापनीय और जवाबदेह बनाने के लिए नतीजाभित शासकीय प्रबंधन (डिलिवरी बेस्ड गवर्नेंस) लागू करेगी।
इसके तहत प्रत्येक मंत्रालय ७ दिनों के भीतर अपनी शीर्ष १० प्रमुख कार्य निर्धारित करेगा और उनकी समयसीमा, जिम्मेदार अधिकारी और प्रदर्शन संकेतक सहित कार्ययोजना प्रधानमंत्री कार्यालय को प्रस्तुत करेगा। मासिक प्रगति रिपोर्ट भी इसी कार्यालय को देनी होगी।
मंत्रालयों के काम की निगरानी प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा की जाएगी, जिससे इस कार्यालय को कार्य प्रदर्शन नियंत्रक के रूप में स्वतंत्र अधिकार मिलेंगे।
‘इन कार्यों की मासिक प्रगति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद कार्यालय में प्रस्तुत कर नियमित निगरानी, मूल्यांकन और सार्वजनिक रिपोर्टिंग सुनिश्चित की जाएगी’ कार्यसूची में उल्लेख किया गया है।
इससे मंत्रालयों के कामकाज पर प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका और मजबूत होगी।
मंत्रालयों के कार्यों के मापन, परियोजनाओं की प्रगति ट्रैकिंग और समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में अलग संरचना स्थापित की जा रही है, जो कार्यसूची के बिंदु संख्या ६४ में वर्णित है।
यहां कहा गया है, ‘देश के निवेश, उत्पादन, निर्यात, उत्पादकता और विकास वित्त प्रणाली को एकीकृत, प्रभावी और परिणाममुखी बनाने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन ‘प्रधानमंत्री कार्य प्रदर्शन इकाई’ तुरंत स्थापित की जाएगी।’
यह इकाई राष्ट्रीय प्राथमिकता प्राप्त परियोजनाओं के लिए मुख्य कार्य प्रदर्शन संकेतक, मंत्रालय स्तर की ट्रैकिंग और समस्या एवं अवरोध समाधान संयंत्र के साथ एक केंद्रीय डैशबोर्ड संचालित करेगी।
यह मॉडल पड़ोसी भारत, ब्रिटेन और कुछ दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों द्वारा अपनाए गए ‘डिलिवरी यूनिट’ मॉडल के समान है।
यानि, जब १०० बिंदुओं वाली कार्यसूची लागू होगी तब प्रधानमंत्री प्रत्येक मंत्रालय के काम में संपूर्ण रूप से संलग्न होंगे और मंत्रालय स्तर के कामों में भी प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद् कार्यालय शामिल रहेगा। अतः काम की रिपोर्टिंग भी प्रधानमंत्री के माध्यम से होगी।

कार्यसूची के बिंदु संख्या ४९ में विकास परियोजना प्रबंधन शामिल है। इसके तहत पुराने अधूरे, खराब हालात वाले और समय पर पूर्ण न हुए परियोजनाओं की पुनः समीक्षा कर बजट आवंटन किया जाएगा, जिसमें प्रधानमंत्री की प्रत्यक्ष भागीदारी होगी।
जमीन अधिग्रहण, पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (EIA) स्वीकृति, ठेका टूटने जैसी प्रक्रियाएं सरल बनाई जाएंगी और अस्वस्थ एवं छूटे हुए ठेका परियोजनाओं की समस्याओं का ३० दिनों में अध्ययन दल बनाकर समाधान किया जाएगा। दल परियोजनाओं की यथार्थता और संभाव्यता का आंकलन करते हुए निरंतरता पर सिफारिश देगा।
‘यदि किसी परियोजना के लिए अंतर्निहित निकायों में समन्वय आवश्यक हो तो प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद कार्यालय तुरंत समन्वय और सुविधा प्रदान करेगा’ कार्यसूची में उल्लेख है।
अतिरिक्त रूप से राष्ट्रीय गौरव और बड़े रणनीतिक परियोजनाओं के त्वरित क्रियान्वयन के लिए जमीन प्राप्ति, मुआवजा निर्धारण, पेड़ काटने और पर्यावरणीय प्रभाव अनुमोदन प्रक्रिया फास्ट ट्रैक तंत्र के माध्यम से लागू की जाएगी। प्रधानमंत्री इस कार्य में प्रत्यक्ष रूप से संलग्न रहेंगे।
‘संबंधित सभी निकायों के बीच समन्वय कर एकीकृत और स्वचालित मंजूरी प्रणाली लागू करने, अनावश्यक देरी और दोहरा प्रक्रियाएं हटाने, स्पष्ट समयसीमा निर्धारित कर क्रियान्वयन करने तथा परियोजनाओं के अवरोध दूर करने के लिए प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद कार्यालय द्वारा प्रत्यक्ष निगरानी और सुविधा प्रदान की जाएगी’ ऐसा कहा गया है।
डिजिटल शासन में प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका
डिजिटल से जुड़ी सभी संरचनाएं प्रधानमंत्री कार्यालय के अंतर्गत लाई जा रही हैं। वर्तमान सूचना प्रौद्योगिकी विभाग को खत्म कर प्रधानमंत्री कार्यालय के अंतर्गत नया ‘सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक शासन कार्यालय’ स्थापित किया जाएगा।
यह योजना कार्यसूची के बिंदु संख्या ३९ में शामिल है।
‘प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद कार्यालय के अधीन सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक शासन कार्यालय स्थापित करने का कार्य ३ महीने के भीतर पूरा करना, वर्तमान सूचना प्रौद्योगिकी विभाग को खत्म करना तथा सभी सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित सार्वजनिक निकायों को इस कार्यालय के अधीन संचालित करना सुनिश्चित करने की व्यवस्था बनाना’ कहा गया है।
नई संरचना से नेपाल की सूचना प्रौद्योगिकी और डिजिटल शासन प्रणालियों में विद्यमान टुकड़े-टुकड़े संरचना, अंतर्संबंधों की कमी, मानकों तथा संस्थागत समन्वय की कमजोरियों का समाधान होगा। दक्ष जनशक्ति और तकनीकी क्षमता की कमी, सेवा प्रदायगी में प्रभावकारिता का अभाव सुधारा जाएगा और एक समेकित, सुरक्षित, दक्ष एवं परिणाममुखी डिजिटल शासन प्रणाली स्थापित की जाएगी।
कार्यसूची के बिंदु संख्या ३३ के अनुसार नागरिकों के डिजिटल विवरणों तक प्रधानमंत्री कार्यालय की पहुँच होगी।
‘डिजिटल हस्ताक्षर वर्तमान में प्रमाण पत्र के माध्यम से होते हैं, लेकिन भविष्य में एनआईडी कार्ड, बायोमेट्रिक या OTP के उपयोग से ई-हस्ताक्षर की सुविधा दी जाएगी ताकि नागरिक अपनी जानकारी प्रस्तुत कर सकें।’
राष्ट्रीय परिचयपत्र एवं पंजीकरण विभाग को भौतिक और संगठनात्मक रूप में सुदृढ़ किया जाएगा। साथ ही राष्ट्रीय परिचयपत्र (एनआईडी) संख्या के आधार पर सभी सेवाओं में डिजिटल हस्ताक्षर द्वारा प्रमाणीकरण प्रणाली लागू करने के लिए गृह मंत्रालय के संयोजन में अध्ययन कर एक माह के भीतर प्रधानमंत्री कार्यालय को रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी।
मतलब, डिजिटल सेवा, डेटा प्रबंधन और नागरिक सेवाओं के नियंत्रण में प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका रहेगी।
प्रधानमंत्री अधीन संपत्ति जांच समिति का गठन
सरकार की 100 बिंदु कार्यसूची के अनुसार प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद कार्यालय के अधीन अधिकारसंपन्न संपत्ति जांच समिति बनाई जा रही है। भ्रष्टाचार और अनुचित कर्तव्य दुरुपयोग अनुसंधान आयोग इसके लिए अलग अनुसंधान निकाय है, जबकि संपत्ति शुद्धीकरण अनुसंधान विभाग अवैध संपत्ति की जांच करता है।
अख्तियार आदि संरचनाओं से अलग और संबंधित मंत्रालयों से ऊपर, इस समिति को प्रधानमंत्री के अधीन स्थापित किया जा रहा है। कार्यसूची के बिंदु संख्या ४३ के अनुसार भ्रष्टाचार, संपत्ति छुपाने की प्रवृत्ति और दंडहीनता समाप्त करने के लिए १५ दिनों के भीतर यह समिति बनने वाली है।
इस समिति में कानून, अर्थशास्त्र, राजस्व और अनुसंधान क्षेत्र के विशेषज्ञ और संबंधित निकायों के प्रतिनिधि होंगे। आवश्यक कानूनी और तकनीकी प्रबंध विकसित कर जांच प्रक्रिया पारदर्शी और परिणाममुखी बनाएंगे।
नेपाल में लंबे समय से सार्वजनिक पदों पर रहे व्यक्तियों की संपत्ति जांच की मांग हो रही है। राजनीतिक दलों ने भी यह चुनावी प्रस्तावों में शामिल किया है।
नीति निर्माण, क्रियान्वयन, निगरानी और भ्रष्टाचार नियंत्रण के साथ-साथ राष्ट्रीय प्रतिबद्धता तैयार करने और संविधान संशोधन की अगुवाई तक के अधिकार प्रधानमंत्री कार्यालय केंद्रित कर रहे हैं।
पहले चरण में २०६२/६३ से अब तक सार्वजनिक पद पर रहे प्रमुख राजनीतिक पदाधिकारी और उच्च पदस्थ कर्मचारियों की संपत्ति का संकलन, प्रमाणीकरण और जांच की जाएगी।
दूसरे चरण में २०४८ से लेकर २०६१/६२ तक सम्मानित सार्वजनिक पदाधिकारियों और कर्मचारियों की संपत्ति की जांच होगी।
जांच प्रक्रिया कानूनी मानदंडों पर आधारित, निष्पक्ष तरीके से संचालित की जाएगी, और समिति की रिपोर्ट और सिफारिशों को संबंधित निकायों के माध्यम से लागू किया जाएगा।
इसका मतलब यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व मंत्री, उच्च पदस्थ पूर्व कर्मचारी और संवैधानिक निकायों के पूर्व पदाधिकारी सभी की संपत्ति जांच में शामिल होंगे। समिति को केवल दस्तावेज जांचने का अधिकार नहीं, बल्कि विवरण संकलन, प्रमाणीकरण, वास्तविक स्रोत की जांच और संदिग्ध संपत्ति पर सिफारिश करने का अधिकार दिया गया है।
सरकारी अधिकारी इसे सार्वजनिक पदों पर रहे व्यक्तियों की व्यवस्थित संपत्ति जांच मानते हैं। इससे केवल औपचारिक विवरण प्रस्तुत करने और वास्तविक संपत्ति छुपाने की प्रवृत्ति खत्म होने की उम्मीद है।
हालांकि इसके नकारात्मक प्रभाव भी हो सकते हैं। संपत्ति जांच में शामिल लोग, विशेष रूप से पुराने दलों के नेता दबाव में आ सकते हैं, जिससे प्रधानमंत्री अन्य दलों पर दबाव बनाने के अवसर प्राप्त कर सकते हैं।
विधायी काम में सक्रिय भूमिका
नीति निर्माण, क्रियान्वयन, निगरानी, भ्रष्टाचार नियंत्रण के साथ-साथ राष्ट्रीय प्रतिबद्धता तैयार करने और संविधान संशोधन की अगुवाई के अधिकार प्रधानमंत्री कार्यालय में केन्द्रित हो रहे हैं।
कार्यसूची के बिंदु संख्या ३ में कहा गया है कि सभी राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों का समावेश कर राष्ट्रीय प्रतिबद्धता बनाई जाएगी।
‘नेपाल के संविधान के मूल स्वरूप, लोकतांत्रिक प्रणाली की मजबूती और चुनाव के माध्यम से मिले जनादेश को संस्थागत रूप देना, सभी राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों, वचनपत्र और प्रतिबद्धताओं में लागू हो सकने वाले विषयों का संश्लेषण कर राष्ट्रीय प्रतिबद्धता तैयार करना और उस पर सरकार की साझा स्वामित्व स्थापित करना’ कहा गया है।
सरकार इसे नीति, कार्यक्रम और बजट से जोड़ने का प्रावधान करेगी।
अर्थात अब सरकार की नीति केवल सत्तारूढ़ दल के घोषणापत्र पर निर्भर नहीं होगी, बल्कि यह बहुदलीय सहमति से तय कार्यक्रमों को राज्य नीति में परिवर्तित करने का प्रयास होगा। इसका नेतृत्व प्रधानमंत्री कार्यालय करेगा।
संविधान संशोधन जैसे राजनीतिक विषयों का बहस कोई स्वतंत्र आयोग या निकाय नहीं करेगा। इसके लिए संसदीय चर्चाएं और आवश्यक संरचनाओं के निर्माण में भी सरकार सक्रिय नहीं होगी।
सरकार की योजना अनुसार संसदीय चर्चाओं और अन्य संयंत्रों से सुझाव लेने के बजाय, प्रधानमंत्री कार्यालय राजनीतिक दलों के घोषणापत्र पढ़कर निर्णय लेगा।
१०० बिंदु कार्यसूची के अनुसार संविधान संशोधन बहस का नेतृत्व भी प्रधानमंत्री कार्यालय करेगा।
बिंदु संख्या ४ में कहा गया है, ‘देश के दीर्घकालीन राजनीतिक और संस्थागत सुधार, चुनाव प्रणाली आदि विषयों में संविधान संशोधन का राष्ट्रीय सहमति निर्माण करने के लिए प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद कार्यालय ७ दिनों के भीतर ‘संविधान संशोधन बहस पत्र’ तैयार करेगा, कार्यदल गठित करेगा और बहस को सहभागी, पारदर्शी और तथ्य आधारित बनाएगा।’
इसका मतलब है कि संविधान संशोधन जैसे राजनीतिक विषयों की बहस स्वतंत्र निकाय द्वारा नहीं, बल्कि सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के द्वारा होगी।