समाचार का सारांश
समीक्षा के बाद तैयार किया गया।
- इरान और इजरायल के बीच संघर्ष अक्टूबर 7, 2023 के हमास के आक्रमण के बाद शुरू हुआ और फरवरी 28, 2026 को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हवाई हमले के बाद पूर्ण युद्ध का स्वरूप ले चुका है।
- रूस इरान को रणनीतिक सहयोगी मानते हुए अप्रत्यक्ष सैन्य और तकनीकी सहायता दे रहा है जबकि इजरायल के साथ सुरक्षा समन्वय बनाए रखा है।
- चीन मध्य पूर्व के युद्ध में सीधे सैन्य भागीदारी के बिना कूटनीतिक दबाव और अप्रत्यक्ष सहायता के जरिए अपने दीर्घकालिक आर्थिक और राजनीतिक हितों की रक्षा कर रहा है।
१७ चैत, काठमाडौँ । दशकों से इरान और इजरायल के बीच ‘छाया युद्ध’ चलता रहा है। साइबर हमले, वैज्ञानिकों की हत्या और प्रॉक्सी समूहों के माध्यम से छोटे संघर्षों तक सीमित यह द्वंद्व अब सीधे युद्ध का स्वरूप लेने लगा है। अप्रैल 2024 में दमिश्क स्थित इरानी दूतावास पर इजरायली हमला और उसके जवाब में इरान द्वारा इजरायल पर मिसाइल प्रहार ने इतिहास का नया अध्याय खोला है।
फिर फरवरी 28, 2026 को संयुक्त राज्य अमेरिका और इजरायल ने इरान पर व्यापक हवाई हमला शुरू किया, जिसके बाद यह संघर्ष पूर्ण युद्ध में परिवर्तित हो गया। इरान के सर्वोच्च नेता आयतोल्लाह अली खामेनी की हत्या, परमाणु स्थलों, सैन्य ठिकानों और तेल अवसंरचना पर हमलों ने क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित किया। जवाब में इरान ने इजरायल के तेल रिफाइनरी, खाड़ी देशों के बंदरगाहों और अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों को अंजाम दिया। यमन के हूथी विद्रोहियों ने इजरायल को निशाना बनाया और लेबनान की हिज़बुल्लाह की गतिविधियाँ भी बढ़ी हैं।
हर बड़े युद्ध में शक्तिशाली देश सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होते हैं। इस युद्ध में अमेरिका सीधे शामिल है, लेकिन विश्व की दो प्रमुख शक्तियाँ रूस और चीन अभी तक सीधे युद्ध में शामिल नहीं हुई हैं। ये देश कूटनीतिक दबाव और अप्रत्यक्ष सहायता प्रदान कर रहे हैं, लेकिन सीधे सैन्य हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं।
यह युद्ध कैसे शुरू हुआ?
यह संघर्ष अक्टूबर 7, 2023 को हमास द्वारा इजरायल पर किए गए हमले से शुरू हुआ। इसके बाद इजरायल ने गाजा पर बड़े सैन्य अभियान चलाए। इरान ने हमास, हिज़बुल्लाह और हूथी प्रॉक्सी समूहों के माध्यम से इजरायल और अमेरिका पर दबाव बढ़ाया। 2024 में इजरायल ने सीरिया स्थित इरानी दूतावास पर हमला किया और इरान ने प्रत्यक्ष मिसाइल हमले किए। जून 2025 में इजरायल और अमेरिका ने इरान के परमाणु स्थलों जैसे फोर्डो, नतान्ज़ और इस्फहान पर ‘ट्वेल्व-डे वार’ नामक अभियान चलाया।
फरवरी 2026 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ट ट्रम्प ने अधिकतम दबाव नीति अपनाई। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने इरान पर परमाणु अप्रसार उल्लंघन का आरोप लगाया। फरवरी 28, 2026 को अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त रूप से ‘ऑपरेशन एपिक फ़्यूरी’ और ‘रोरिंग लायन’ अभियान शुरू किया।
इरान के तेहरान, इस्फहान सहित सैकड़ों लक्ष्यों पर व्यापक हमले हुए। सर्वोच्च नेता खामेनी की हत्या की घोषणा हुई और उनके बेटे मोज़तबा खामेनी ने नई सर्वोच्च नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाली। इरान ने हार्मुज स्ट्रेट बंद करने की चेतावनी देते हुए तेल अवसंरचना पर हमले किए।
मार्च 31, 2026 तक स्थिति भयावह होती जा रही है। इजरायल के हाइफा रिफाइनरी में आग लगी है, तेहरान में विद्युत् आपूर्ति काटी गई है और खाड़ी देशों में ड्रोन हमले हुए हैं। तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। अमेरिका ने विशेष बल तैनात किए हैं और ट्रम्प ने हार्मुज जलसंधि की नाकाबंदी नहीं करने पर तेल एवं ऊर्जा प्रणालियों के विनाश की धमकी दी है। इरान भी अमेरिकी सेनाओं के खिलाफ प्रतिकार का दावा कर रहा है। एक महीने के बावजूद युद्ध पूर्णरूप से तनावपूर्ण स्थिति बना हुआ है।
अमेरिका की निर्णायक भूमिका
अमेरिका इजरायल का मुख्य सहयोगी है। ट्रम्प प्रशासन ने इजरायल के अस्तित्व को अपने राष्ट्रीय हित से जोड़ दिया है। अमेरिका ने बी-2 बॉम्बर्स और टोमहॉक मिसाइल का उपयोग कर इरान के परमाणु स्थलों को ध्वस्त किया है। इजरायल ने अमेरिकी सेना को ‘रीयल-टाइम इंटेलिजेंस’ प्रदान की है और मिसाइल रक्षा प्रणाली में सहयोग दिया है।
अमेरिका में जनमत विभाजित है; सर्वेक्षणों के अनुसार 56% लोग युद्ध के खिलाफ हैं जबकि 44% समर्थन करते हैं। अधिकांश का मानना है कि यह युद्ध इजरायल के लाभ में है और अमेरिका के लिए फायदेमंद नहीं।
रूस की सतर्कता
रूस ने इरान पर हमले को ‘अधिकृत नहीं’ मानते हुए निंदा की है। विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़ाखारोवा ने शांतिपूर्ण समाधान का आह्वान किया है। राष्ट्रपति पुतिन के प्रमुख सलाहकार सर्गेई लावरोव ने भी ‘आक्रमण रोकने’ की मांग की है। रूस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इरान का पक्ष लिया है।
यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस पश्चिम एशिया की जटिलताओं को अधिक युद्ध में नहीं डालना चाहता। रूस की प्राथमिकता यूक्रेन में विजय प्राप्त करना है।
इरान ने यूक्रेन युद्ध के लिए ‘शाहेद’ ड्रोन और अन्य सामग्री उपलब्ध कराई है, जबकि रूस ने इमरान को उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम, साइबर सुरक्षा और गुप्त सूचनाएं प्रदान की हैं। दोनों देशों ने शंघाई सहयोग संगठन और BRICS के मंचों पर अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों के प्रभाव को चुनौती देने का साझा उद्देश्य रखा है।
रूस और इजरायल के बीच अनौपचारिक नन-अटैक समझौता है। सीरिया में इजरायली हमलों पर रूस ने चुप्पी रखी है। रूस ने इरान के साथ सुरक्षा समन्वय बनाए रखा है और अमेरिका तथा इजरायल से मध्यमपूर्व में संतुलन बनाए रखने में सहायता की है।
रूस की सभी ऊर्जा यूक्रेन युद्ध पर केन्द्रित है। मध्य पूर्व में अमेरिका और इजरायल के हस्तक्षेप से अमेरिकी संसाधन यूक्रेन से हटकर इस क्षेत्र में चले गए हैं। इससे रूस को यूक्रेन में अधिक आक्रामक होने का अवसर मिला है।

तेल की कीमतों में वृद्धि ने रूस की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया है। युद्ध से पहले रूस की तेल आय पांच वर्ष के निम्नतम स्तर पर थी, लेकिन इरान युद्ध ने खाड़ी में तेल आपूर्ति प्रभावित कर कर ब्रेंट क्रूड का भाव 115 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ा दिया है। रूस का तेल और LNG निर्यात फरवरी की तुलना में 14% अधिक हो गया है।
चीन और भारत जैसे एशियाई खरीदार अधिक रूसी तेल खरीद रहे हैं ताकि इरानी तेल की कमी पूरी की जा सके। यह रूस को युद्ध-वित्त पोषण में सहायता देता है।
रूस-इंड्रान संबंध अब एक मजबूत रणनीतिक साझेदारी के रूप में विकसित हुआ है। 2025 में दीर्घकालिक सहयोग समझौते ने इसे और मजबूत किया है। दोनों देश एक दूसरे को सैन्य उपकरण और तकनीक प्रदान करते हैं।
रूस ने इरान को युक्रेन युद्ध संबंधी ड्रोन तकनीक, पार्ट्स और उच्च गुणवत्ता वाली उपग्रह छवियां प्रदान की हैं। इसके अलावा, अमेरिकी युद्धपोतों और सैनिकों की जानकारी साझा करता है और ड्रोन संचालन रणनीति पर सलाह भी देता है।
फिर भी रूस का सहयोग अप्रत्यक्ष और सीमित है, उसने इरान में सीधे सैन्य हस्तक्षेप या अत्याधुनिक हथियार सप्लाई नहीं की है। इसके पीछे प्रमुख कारण यूक्रेन युद्ध में संसाधनों की कमी और रूस-इजरायल के बीच दीर्घकालिक नन-अटैक समझौता है।
इजरायल ने यूक्रेन को घातक हथियार नहीं दिए हैं और रूस पर कठोर प्रतिबंध नहीं लगाए हैं, इसलिए मास्को इजरायल को परेशान नहीं करना चाहता। सीरिया में रूस और इजरायल द्वारा ‘डि-कन्फ्लिक्ट मैकेनिज्म’ के जरिये सैन्य समन्वय जारी है। इसीलिए रूस सीधा हस्तक्षेप नहीं करता।
कूटनीतिक स्तर पर रूस इरान का समर्थन करता है, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इरान के खिलाफ प्रस्तावों को निरस्त करता है।
रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव मध्यपूर्व तनाव को दुनिया के लिए अस्थिरता बताते हुए शांति की अपील करते हैं, पर यह समर्थन भी सीमित है। रूस इरान को रणनीतिक साझेदार मानता है, लेकिन कोई सुरक्षा समझौता नहीं है, इसलिए वह रणनीतिक संतुलन बनाए रखना चाहता है।
रूस की दीर्घकालीन नीति स्वार्थपूर्ण है। अगर इरान कमजोर होगा तो रूस का मध्यपूर्व में प्रभाव घटेगा, क्योंकि इरान रूस के ‘प्रतिरोध अक्ष’ का मुख्य स्तंभ है।
मध्यपूर्व युद्ध की अवधि बढ़ने से रूस को आर्थिक और राजनीतिक लाभ भी हो सकते हैं। तेल की कीमतें बढ़ने से बजट घाटा कटेगा और इरान को हथियार बेच कर राजस्व मिलेगा। यह अमेरिका को थकाएगा और रूस के ‘बहुध्रुवीय विश्व’ सिद्धांत को मजबूत करेगा।
रूस के आधिकारिक बयान और व्यवहार में फर्क है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कड़ी आलोचना के बाद भी व्यवहार में ‘पर्खो और देखो’ नीति अपनाई गई है। अमेरिका कमजोर हुआ तो रूस अधिक सक्रिय हो सकता है।
अब रूस कूटनीतिक दबाव, अप्रत्यक्ष तकनीकी सहायता और रणनीतिक प्रतीक्षा की नीति पर है, जो उसे जोखिम से बचाता है और दीर्घकालिक लाभ सुनिश्चित करता है।
चीन का दृष्टिकोण: कूटनीति, अर्थव्यवस्था और दीर्घकालिक रणनीति
बाहरी नजर में चीन का रुख रूस से अधिक सतर्क और कूटनीतिक है। विदेश मंत्री वांग यी ने इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमले को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया। चीन युद्ध विराम और वार्ता का पक्षधर है। वह खाड़ी कनेक्टिविटी काउंसिल (GCC) देशों से संवाद कर क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दे रहा है।
चीन के मध्य पूर्व युद्ध में सीधे सैन्य भागीदारी न करने के पीछे आर्थिक और रणनीतिक कारण हैं। चीन की विशाल अर्थव्यवस्था आयातित तेल पर निर्भर है, जिसमें इरान प्रमुख स्रोत है। हार्मुज स्ट्रेट बंद हुआ तो अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ के तहत इरान चीन का रणनीतिक साझेदार है। 2021 में हुए 25-वर्षीय समझौते से लगभग 400 बिलियन डॉलर निवेश का लक्ष्य है, जिसे चीन सुरक्षित रखना चाहता है।

चीन की रणनीति मुख्यतः तीन भागों में बंटी है। पहली, चीन वैश्विक राजनीति में अमेरिका और इजरायल के एकाधिकार का विरोध करता है और बहुध्रुवीय विश्व का समर्थन करता है। लेकिन इरान के पक्ष में सीधे युद्ध में कूदना ताइवान और दक्षिण चीन सागर के तनाव के कारण बेहद जोखिमपूर्ण है।
दूसरी, चीन खुद को शांति मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। 2023 में सऊदी अरब और इरान संबंध सुधार में मुख्य भूमिका निभाई और अब ओमान और फ्रांस जैसे देशों के साथ वार्ता कर रहा है।
तीसरी, चीन अप्रत्यक्ष सहयोग प्रदान कर रहा है। युद्ध से पहले से चीन ने इरान को ड्रोन, मिसाइल पार्ट्स और सैन्य-सिविल सामग्री मुहैया कराई है। इरान ने राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य सहायता की पुष्टि की है, पर विस्तार से जानकारी गोपनीय है। शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स में संयुक्त सैन्य अभ्यास उनकी निकटता दिखाता है, फिर भी चीन ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप नहीं किया है।
चीन के दीर्घकालिक नजरिए में मध्य पूर्व युद्ध लंबा चले तो अमेरिका कमजोर होगा और चीन का विश्व प्रभाव बढ़ेगा। हालांकि तेल आपूर्ति बाधित होने से उसकी अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। इसलिए चीन वर्तमान में ‘प्रतीक्षा और दबाव’ की नीति पर है, जिसमें वह कूटनीतिक रूप से इरान का पक्ष लेता है लेकिन व्यावहारिक रूप से राष्ट्रहित की रक्षा करता है। यदि युद्ध वैश्विक आर्थिक संकट लाए, तो चीन फिर मध्यस्थता कर विश्व मंच पर अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाएगा।